प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को गुजरात पहुंचे और सोमनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की. उन्होंने सोमनाथ अमृत महोत्सव में हिस्सा लिया. यह महोत्सव 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के 75 साल पूरे होने के मौके पर मनाया जा रहा है.
यह स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का एक ऐतिहासिक पल था और यह महोत्सव उसकी स्थायी अहमियत का जश्न मनाता है. सोमनाथ अमृत महोत्सव के तहत कई कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. प्रधानमंत्री ने कई धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में हिस्सा लिया, जिनमें विशेष महापूजा, कुंभाभिषेक और ध्वजारोहण जैसे कार्यक्रम शामिल थे. ये अनुष्ठान पवित्रता, श्रद्धा और मंदिर के ध्वज को विधि-विधान से फहराने का प्रतीक माने जाते हैं.
प्रधानमंत्री ने सोमनाथ मंदिर की ऐतिहासिक विरासत, आध्यात्मिक महत्व और राष्ट्रीय पहचान को सम्मान देने के लिए एक विशेष डाक टिकट और सिक्का भी जारी किया.
सोमनाथ क्यों महत्वपूर्ण है?
सोमनाथ मंदिर को भारत के सबसे प्राचीन और सबसे पूजनीय मंदिरों में से एक माना जाता है. इसका उल्लेख हिंदू धर्मग्रंथों, पुराणों और कई ऐतिहासिक विवरणों में सदियों पहले से मिलता है. माना जाता है कि इस मंदिर का मूल स्वरूप चंद्र देव यानी सोम से जुड़ा हुआ था और इसे सोने से बनाया गया था. सोम के नाम पर बने इस मंदिर को हिंदू सभ्यता के सबसे पुराने लगातार पूजे जाने वाले मंदिरों में गिना जाता है.
सोमनाथ का बहुत बड़ा धार्मिक महत्व है क्योंकि यह भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है. मान्यता है कि हर ज्योतिर्लिंग अपने आप प्रकट हुआ था और उसमें शिव की दिव्य ब्रह्मांडीय शक्ति प्रकाश स्तंभ के रूप में मौजूद है. लाखों हिंदू गहरी श्रद्धा और आध्यात्मिक आस्था के साथ सोमनाथ के दर्शन करने आते हैं. यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यहां का शिवलिंग बुराई का नाश करने वाले और ब्रह्मांडीय व्यवस्था की रक्षा करने वाले शिव के शाश्वत स्वरूप का प्रतीक माना जाता है.
सोमनाथ मजबूती और फिर से खड़े होने का प्रतीक
सोमनाथ मंदिर का इतिहास आस्था, विनाश, पुनर्निर्माण, संघर्ष और पवित्रता की कहानी है.
11वीं सदी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर हमला किया था और बाद में औरंगजेब ने भी इसे तुड़वा दिया. ये हमले धार्मिक और आर्थिक दुश्मनी के साथ-साथ शांतिप्रिय लोगों की असुरक्षा को भी दिखाते हैं. बाद में रानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1783 में यहां दोबारा मंदिर का निर्माण करवाया और स्थापित मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा करवाई. वहीं, कुछ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, 1800 में महाराजा रणजीत सिंह सोमनाथ के मूल द्वार वापस लाए और उन्हें अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में स्थापित कराया.
आखिरकार, आज़ादी के बाद सोमनाथ के पुनर्निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल, के.एम. मुंशी और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे बड़े नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बार-बार टूटने और फिर बनने वाला सोमनाथ एक ऐसी गहरी आध्यात्मिक सभ्यता का प्रतीक है, जिसे अपनी महानता और अपने पूर्वजों की उपलब्धियों पर विश्वास है. भारत की सभ्यतागत स्मृति में पीढ़ियों से सोमनाथ मंदिर हमारी संस्कृति और इतिहास का मजबूत स्तंभ रहा है.
सदियों तक यह मंदिर अपने सोने, अपनी समृद्धि और ज्ञान के केंद्र होने के कारण बार-बार हमलों और विनाश का सामना करता रहा. फिर भी, भक्तों ने हर दौर में इसे दोबारा बनाया और धीरे-धीरे यह निरंतरता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक बन गया.आज़ादी के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसके पुनर्निर्माण का नेतृत्व किया और सोमनाथ नए स्वतंत्र भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और अपनी विरासत को वापस पाने की भावना का प्रतीक बन गया. सोमनाथ पुनर्निर्माण के 75 साल पूरे होने पर भी यह भारत की आध्यात्मिक परंपरा, ऐतिहासिक स्मृति और सभ्यतागत पहचान का स्थायी प्रतीक बना हुआ है.
सोमनाथ: हमेशा से ज्ञान का केंद्र
“प्रभासं च परिक्रम्य पृथ्वी-क्रम संभवम्”—प्रधानमंत्री मोदी ने हमारे प्राचीन शास्त्रों की इस पंक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभास क्षेत्र या मंदिर के गर्भगृह की एक परिक्रमा करना पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के बराबर आध्यात्मिक फल देता है. सोमनाथ मंदिर, जिसे परंपरागत रूप से प्रभास पाटन कहा जाता है, हमेशा से गहन ज्ञान, आध्यात्मिकता और बौद्धिक चर्चा का केंद्र रहा है. इसे आज के “थिंक टैंक” का शुरुआती रूप भी माना जा सकता है. यह स्थान पशुपत दर्शन और सांस्कृतिक संरक्षण का भी महत्वपूर्ण केंद्र था. सदियों तक यह मंदिर ऐसे बौद्धिक परंपराओं को संभाले रहा, जो बार-बार के ऐतिहासिक संकटों के बावजूद जीवित रहीं.
लाकुलीश और सोम शर्मा जैसे प्राचीन विद्वानों ने इस स्थान को दर्शनशास्त्र का बड़ा केंद्र बना दिया था. भव बृहस्पति और पशुपत आचार्यों जैसे ऐतिहासिक व्यक्तियों ने यह सुनिश्चित किया कि मंदिर पूजा और बौद्धिक अध्ययन दोनों का केंद्र बना रहे.
विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक जैसे शासकों ने यहां की आध्यात्मिक और बौद्धिक परंपराओं की रक्षा की. अहिल्याबाई होल्कर और बड़ौदा के गायकवाड़ शासकों ने भक्तों के पूजा के अधिकार की रक्षा की. वीर हमीरजी गोहिल और वीर वेगड़ाजी भील ने भी साहस के साथ मंदिर की रक्षा की और वे आज सोमनाथ की जीवित स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं.
मेरा भगवान कितना समृद्ध है?
सोमनाथ मंदिर भारत के सबसे समृद्ध मंदिरों में से एक है. मैं पहले भी लिख चुकी हूं कि मंदिरों में आने वाले पैसे का इस्तेमाल हिंदुओं के आर्थिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए कैसे किया जा सकता है.
सोमनाथ ट्रस्ट की 2014-15 में सालाना आय 31.06 करोड़ रुपये दर्ज की गई थी, जबकि उसी दौरान खर्च लगभग 18 करोड़ रुपये था. ट्रस्ट का कुल वार्षिक बजट 132 करोड़ रुपये था, जिसमें मंदिर और उससे जुड़े संचालन, रखरखाव, विकास और सामाजिक कार्य शामिल थे.
पर्यटन के रास्ते
पिछले एक दशक में सोमनाथ भारत के सबसे प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थलों में से एक बन गया है. सरकारी और पर्यटन आंकड़े बताते हैं कि गुजरात के तीर्थ पर्यटन सर्किट में लगातार दो अंकों की वृद्धि हुई है.
बेहतर हाईवे, रेल कनेक्टिविटी, एयरपोर्ट, डिजिटल प्रचार और बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास ने इस तेज़ी से बढ़ोतरी में बड़ी भूमिका निभाई है.
आज सोमनाथ में हर साल लगभग 92 से 97 लाख श्रद्धालु आते हैं. पिछले साल सिर्फ महाशिवरात्रि पर ही 3.5 लाख श्रद्धालु सोमनाथ पहुंचे थे. इसका असर ज़ाहिर तौर पर सोमनाथ ट्रस्ट की आय पर भी दिखता है. अब इसका हिसाब आप खुद लगा सकते हैं. इस बदलाव को जेतपुर-सोमनाथ फोर लेन हाईवे, साबरमती-वेरावल वंदे भारत एक्सप्रेस, केशोद एयरपोर्ट के दोबारा खुलने और राजकोट इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए बढ़ी उड़ानों जैसे प्रोजेक्ट्स ने और तेज़ किया है.
सांस्कृतिक पर्यटन भी तेज़ी से बढ़ा है. मंदिर में साउंड एंड लाइट शो होता है, जिसे हाल ही में 3D लेजर तकनीक और नैरेशन के साथ अपग्रेड किया गया है. सिर्फ पिछले तीन साल में इस शो ने 10 लाख से ज्यादा लोगों को आकर्षित किया है.
वंदे सोमनाथ कला महोत्सव जैसे कार्यक्रमों ने भी इस पवित्र स्थल से जुड़ी प्राचीन भक्ति और कला परंपराओं को फिर से जीवित किया है.
इतिहास, राजनीति और आस्था का संगम
1951 में सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन को लेकर जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के बीच हुआ मतभेद एक बड़े वैचारिक विवाद को दिखाता है.
एक तरफ वे लोग थे जो भारत माता के गर्वित लेकिन घायल पुत्र माने गए, और दूसरी तरफ वे पश्चिमी सोच से प्रभावित लोग थे, जिन्हें अपने इतिहास की जानकारी और सभ्यतागत अन्याय के पीड़ितों के प्रति संवेदना की कमी के कारण अपनी ही संस्कृति पर गर्व नहीं रहा. इसी वजह से वे खुद से नफरत करने वाले और खुद को कम आंकने वाले भारतीय बन जाते हैं.
संविधान में धर्मनिरपेक्षता को “सर्व धर्म संभाव” कहा गया है, जिसका मतलब है कि सभी धर्मों का सम्मान किया जाए और भारत के कठिन इतिहास को स्वीकार करते हुए सबको साथ लेकर चला जाए.
इतिहास और सभ्यता के घावों को स्वीकार्यता के मरहम से भरा जा सकता है. धार्मिक कार्यक्रमों में सभी की भागीदारी सही दिशा में एक कदम है और इसे तटस्थता के नज़रिए से देखा जाना चाहिए.
इतिहास, राजनीति और आस्था हमेशा एक-दूसरे से जुड़े रहे हैं. इसी वजह से सोमनाथ मंदिर और राम मंदिर के बीच तुलना की जाती है.
ये दोनों हिंदुओं के आस्था स्थलों, एक घायल लेकिन गर्वित सभ्यता की यादों और एक ऐसे आधुनिक राष्ट्र की कहानी बताते हैं, जिसकी सरकार का नारा है—“विकास भी, विरासत भी.”
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: विष्णु के कूर्म अवतार से आधुनिक भारत को श्रम के बारे में क्या सीख मिलती है