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Friday, 31 July, 2026
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भारत में मेडिकल टूरिज्म की रीढ़ कैसे बने ट्रांसलेटर्स?

पिछले साल इलाज के लिए 5 लाख से ज़्यादा विदेशी मरीज़ भारत आए. देश का मेडिकल-टूरिज़्म हब बनने का सपना उस वर्कफ़ोर्स की वजह से ही टिका हुआ है, जो ज़्यादातर पर्दे के पीछे रहकर काम करता है.

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नई दिल्ली: 3 जून को जब दिल्ली के हौज रानी में फ्लोरिश बी एंड बी में भीषण आग लगी, तब सर्जरी और ट्रांसप्लांट के बाद कुछ इमारतें दूर ठहरे विदेशी मरीजों ने घबराकर अपने डॉक्टरों को फोन नहीं किया. उन्होंने सबसे पहले अपने अनुवादकों (ट्रांसलेटर्स) को फोन किया.

46 वर्षीय बेन, जो डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो से हैं और फ्रेंच भाषा के अनुवादक हैं, उस सुबह करीब 8.30 बजे साकेत के मैक्स अस्पताल में थे. तभी सड़क के दूसरी तरफ से चीख-पुकार सुनकर वह बाहर आए. एक फायर ब्रिगेड की गाड़ी हौज रानी की तरफ जा रही थी. तभी उनका फोन बजा.

फोन सुसान का था. वह कांगो की रहने वाली हैं और उनकी बहन का मैक्स अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था. उनके गेस्ट हाउस के पास वाले गेस्ट हाउस में आग लगी थी. पुलिस ने पूरे इलाके को घेर लिया था. दमकल की टीम आग बुझा रही थी, जिसमें 22 लोगों की मौत हो गई थी. इनमें ज्यादातर विदेशी नागरिक थे. लेकिन वहां कोई भी उनकी भाषा में उन्हें यह नहीं बता पा रहा था कि आखिर हुआ क्या है.

Ben, a refugee from the Democratic Republic of Congo, explains the next step to his patient at Max Hospital, Saket. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो के शरणार्थी बेन, साकेत के मैक्स हॉस्पिटल में अपने मरीज़ को अगला कदम समझाते हुए | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

बेन ने कहा, “मैं अस्पताल में जिस मरीज के साथ था, उसे छोड़कर तुरंत हौज रानी पहुंचा ताकि अपने मरीजों की मदद कर सकूं.”

जब वह वहां पहुंचे तो डरे हुए मरीज और उनके साथ आए लोग अपना सामान लेकर बाहर खड़े थे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अब कहां रुकेंगे और इलाज कैसे जारी रहेगा.

उस समय बेन उनके लिए सिर्फ अनुवादक नहीं थे. वह उनके गाइड और मददगार भी थे.

जो मरीज इलाज के लिए हजारों किलोमीटर दूर भारत आते हैं, उनके लिए अनुवादक सिर्फ डॉक्टर और मरीज के बीच बातचीत का अनुवाद नहीं करते. वे अस्पताल की अपॉइंटमेंट बुक कराते हैं, बीमारी और दवाइयों की जानकारी समझाते हैं, रहने और आने-जाने का इंतजाम करते हैं, उनकी पसंद का खाना दिलवाते हैं, दवाइयां खरीदने और सरकारी कागजी काम में मदद करते हैं. कई बार डर, परेशानी या दुख की घड़ी में मरीज सबसे पहले इन्हीं को फोन करते हैं.

आग लगने के बाद आसपास के गेस्ट हाउस भी सील कर दिए गए थे. ऐसे में अस्पताल या मेडिकल टूरिज्म कंपनियों की जगह अनुवादकों ने पूरी रात मरीजों के लिए रहने का इंतजाम किया, अस्पताल की अपॉइंटमेंट दोबारा तय कराईं और उनके इलाज की व्यवस्था संभाली.

भारत खुद को मेडिकल टूरिज्म का बड़ा केंद्र बनाना चाहता है और अफ्रीका व मध्य एशिया के कई देशों के लोग इलाज के लिए भारत को प्राथमिकता देते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल पांच लाख से ज्यादा विदेशी इलाज के लिए भारत आए. 2025 में मेडिकल टूरिज्म का बाजार 8.7 अरब डॉलर का था, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 16.2 अरब डॉलर होने का अनुमान है.

लेकिन अस्पतालों, वीजा डेस्क और इंटरनेशनल पेशेंट विभागों के पीछे एक अनौपचारिक कार्यबल भी है, जो इस पूरे सिस्टम को चलाता है. ये शरणार्थी और प्रवासी अनुवादक हैं, जो दुभाषिया, देखभाल करने वाले, यात्रा समन्वयक, सलाहकार, मकान दिलाने वाले और कई बार मरीजों के परिवार की तरह काम करते हैं.

इनमें से कई लोग उन्हीं देशों से आते हैं, जहां से मरीज आते हैं. जैसे डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान. ये फ्रेंच, लिंगाला, स्वाहिली, दारी, पश्तो, रूसी और उज्बेक जैसी भाषाएं जानते हैं. यही भाषाएं अनजान लोगों को भरोसेमंद साथी बना देती हैं.

भारत विदेशी मरीजों की संख्या तो गिनता है, लेकिन उन अनुवादकों की गिनती नहीं करता जो इन मरीजों की यहां हर कदम पर मदद करते हैं.

बेन 2009 में शरणार्थी के तौर पर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो से भारत आए थे. तब से वह हजारों मरीजों की मदद कर चुके हैं. लेकिन आज भी भारत में उनका अपना भविष्य पूरी तरह सुरक्षित नहीं है.

एक अनुवादक का काम

अगली सुबह भी बेन का फोन लगातार बजता रहा.

किसी मरीज को ब्लड टेस्ट कराना था. किसी की अपॉइंटमेंट अचानक बदल गई थी. कोई डॉक्टर की लिखी दवा नहीं समझ पा रहा था. उनके दिन की योजना शायद ही कभी वैसी रहती है जैसी सुबह बनती है.

बेन ने कहा, “कई बार मुझे एक घंटे में चार मरीजों को संभालना पड़ता है.”

भारत आने के तीन साल बाद बेन ने मेडिकल अनुवादक के तौर पर काम शुरू किया. एक दिन उन्होंने अपोलो अस्पताल के बाहर कांगो के एक परिवार को देखा. वह परिवार चार महीने से दिल्ली में था, लेकिन बीच में काम करने वाले व्यक्ति की वजह से सिर्फ दो बार डॉक्टर से मिल पाया था. परिवार के एक सदस्य को दिल की बीमारी थी और दूसरे को किडनी की समस्या. बेन ने अस्पताल से बात की, उनकी मदद की और वहीं से उन्हें यह काम मिल गया, जिसने भारत में उनकी जिंदगी बदल दी.

आज डॉक्टर और मरीज के बीच बातचीत का अनुवाद करना उनके काम का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है.

मरीज अपने देश से निकलने से पहले ही उन्हें फोन करते हैं ताकि इलाज और खर्च की जानकारी मिल सके. बेन अस्पताल से बातचीत करवाते हैं, मेडिकल वीजा के लिए जरूरी दस्तावेज तैयार करवाते हैं और यात्रा की तैयारी में मदद करते हैं.

Ben at the hospital billing desk with a patient. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
अस्पताल के बिलिंग डेस्क पर एक मरीज़ के साथ बेन | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

दिल्ली पहुंचने के बाद वह मरीजों को अस्पताल के बाहर की हर चीज समझने में मदद करते हैं. अस्पताल के पास रहने की जगह ढूंढना, आने-जाने का इंतिजाम करना, डॉक्टर की सलाह आसान भाषा में समझाना, दवाइयां लेना, फॉलो-अप के लिए साथ जाना और बीमारी के दौरान आने वाली रोजमर्रा की परेशानियां हल करना भी उनके काम का हिस्सा है.

कई अस्पताल और मेडिकल टूरिज्म कंपनियां भी अपने इंटरनेशनल पेशेंट विभाग के जरिए ऐसी सेवाएं देती हैं. लेकिन कांगो का कोई मरीज ऐसे व्यक्ति के साथ ज्यादा सहज महसूस करता है जो फ्रेंच, लिंगाला या स्वाहिली बोलता हो और उसकी पृष्ठभूमि समझता हो, बजाय किसी ऐसे कर्मचारी के जिसने सिर्फ काम चलाने लायक फ्रेंच सीखी हो.

बेन ने बताया कि मेडिकल टूरिज्म कंपनियों के कर्मचारी एक साथ कई मरीजों को संभालते हैं.

उन्होंने कहा, “वे मरीज को अस्पताल छोड़कर दूसरे केस के लिए चले जाते हैं. अगर बीच में कुछ बदल जाए तो मरीज अकेला इंतजार करता रहता है और उसे समझ ही नहीं आता कि क्या हो रहा है.”

बेन के लिए असली काम वहीं से शुरू होता है.

‘मैं मना कैसे करूं?’

बेन अकेले नहीं हैं.

दिल्ली के बड़े निजी अस्पतालों के आसपास ऐसे कई अनुवादकों ने अपना अलग सहयोग तंत्र बना लिया है, जो मध्य एशिया, अफ्रीका और अफगानिस्तान से आने वाले मरीजों की मदद करते हैं. इनमें कुछ शरणार्थी हैं, जबकि कुछ लोग किसी और वजह से भारत आए थे, लेकिन बाद में इसी काम से जुड़ गए.

टॉम ने कभी नहीं सोचा था कि वह मेडिकल अनुवादक बनेंगे.

तुर्कमेनिस्तान के रहने वाले टॉम पेशे से आर्किटेक्ट हैं. उन्होंने शिकागो से मास्टर्स किया और फिर अपने देश लौटकर कारोबार शुरू किया. लेकिन तभी उनके बड़े बेटे को सेरेब्रल पाल्सी हो गई.

उन्होंने कहा, “इलाज के लिए हमारे पास तीन विकल्प थे. चीन, तुर्की और भारत. कोविड की वजह से चीन पूरी तरह बंद था. तुर्की बहुत महंगा था. इसलिए भारत ही एकमात्र विकल्प बचा.”

Foreign patients wait at the international patients' lounge in Max Hospital. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
मैक्स हॉस्पिटल के इंटरनेशनल मरीज़ों के लाउंज में विदेशी मरीज़ इंतज़ार कर रहे हैं। तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

टॉम अपने बेटे के साथ दिल्ली आए, जबकि उनकी पत्नी और बाकी बच्चे तुर्कमेनिस्तान में ही रहे. इलाज के लिए महीनों तक अस्पतालों के चक्कर लगते रहे और इसी बीच उनका कारोबार बंद हो गया.

तब तक उन्हें यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था की उतनी ही जानकारी हो गई थी जितनी डॉक्टरों के शेड्यूल की. वह छह भाषाएं जानते हैं. उन्होंने दूसरे तुर्कमेनिस्तानी परिवारों की मदद करनी शुरू कर दी.

उन्होंने बताया कि कई बार मरीजों से बातचीत उम्मीद पर खत्म होती है और कई बार नहीं.

उन्होंने कहा, “सबसे मुश्किल काम किसी परिवार को यह बताना होता है कि इलाज सफल नहीं होगा. डॉक्टर बीमारी बताते हैं, लेकिन यह बात मुझे उन लोगों को समझानी पड़ती है जो मुझ पर भरोसा करते हैं.”

38 वर्षीय टॉम कई बार ऐसी खबर दे चुके हैं.

उन्होंने कहा, “एक बार मुझे पांच मरीजों से कहना पड़ा कि उनके पास सिर्फ छह महीने का समय बचा है. बाद में उन सभी की मौत हो गई.” फिर कुछ देर रुककर उन्होंने कहा, “कई बार अनुवादक का काम डॉक्टर से भी बड़ा हो जाता है.”

टॉम हर हफ्ते करीब 100 डॉलर यानी लगभग 10,000 रुपये लेते हैं. लेकिन उनका कहना है कि उनके करीब 70 प्रतिशत मरीज उन्हें पैसे नहीं दे पाते. जो लोग भुगतान करते हैं, उन्हीं की वजह से वह बाकी मरीजों की मदद जारी रख पाते हैं.

अब उन्होंने अपना नया कारोबार शुरू कर लिया है. मेडिकल अनुवाद का काम अब उनका साइड प्रोफेशन है, लेकिन वह इसे छोड़ नहीं पाए हैं.

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मेरे एक मरीज मेरी पड़ोसन की मौसी हैं. दूसरा मेरे दोस्त का बड़ा भाई है. मैं उन्हें मना कैसे करूं?”

The signs inside the International Patients' Lounge at Max Saket are in multiple foreign languages, to be as widely read by the clientele they have. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
मैक्स साकेत के इंटरनेशनल मरीज़ों के लाउंज में लगे साइन कई विदेशी भाषाओं में हैं, ताकि वहां आने वाले मरीज़ उन्हें आसानी से पढ़ सकें | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

अस्पताल के बाहर भी जिम्मेदारी

ज्यादातर विदेशी मरीजों के लिए इलाज अस्पताल के कमरे से बाहर निकलने के बाद खत्म नहीं होता.

उन्हें ब्लड टेस्ट कराने होते हैं, दोबारा डॉक्टर को दिखाना होता है, दवाइयां लेनी होती हैं और सख्त खान-पान का पालन करना पड़ता है. खासकर ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीज अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी लंबे समय तक संक्रमण के खतरे में रहते हैं.

मैक्स अस्पताल में पहले और अब सफदरजंग अस्पताल में कार्यरत डॉ. ऋषभ भौमिक ने कहा, “हल्का सा वायरल इंफेक्शन भी बहुत बड़ी समस्या बन सकता है.”

यही वजह है कि मरीज सिर्फ इलाज के लिए नहीं, बल्कि दूसरी कई जरूरतों के लिए भी अनुवादकों पर निर्भर रहते हैं.

Guest houses and hotels in Hauz Rani remain sealed a month and a half after the fire. Many of them had more rooms than legally permitted. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
हौज़ रानी में आग लगने के डेढ़ महीने बाद भी गेस्ट हाउस और होटल सील हैं. इनमें से कई में कानूनी तौर पर इजाज़त से ज़्यादा कमरे थे | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

हौज रानी के गेस्ट हाउस और होटल आग लगने के डेढ़ महीने बाद भी सील हैं. इनमें से कई में कानूनी सीमा से ज्यादा कमरे बने हुए थे.

जब 50 साल के आसपास के उज्बेकिस्तान के कैंसर मरीज मकसूद ने दिल्ली आकर इलाज कराने का फैसला किया, तो उनके परिवार ने सबसे पहले किसी अस्पताल से संपर्क नहीं किया. उन्होंने दिल्ली में रहने वाली उज्बेक अनुवादक डायना को फोन किया. डायना पहले उनके परिवार की एक सदस्य का भारत में इलाज कराने में मदद कर चुकी थीं और कभी उनकी बहन की पड़ोसी भी रह चुकी थीं.

बेन और टॉम की तरह डायना का काम भी मरीज के दिल्ली आने से पहले शुरू हो जाता है और अस्पताल से जाने के बाद भी चलता रहता है.

उन्होंने कहा, “अगर मेरे किसी मरीज की तबीयत अचानक खराब हो जाए तो वह सबसे पहले मुझे फोन करता है. चाहे वह मैक्स अस्पताल के ठीक सामने ही क्यों न ठहरा हो. अगर वह सीधे अस्पताल भी चला जाए, तो वहां क्या करेगा? उसे किसी की बात समझ ही नहीं आएगी.”

इसी तरह की जरूरतों ने दिल्ली के अस्पतालों के आसपास एक पूरी अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है.

मकसूद उज्बेकिस्तान में एक बेकरी चलाते हैं. वह कैंसर के इलाज के लिए भारत आए हैं. उनकी बहन हौज रानी में रह रही हैं, जबकि वह मैक्स साकेत में भर्ती हैं.

2017 में अफगानिस्तान के मजार-ए-शरीफ से आए शरणार्थी खालिद ने हौज रानी में ‘वली अल असर’ नाम का रेस्तरां खोला. उन्होंने देखा कि मैक्स अस्पताल के पास इलाज करा रहे कई विदेशी मरीज स्थानीय रेस्तरां का तीखा खाना नहीं खा पाते.

Maqsud owns a bakery in Uzbekistan. He has come to India for cancer treatment. His sister is staying in Hauz Rani while he is admitted at Max Saket. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
मकसूद उज़्बेकिस्तान में एक बेकरी चलाते हैं. वह कैंसर के इलाज के लिए भारत आए हैं. उनकी बहन हौज़ रानी में रह रही हैं, जबकि वह मैक्स साकेत में भर्ती हैं | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

34 वर्षीय खालिद ने अफगानिस्तान, इराक और तुर्कमेनिस्तान के रसोइयों को काम पर रखा, ताकि अलग-अलग देशों से आए मरीजों को अपने देश जैसा खाना मिल सके. कई बार खाना सीधे गेस्ट हाउस तक पहुंचाया जाता है, क्योंकि मरीज इतने कमजोर होते हैं कि बाहर नहीं निकल सकते या उनके साथ रहने वाले लोग उन्हें अकेला छोड़कर नहीं जा सकते.

खालिद ने बताया, “यह खाना ज्यादातर मरीजों के लिए होता है.” उन्होंने हल्के खाने को बस “मरीजों का खाना” बताया.

खालिद के मुताबिक, इस पूरे सिस्टम को चलाने में अनुवादकों की सबसे अहम भूमिका है.

Wali Alasr, a restaurant opposite Max Saket, caters to the Afghan, and Central Asian patients that come to Max Saket. The owner, Khalid, stocks basic groceries and snacks from these countries for his customers. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
मैक्स साकेत के सामने स्थित ‘वली अल-अस्र’ रेस्टोरेंट, मैक्स साकेत आने वाले अफ़ग़ान और मध्य एशियाई मरीज़ों की ज़रूरतों को पूरा करता है. इसके मालिक, खालिद, अपने ग्राहकों के लिए इन देशों का ज़रूरी राशन और स्नैक्स रखते हैं | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

उन्होंने कहा, “अगर अनुवादक न हों, तो ये मरीज ऐसे हैं जैसे किसी की आंखें ही न हों.”

मैक्स अस्पताल के सामने स्थित वली अल असर रेस्तरां अफगानिस्तान और मध्य एशिया से आने वाले मरीजों के लिए खाना बनाता है. इसके मालिक खालिद अपने ग्राहकों के लिए उनके देशों की जरूरी किराने की चीजें और स्नैक्स भी रखते हैं.

मैक्स अस्पताल के सामने एक मेडिकल स्टोर चलाने वाले व्यक्ति ने भी यही बात कही. अक्सर अनुवादक ही डॉक्टर की पर्ची लेकर आते हैं, दवाइयां खरीदते हैं और यह भी सुनिश्चित करते हैं कि मरीज भारत छोड़ने से पहले अगली जांच तक चलने लायक दवाइयां साथ ले जाए.

कई बार मरीजों की मांग बीमारी से जुड़ी नहीं होती.

Most pharmacies opposite Max have signs in foreign languages, this one advertises chemotherapy drugs at a 50% discount in Cyrilic, right next to the Afronile Healthcare medical tourism company. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
मैक्स हॉस्पिटल के सामने ज़्यादातर फ़ार्मेसी के साइनबोर्ड विदेशी भाषाओं में हैं; इनमें से एक, ‘एफ़्रोनाइल हेल्थकेयर’ मेडिकल टूरिज़्म कंपनी के ठीक बगल में, सिरिलिक लिपि में कीमोथेरेपी की दवाओं पर 50% छूट का विज्ञापन कर रही है | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

दिल्ली में कई महीने रहने के बाद सुसान ने बेन से एक अलग तरह की मदद मांगी. वह अपने बालों की चोटी बनवाना चाहती थीं.

कई अश्वेत महिलाओं के लिए ऐसे व्यक्ति को ढूंढना जरूरी होता है जो उनके बालों की बनावट को समझता हो. सुसान को पता नहीं था कि कहां जाएं.

लेकिन बेन जानते थे कि किसे फोन करना है.

मैक्स अस्पताल के सामने ज्यादातर मेडिकल स्टोरों पर विदेशी भाषाओं में बोर्ड लगे हैं. इस मेडिकल स्टोर पर सिरिलिक भाषा में कीमोथेरेपी की दवाओं पर 50 प्रतिशत छूट का विज्ञापन लगा है. इसके पास ही अफ्रोनाइल हेल्थकेयर मेडिकल टूरिज्म कंपनी का दफ्तर है.

The international patients' lounge at Max Saket. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
मैक्स साकेत में इंटरनेशनल मरीज़ों के लिए लाउंज | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

जब आग ने पूरा सिस्टम हिला दिया

3 जून की सुबह जब सुसान ने बेन को फोन किया, तब तक फ्लोरिश बी एंड बी में लगी आग की वजह से हौज रानी में दमकल, पुलिस और बड़ी संख्या में लोग पहुंच चुके थे.

सुसान, उनकी बहन ओव्बा और ओव्बा का बेटा फ्लोरिश इन में ठहरे हुए थे. इस गेस्ट हाउस का मालिक वही था, जिसका फ्लोरिश बी एंड बी था. शोर सुनकर वे बाहर आए और उन्हें पता चला कि पूरे इलाके में अफरा-तफरी मची हुई है.

कांगो में बैठे उनके रिश्तेदारों ने टीवी पर आग की खबर देखी और लगातार फोन करने लगे.

“क्या तुम सुरक्षित हो? क्या तुम सुरक्षित हो?”

बेन ने बताया, “उस दिन उन्होंने खाना तक नहीं खाया.”

शाम तक फ्लोरिश इन और आसपास के कई गेस्ट हाउस सील कर दिए गए. विदेशी मरीजों और उनके साथ आए लोगों के पास रहने की कोई जगह नहीं बची.

सुसान ने बेन के जरिए कहा, “आपको समझ नहीं आता कि अब क्या करें. कहां जाएं?”

The medical tourism economy has taken over the urban village of Hauz Rani, with chemists, pathology labs, and guest houses filling the narrow lanes. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
हौज़ रानी के शहरी गांव पर मेडिकल टूरिज़्म की अर्थव्यवस्था छा गई है; यहां की तंग गलियां केमिस्ट की दुकानों, पैथोलॉजी लैब और गेस्ट हाउस से भर गई हैं। तारिणी उन्नीकृष्णन | दप्रिंट

मेडिकल टूरिज्म ने हौज रानी की पूरी बस्ती की तस्वीर बदल दी है. यहां की संकरी गलियों में मेडिकल स्टोर, पैथोलॉजी लैब और गेस्ट हाउस भरे पड़े हैं.

कुछ मरीज और उनके परिजन, जो इलाज के बाद ठीक हो रहे थे, उन्होंने वह रात मैक्स अस्पताल के वेटिंग लाउंज में बिताई. बाकी लोगों के लिए अनुवादकों ने अंधेरा होने से पहले अस्थायी रहने का इंतजाम किया.

बेन पूरी रात सुसान के परिवार के साथ रहे. उन्होंने मकान मालिकों को फोन किए, गाड़ी का इंतजाम किया और ओव्बा के ट्रांसप्लांट के बाद रहने के लिए नई जगह ढूंढी. अगली सुबह वह उन्हें एक-एक करके कई मकान दिखाने ले गए, तब जाकर उन्हें एक कमरा मिला.

सुसान के लिए इस घटना ने यह साफ कर दिया कि दिल्ली में इतने महीनों तक उनका परिवार आखिर किसके सहारे चल रहा था.

उन्होंने कहा, “बेन के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते.”

जिस गली से वली अल असर रेस्तरां तक पहुंचा जाता है, वह पहली मंजिल पर है. लेकिन गली आगे मुद्रा विनिमय केंद्र और ट्रैवल एजेंसी तक जाती है.

The lane that leads to Wali Alasr. The restaurant is on the first floor, but the lane continues to a currency exchange, and a travel agency ahead. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
वली अल-अस्र की ओर जाने वाली गली. रेस्टोरेंट पहली मंज़िल पर है, लेकिन यह गली आगे एक करेंसी एक्सचेंज और ट्रैवल एजेंसी तक जाती है | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

अनदेखा लेकिन सबसे मजबूत सहारा

भारत में शरणार्थी बनकर आए 16 साल हो चुके हैं. अब बेन दिल्ली के मेडिकल सिस्टम को उतनी ही अच्छी तरह जानते हैं जितना उनके मरीज. उन्हें पता है किस अस्पताल में किससे बात करनी है, कौन-सी मेडिकल दुकान पर मुश्किल से मिलने वाली दवाइयां मिलती हैं और कौन-सा मकान मालिक विदेशी परिवारों को कमरा देगा.

भारत जिस मेडिकल टूरिज्म उद्योग को और बढ़ाना चाहता है, उसमें बेन जैसे लोगों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है. केंद्र सरकार पहले ही मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय मेडिकल हब और पूरी मेडिकल वैल्यू ट्रैवल सुविधा प्रणाली बनाने की योजना घोषित कर चुकी है.

मैक्स अस्पताल के सामने की सड़क पर मनी एक्सचेंज, ट्रैवल एजेंसियां और उनके ऊपर बने कमरे हैं. हर जगह कई विदेशी भाषाओं में बोर्ड लगे हुए हैं.

The street opposite Max Hospital is littered with currency exchanges, travel agencies, with rooms above them, and all with signs in multiple foreign languages. Tarini Unnikrishnan | ThePrint
मैक्स हॉस्पिटल के सामने वाली सड़क पर कई करेंसी एक्सचेंज और ट्रैवल एजेंसियां ​​हैं, जिनके ऊपर कमरे बने हुए हैं और इन सभी जगहों पर कई विदेशी भाषाओं में साइनबोर्ड लगे हैं | तारिणी उन्नीकृष्णन | दिप्रिंट

लेकिन बेन जैसे अनुवादक अब भी इस आधिकारिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं. उनका पासपोर्ट कई साल पहले खत्म हो चुका है और वह भारत में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के शरणार्थी कार्ड पर रह रहे हैं. लेकिन भारत सरकार इस कार्ड को नागरिकता पाने का आधार नहीं मानती. बेन आज भी दूसरे कामों के लिए आवेदन नहीं कर सकते. उन्हें सिर्फ संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय किए गए शरणार्थियों के अनुवादक की भूमिका में ही काम करने की अनुमति है. ज्यादातर अनुवादकों की तरह वह भी आज तक लोगों की सिफारिश और मुंहजबानी पहचान पर ही काम पाते हैं.

इनमें से कई लोग शरणार्थी या लंबे समय से भारत में रह रहे प्रवासी हैं, जिनका अपना भविष्य भी भारत में पूरी तरह सुरक्षित नहीं है. 2025 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सहयोग से हुए एक राष्ट्रीय सर्वे में कहा गया कि शरणार्थियों की समस्याओं को सरकारी नीतियों में अक्सर नजरअंदाज किया जाता है.

रिपोर्ट में कहा गया, “अफ्रीकी शरणार्थियों को नस्लीय भेदभाव की वजह से और ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.”

बेन कहते हैं कि यह भेदभाव सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है.

उन्होंने कहा, “आप लोगों की नजरों से ही समझ सकते हैं. वे आपको देखते हैं और फिर अपनी नाक ढंक लेते हैं, जैसे उन्हें लगता हो कि आपसे बदबू आती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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