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Sunday, 20 September, 2026
होमदेश‘UAPA कैसे लागू होगा?’—हल्द्वानी हिंसा मामले में आरोपी की जमानत पर SC ने उत्तराखंड सरकार से पूछे सवाल

‘UAPA कैसे लागू होगा?’—हल्द्वानी हिंसा मामले में आरोपी की जमानत पर SC ने उत्तराखंड सरकार से पूछे सवाल

CJI की अध्यक्षता वाली बेंच ने 2024 की हिंसा के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को जमानत देने के हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की अपील खारिज की, राज्य से कहा कि मलिक को दोषी साबित करने में अपनी ऊर्जा लगाए.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने शुक्रवार को मौखिक टिप्पणी की—“पुलिस स्टेशन जलाने के लिए UAPA कैसे लगाया जा सकता है…यह सार्वजनिक व्यवस्था का मामला है”. बेंच ने 2024 की हल्द्वानी हिंसा के मुख्य आरोपी अब्दुल मलिक को जमानत देने के हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की अपील खारिज कर दी.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली और जस्टिस जॉयमाला बागची और वी. मोहना वाली बेंच ने राज्य सरकार को सलाह दी कि वह मलिक की जमानत का विरोध करने के बजाय उसे दोषी साबित करने में अपनी ऊर्जा लगाए.

जस्टिस बागची ने मौखिक रूप से पूछा, “अगर कोई भीड़ पुलिस स्टेशन जाकर पेट्रोल बम फेंकती है, तो UAPA कैसे लगाया जा सकता है?” बेंच ने अपनी मौखिक टिप्पणियों का लिखित आदेश में जिक्र नहीं किया और राज्य सरकार की अपील को सीधे खारिज कर दिया.

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) भारत का मुख्य आतंकवाद रोधी कानून है.

इस साल 16 अप्रैल को उत्तराखंड हाई कोर्ट ने मलिक को जमानत दे दी थी. अपने आदेश में कोर्ट ने कहा था कि साजिश के आरोपों के समर्थन में पुलिस के पास ठोस सबूत नहीं थे और झड़पों के दौरान आरोपी घटनास्थल पर मौजूद नहीं था.

हाई कोर्ट ने हिंसा से जुड़े उसके खिलाफ दर्ज तीन मामलों में उसे जमानत दी थी. मलिक को 23 फरवरी, 2024 को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था.

हल्द्वानी में एक मस्जिद और मदरसे को गिराए जाने को लेकर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई थी, जिसमें पांच लोगों की मौत हो गई थी.

पुलिस ने महिलाओं समेत 89 लोगों को गिरफ्तार किया था और मलिक को मुख्य साजिशकर्ता बताया था. मामले में 90 दिनों के बाद चार्जशीट दाखिल की गई थी, लेकिन जांच पूरी करने के लिए बढ़ाई गई समय सीमा के अंदर ही इसे दाखिल किया गया था. इस समय सीमा को ट्रायल कोर्ट ने मंजूरी दी थी. हालांकि, हाई कोर्ट ने जांच की धीमी गति पर नाराज़गी जताई और 50 आरोपियों को डिफॉल्ट जमानत दे दी.

शुरुआत में राज्य सरकार ने दलील दी कि इस मामले में पुलिस स्टेशन जलाने और संगठित हिंसा का मामला शामिल है, लेकिन CJI की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मामले में UAPA लगाए जाने पर सवाल उठाया और पूछा कि कथित घटनाएं इस विशेष कानून की ज़रूरी शर्तों को कैसे पूरा करती हैं.

उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया से कोर्ट ने कहा कि पुलिस स्टेशनों की सुरक्षा करना और अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाना आखिरकार राज्य की जिम्मेदारी है.

जस्टिस बागची ने कहा, “हमें UAPA जोड़ने को लेकर गंभीर संदेह है, इसलिए हम राज्य की SLP (अपील) पर सुनवाई करने के इच्छुक नहीं हैं.”

हालांकि, उत्तराखंड सरकार ने दलील दी कि मलिक मुख्य आरोपी था और उसे बिना कारण बताए और बहुत संक्षिप्त आदेश के जरिए जमानत दी गई. सरकार ने कहा कि यह घटना आम मारपीट के मामले से कहीं ज्यादा गंभीर थी और इसमें पुलिस स्टेशन पर संगठित हमला शामिल था.

इस पर बेंच ने कहा, “किसी अदालत की गलती के आधार पर किसी व्यक्ति की आजादी तय नहीं होती. यह अभियोजन पक्ष के मामले पर निर्भर करती है.”

मामले के तथ्यों को देखते हुए बेंच ने माना कि हाई कोर्ट के लिए विस्तार से कारण बताने वाला आदेश देना ज़रूरी नहीं था. उसने सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले मामलों और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले मामलों के बीच अंतर बताया.

CJI सूर्यकांत ने गैर-विस्तृत आदेश को लेकर भाटिया की चिंता का जवाब देते हुए कहा, “यह दिखना पर्याप्त है कि मामले पर विचार किया गया है. वह दो साल से हिरासत में है. अगर जमानत गलत कारण से भी दी गई है, तो भी हमें इसमें दखल नहीं देना चाहिए.”

जजों ने माना कि व्यक्तिगत आजादी को न्यायिक कार्यवाही में होने वाली “देरी” और काम में सुस्ती पर निर्भर नहीं बनाया जा सकता.

भाटिया अपनी दलील देते रहे. जजों को समझाने की कोशिश में उन्होंने कहा कि मलिक को जमानत मिलने से पुलिस बल का मनोबल गिरेगा.

बेंच ने कहा, “अगर पुलिस का मनोबल गिरना आपकी चिंता है, तो आपको दो साल में दोषसिद्धि हासिल कर लेनी चाहिए थी. आप बुरी तरह विफल रहे.” बेंच ने कहा कि राज्य एक तय समय सीमा में ट्रायल पूरा करने में अपनी असमर्थता की भरपाई जमानत आदेश को चुनौती देकर नहीं कर सकता.

बेंच ने ट्रायल की धीमी गति पर भी ध्यान दिया. इस दौरान 105 गवाहों में से सिर्फ एक से पूछताछ हुई है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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