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Friday, 31 July, 2026
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15 साल पहले पैलेट गन को जानलेवा बताया गया था, समितियों के जाल में कैसे फंसे रह गए सुधार

विशेषज्ञों की रिपोर्ट में कहा गया है कि बर्डशॉट छर्रे 'अगर आंखों और सिर पर लगें तो गंभीर चोट पहुंचा सकते हैं.' हालांकि, इन सुझावों को एक समिति से दूसरी समिति के पास भेजा जाता रहा है, लेकिन उन पर बहुत कम अमल हुआ है.

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नई दिल्ली: नई दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलने से 15 साल पहले ही गृह मंत्रालय की बनाई गई एक विशेषज्ञ समिति ने चेतावनी दी थी कि दंगों को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय और राज्य पुलिस जिन तथाकथित कम घातक हथियारों का इस्तेमाल कर रही है, वे जानलेवा साबित हो रहे हैं. इसलिए इन्हें तुरंत बेहतर और आधुनिक काइनेटिक एनर्जी हथियारों से बदला जाना चाहिए.

विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि बर्डशॉट पैलेट अगर आंख या सिर जैसे हिस्सों पर लगें, तो गंभीर चोट पहुंचा सकते हैं. लेकिन समिति की सिफारिशें एक समिति से दूसरी समिति तक ही घूमती रहीं और जमीन पर बहुत कम लागू हुईं.

2010 में कश्मीर में पुलिस के साथ झड़पों के दौरान कम से कम 117 प्रदर्शनकारियों की मौत, जिनमें कुछ की मौत पैलेट लगने से हुई थी, के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक रूप से कम घातक दंगा नियंत्रण तकनीकें खरीदने का वादा किया था. लेकिन सुधार के लिए कोई खास तेजी नहीं दिखाई गई. पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) के शोध से जुड़े एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट को यह जानकारी दी.

प्रधानमंत्री के भाषण के बाद BPR&D ने दंगों से निपटने के लिए मानक प्रक्रिया तय करने के लिए एक टास्क फोर्स बनाई. इसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह सचिव ने की. इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक और कई राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे.

फरवरी 2011 में सौंपी गई टास्क फोर्स की रिपोर्ट में ब्रिटिश दौर के उन नियमों को जारी रखने की सिफारिश की गई, जिनके तहत पुलिस उन प्रदर्शनकारियों पर भी बल प्रयोग कर सकती है जो हिंसा नहीं कर रहे हों.

हालांकि, टास्क फोर्स ने यह भी कहा कि घातक हथियारों का इस्तेमाल तभी किया जाए, जब कम घातक हथियार काम न करें. इस सूची में बर्डशॉट चलाने वाली शॉटगन शामिल नहीं थी.

उसी साल BPR&D ने ऑर्काश सर्विसेज के साथ मिलकर कम घातक हथियारों का विस्तृत अध्ययन किया. नई दिल्ली के बाहरी इलाके भोंडसी और कादरपुर स्थित केंद्रीय पुलिस केंद्रों में परीक्षण के बाद 2013 में यह अध्ययन जारी किया गया.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “तब तक कश्मीर में हिंसा काफी कम हो चुकी थी. इसलिए गैर-घातक उपकरणों को प्राथमिकता के आधार पर खरीदने के लिए कोई राजनीतिक दबाव नहीं था.”

2016 में यह मुद्दा फिर सामने आया, जब सड़क हिंसा में 85 और लोगों की मौत हुई और कई लोग पैलेट लगने से हमेशा के लिए अंधे हो गए.

तब के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने .303 राइफल और पंप-एक्शन शॉटगन से चलने वाले बर्डशॉट के विकल्प सुझाने के लिए एक और समिति बनाई. इस समिति ने भी लगभग वही सिफारिशें दोहराईं जो 2012 की रिपोर्ट में दी गई थीं.

तत्कालीन अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि पैलेट गन का कोई विकल्प नहीं मिला है. हालांकि सरकार एक “गुप्त हथियार” विकसित कर रही है जो भीड़ को तितर-बितर कर सके.

गृह मंत्रालय से जुड़े एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि 2016 की समिति द्वारा सुझाए गए हथियारों में बहुत कम राज्यों ने निवेश किया.

2021 में राज्यसभा की गृह मामलों की स्थायी समिति ने कम घातक हथियारों की खरीद बढ़ाने की सिफारिश की. लेकिन सरकार ने कहा कि देश में इनका निर्माण सीमित क्षमता में होता है, इसलिए ऐसा करना संभव नहीं है.

कम घातक हथियारों का भ्रम

2010 के दंगों में बड़ी संख्या में लोगों की मौत पर देश और विदेश में हुई आलोचना के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पुलिस प्रमुखों से कहा था कि वे मानक संचालन प्रक्रिया और भीड़ नियंत्रण के तरीकों की समीक्षा करें और कम घातक, लेकिन प्रभावी और ज्यादा सटीक उपाय अपनाएं.

2011 की BPR&D रिपोर्ट के अलावा पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी रोहित चौधरी के शोध में भी दुनिया के बेहतर तरीकों के आधार पर नई दंगा नियंत्रण रणनीति अपनाने की बात कही गई थी. इसमें बल प्रयोग की बजाय बातचीत और संयम पर जोर दिया गया था.

2010 की हिंसा के बाद कश्मीर पुलिस ने गोलियों और रबर बुलेट से होने वाली मौतें कम करने के लिए बर्डशॉट चलाने वाली शॉटगन का इस्तेमाल शुरू किया. यह ब्रिटिश शासन के समय भीड़ नियंत्रण में इस्तेमाल होने वाला पुराना हथियार था.

भारत में पुलिस जो दंगा नियंत्रण गन इस्तेमाल करती है, वह ग्रीनर्स पुलिस गन की सीधी उत्तराधिकारी है. यह खास तरह की 12-बोर कारतूस चलाती थी.

ब्रिटिश दौर की पुलिस पुस्तिकाओं में कहा गया था कि इस गन का इस्तेमाल 15 से 50 मीटर की दूरी से किया जाए. इससे कम दूरी पर यह जानलेवा चोट पहुंचा सकती है. वहीं 15 मीटर से कम दूरी पर लाठी का इस्तेमाल किया जाता था.

इतिहासकार सिमियन शूल ने लिखा है कि नियमों के मुताबिक अगर भीड़ नहीं हटती थी, तो पहले लाठीचार्ज किया जाता था. इसके बाद बकशॉट चलाए जाते थे. अगर इससे भी बात नहीं बनती थी, तो सेना को बुलाकर राइफल, मशीनगन और कुछ मामलों में हवाई ताकत का इस्तेमाल किया जाता था.

2016 की घटनाओं ने साफ कर दिया कि शॉटगन पैलेट का इस्तेमाल हालात सुधारने के बजाय और खराब कर रहा था.

उस साल बड़ी संख्या में मौतों और लोगों के अंधे होने की घटनाओं से लोगों में गहरा गुस्सा फैल गया. इसके बाद कई युवा सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में शामिल हो गए.

BPR&D समिति ने पाया कि सीआरपीएफ की रैपिड एक्शन फोर्स जैसी दंगा नियंत्रण इकाइयों के पास कम घातक हथियारों की तुलना में कहीं ज्यादा घातक हथियार मौजूद थे.

उदाहरण के तौर पर हैदराबाद में तैनात 120 जवानों की हर कंपनी के पास 24 आधुनिक 7.62 मिमी राइफलें थीं, जिनके लिए 960 गोलियां थीं. इसके अलावा 8-9 मिमी पिस्तौल और 80 गोलियां भी थीं. हर कंपनी के पास रबर बुलेट और प्लास्टिक बर्डशॉट के भी पर्याप्त भंडार थे.

BPR&D ने पाया कि बिना घातक तरीके से भीड़ को नियंत्रित करने का पर्याप्त प्रशिक्षण न होने से पुलिस खुद भी खतरे में पड़ती थी और कई बार गोली चलाने की नौबत आ जाती थी.

रिपोर्ट में दर्ज एक शर्मनाक घटना में बताया गया कि कोसोवो में संयुक्त राष्ट्र मिशन पर तैनात एक भारतीय पुलिस दल को उग्र प्रदर्शनकारियों से खुद को नुकसान न पहुंचाने की गुहार लगानी पड़ी थी. बाद में एक जर्मन टीम ने उन्हें बचाया.

आजमाए गए, लेकिन अपनाए नहीं गए

BPR&D समिति ने कई तरह के उपकरणों का मैदान में परीक्षण किया था, जिन्हें वह दंगा नियंत्रण बलों के हथियारों में शामिल करना चाहती थी.

पुलिस को उपकरण उपलब्ध कराने वाली प्रमुख कंपनी एसआरजी ग्रुप ने तेजी से फायर होने वाली प्लास्टिक की गोलियां दिखाई थीं. ये निशाने से टकराते ही टूट जाती थीं और उनमें मौजूद रासायनिक पदार्थ निकलकर असर करता था.

इसके अलावा न्यूमैटिक लॉन्चर से छोड़ी जाने वाली रबर की गेंदों का भी परीक्षण किया गया. इन्हें ऐसी रफ्तार से दागा जाता था जिससे गंभीर चोट लगने की संभावना कम रहे.

पुलिस के लिए बेहतर सुरक्षा उपकरणों और ऐसी ढालों का भी परीक्षण किया गया, जिन्हें प्रदर्शनकारी छूते ही उनमें से गैर-घातक बिजली का झटका निकलता था.

हालांकि कुछ पुलिस बल जानलेवा असर कम करने के लिए प्लास्टिक और रबर की गोलियों का इस्तेमाल करने लगे थे, लेकिन BPR&D ने पाया कि ये गोलियां 100 मीटर की दूरी से भी 75 इंच मोटे प्लाईवुड बोर्ड को भेद सकती थीं. इससे साफ था कि इतनी दूरी पर भी ये किसी की जान ले सकती हैं या गंभीर चोट पहुंचा सकती हैं.

इन पुलिस बलों के पास आंसू गैस के अलावा कोई खास कम घातक हथियार नहीं था. आंसू गैस भी कई बार उल्टा पुलिस के लिए परेशानी बन जाती थी, क्योंकि उनके पास पर्याप्त गैस मास्क नहीं थे और गैस के गोले भी अक्सर कम पड़ जाते थे.

BPR&D के जांचकर्ताओं ने कश्मीर और मणिपुर में जिन फील्ड कमांडरों से बात की, उन्होंने बताया कि अगर बर्डशॉट पैलेट सही तरीके से यानी प्रदर्शनकारियों के पैरों की तरफ चलाए जाएं, तो उनका असर कम होता है. लेकिन अगर उन्हें ऊपर की तरफ चलाया जाए, तो आंखों और शरीर के अहम अंगों के लिए बेहद खतरनाक साबित होते हैं.

इससे भी बड़ी समस्या यह मिली कि मुंबई जैसे शहरों में दंगा नियंत्रण पुलिस को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया जाता था और उनके पास कम घातक हथियार भी उपलब्ध नहीं थे.

BPR&D रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ी कमियों में से एक यह थी कि दंगाइयों के खिलाफ मुकदमे चलाने में पुलिस नाकाम रही.

रिपोर्ट में कहा गया कि सीसीटीवी और ऐसे खास रंग, जो दंगाइयों के शरीर पर लंबे समय तक निशान छोड़ देते हैं, जैसी तकनीकें आसानी से उपलब्ध थीं. इसके बावजूद पुलिस मामलों को अदालत तक ले जाने में समय और संसाधन लगाने से बचती रही.

इस वजह से कानून तोड़ने वालों का हौसला बढ़ा और सजा से बच निकलने की संस्कृति मजबूत होती गई.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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