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Monday, 19 October, 2026
होमदेशपांच साल में स्कूलों में अल्पसंख्यक छात्रों का दाखिला बढ़ा, धर्म के हिसाब से आंकड़े नहीं रखती सरकार

पांच साल में स्कूलों में अल्पसंख्यक छात्रों का दाखिला बढ़ा, धर्म के हिसाब से आंकड़े नहीं रखती सरकार

किरेन रिजिजू ने कहा, यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस में मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन समुदायों को एक साथ एक ही आंकड़े के रूप में दर्ज किया जाता है.

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नई दिल्ली: भारत के स्कूलों में अल्पसंख्यक समुदायों से आने वाले छात्रों का हिस्सा पिछले पांच सालों में चारों स्तरों पर बढ़ा है, लेकिन सरकार के पास धर्म के हिसाब से दाखिले या स्कूल छोड़ने वाले छात्रों के आंकड़े नहीं हैं. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने बुधवार को लोकसभा में यह जानकारी दी.

तमिलनाडु से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के सांसद सचिथानंदम आर के तारांकित सवाल के लिखित जवाब में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) में अधिसूचित छह समुदायों—मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन को सिर्फ एक साथ एक आंकड़े के रूप में दर्ज किया जाता है.

सदन में रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, प्राइमरी लेवल में अल्पसंख्यक छात्रों के दाखिले का हिस्सा 2021-22 में 18.8 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 21.8 प्रतिशत हो गया. यानी इसमें तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. अपर प्राइमरी लेवल पर यह हिस्सा 17.8 प्रतिशत से बढ़कर 19.6 प्रतिशत, मीडियम लेवल पर 16.4 प्रतिशत से बढ़कर 18.7 प्रतिशत और अपर प्राइमरी लेवलपर 15.1 प्रतिशत से बढ़कर 17.1 प्रतिशत हो गया.

हालांकि, इस बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा कुल छात्रों की घटती संख्या के बीच आया है. प्राइमरी लेवल पर कुल दाखिला 2021-22 में 12.18 करोड़ से घटकर 2025-26 में 10.19 करोड़ रह गया—यानी करीब 2 करोड़ बच्चों की कमी आई. प्राइमरी लेवल पर अल्पसंख्यक छात्रों का दाखिला इस दौरान बहुत कम घटा, 2.29 करोड़ से 2.22 करोड़ हुआ. इसका मतलब है कि कुल संख्या कम होने के बावजूद कुल छात्रों में अल्पसंख्यक छात्रों का हिस्सा बढ़ गया.

स्कूल छोड़ने वाले छात्रों के बारे में मंत्रालय ने कहा कि UDISE+ में इसकी दर सिर्फ सभी समुदायों को मिलाकर दर्ज की जाती है. इसमें समुदाय या धर्म के हिसाब से अलग-अलग आंकड़े नहीं हैं. मंत्रालय ने यह भी कहा कि मीडियम लेवल के लिए स्कूल छोड़ने की दर अलग से दर्ज नहीं की जाती है—जबकि इसी स्तर पर बच्चों के स्कूल छोड़ने की संभावना सबसे ज्यादा होती है.

सदन में रखे गए सभी समुदायों को मिलाकर आंकड़ों में हर साल काफी बदलाव दिखा. प्राइमरी लेवल पर स्कूल छोड़ने की दर 2021-22 में 1.45 से बढ़कर 2022-23 में 7.8 हो गई. इसके बाद यह घटकर 1.9 और फिर पिछले दो सालों में 0.3-0.3 हो गई. अपर प्राइमरी लेवल पर यह दर 3.02 से 8.1 के बीच रही. वहीं मीडियम लेवल पर, जो तीनों लेवल में सबसे ज्यादा थी, यह दर 2021-22 में 12.61 से घटकर 2025-26 में 9.5 हो गई.

हायर एजुकेशन के लिए मंत्रालय ने ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया. इसमें मुस्लिम छात्रों की संख्या अलग से दर्ज की जाती है और बाकी पांच समुदायों को “अन्य अल्पसंख्यक समुदाय” के रूप में एक साथ रखा जाता है.

2023-24 में, जो सबसे हाल का सर्वे वाला साल है, हायर एजुकेशन में मुस्लिम छात्रों की संख्या 22.53 लाख थी. इनमें 11.65 लाख महिलाएं थीं. बाकी अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों की कुल संख्या 10.80 लाख थी, जिसमें 5.71 लाख महिलाएं थीं. वहीं हायर एजुकेशन में कुल दाखिला 4.50 करोड़ था.

कोरोना महामारी वाले साल में मुस्लिम छात्रों का दाखिला घट गया था. यह 2019-20 में 21 लाख से घटकर 2020-21 में 19.22 लाख हो गया था. इसके बाद यह 2021-22 में बढ़कर 21.08 लाख और 2022-23 में 22.44 लाख हो गया.

मंत्री ने कहा कि हायर एजुकेशन में “स्कूल छोड़ने” की बात लागू नहीं होती क्योंकि छात्र कई विकल्पों में से चुनते हैं और अलग-अलग कोर्स और प्रोग्राम के बीच जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि AISHE एक सालाना दाखिला सर्वे है, इसलिए इसमें पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों का आंकड़ा दर्ज नहीं किया जाता.

रिजिजू ने कहा कि अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय देशभर में छह समुदायों के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक विकास के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं चलाता है. उन्होंने कहा कि स्कूल और उच्च शिक्षा से जुड़े आंकड़े क्रमशः शिक्षा मंत्रालय द्वारा UDISE+ और AISHE के जरिए जुटाए जाते हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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