नई दिल्ली: श्रीधर वंका की नजर लगातार घड़ी पर थी. ग्रेटर सिएटल एरिया में टेक्निकल प्रोग्राम मैनेजर के तौर पर काम करने वाले वंका को मई में मेटा की आखिरी छंटनी के दौरान नौकरी से निकाल दिया गया. H-1B वीजा नियमों के तहत उनके पास अमेरिका में नई नौकरी ढूंढने के लिए 60 दिन थे. पहले 30 दिन तक उन्होंने खुद को शांत रखने की कोशिश की. लेकिन समय बहुत जल्दी निकल गया. आखिर में उनके चार सदस्यीय परिवार के पास भारत लौटने के लिए सिर्फ वन-वे टिकट ही बचा. अब वह अपने शहर हैदराबाद वापस आ चुके हैं.
वंका ने कहा, “मौजूदा प्रशासन में स्थिति ज्यादा मुश्किल हो गई थी. आपको हर समय बहुत सावधान रहना पड़ता था कि कहीं आप किसी नियम को, चाहे वह सिर्फ कल्पना में ही क्यों न हो, पार न कर दें. पहले 30 दिन बाद हमें समझ आ गया था कि अब भारत लौटना पड़ेगा. फिर हमने उसी की तैयारी शुरू कर दी.”

अमेरिका में रहने वाले लाखों भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और उनके परिवारों के लिए अब इमिग्रेशन स्टेटस हर बातचीत का हिस्सा बन गया है. H1-B नियमों को ट्रंप 2.0 सरकार के दौरान ज्यादा सख्ती से लागू किए जाने के कारण अनिश्चितता और बढ़ गई है. भारत लौटने का टिकट अब सिर्फ बैकअप प्लान नहीं रह गया है. इस पूरी प्रक्रिया में उनकी मदद कर रही है ट्रांजिशन कंसल्टेंट्स की एक छोटी लेकिन तेजी से बढ़ती टीम. ये एचआर प्रोफेशनल्स उन्हें भारत लौटकर नई नौकरी पाने में मदद कर रहे हैं.
बेंगलुरु की टेक टैलेंट सॉल्यूशंस कंपनी एक्सफेनो के मुताबिक, 2025 में 15,000 से ज्यादा आईटी प्रोफेशनल्स अमेरिका से भारत लौटे. इस साल भी यही ट्रेंड जारी है. जून तक यह संख्या 7,300 पहुंच गई. एक्सफेनो ने NDTV को बताया कि आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ सकती है क्योंकि ज्यादा भारतीय टेक प्रोफेशनल्स “अमेरिकन ड्रीम से दूर हो रहे हैं.” यह उन लोगों की स्थिति बताने का एक नरम तरीका है जिन्हें ट्रंप की एंटी-इमिग्रेशन राजनीति के कारण अमेरिका छोड़ना पड़ रहा है.
जुलाई में ऑनलाइन फोरम ब्लाइंड ने भारत में 1,276 वेरिफाइड प्रोफेशनल्स पर सर्वे किया. इस सर्वे ने भी भारतीय टेक टैलेंट के अमेरिका से लौटने के इस ट्रेंड की पुष्टि की. सर्वे में 53 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने वीजा से जुड़ी अनिश्चितता के कारण लोगों को अमेरिका से लौटते देखा है. इनमें से 36 प्रतिशत ने कहा कि उनके सहकर्मी या उम्मीदवार पहले ही लौट चुके हैं. जबकि 17 प्रतिशत ने कहा कि उनके जानने वाले लोग लौटने की तैयारी कर रहे हैं.
2010 से अमेरिका में रह रहे एक भारतीय आईटी प्रोफेशनल ने, जिन्होंने नाम न बताने की शर्त पर द प्रिंट से बात की, कहा, “AI की वजह से अमेरिका में टेक नौकरियां कम हो रही हैं और इससे अनिश्चितता बढ़ रही है. इसके अलावा अब वहां की टेक कंपनियां ज्यादा अमेरिकी लोगों को नौकरी दे रही हैं, जो पहले टेक सेक्टर में ज्यादा रुचि नहीं रखते थे.”
अमेरिका में 15 साल से ज्यादा समय बिताने के बाद हैदराबाद लौटे स्नेहल कुलकर्णी अभी भी नई जिंदगी में खुद को ढाल रहे हैं. डेनवर की एक स्टेल्थ मोड स्टार्टअप में वह आखिरी बार इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इंजीनियरिंग के वाइस प्रेसिडेंट थे. अब उनका दिन अपने छह साल के बेटे को स्कूल छोड़ने से शुरू होता है. इसके बाद उनकी लगातार फाइनेंशियल प्लानर्स, संभावित कंपनियों और पुराने साथियों के साथ मीटिंग होती है. कुलकर्णी का कहना है कि ट्रैफिक को छोड़ दें तो उनकी जीवनशैली में अमेरिका के मुकाबले कोई कमी नहीं आई है.
उन्होंने कहा कि अमेरिका में रहने वाले कई भारतीय टेक प्रोफेशनल्स भारत लौटना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यहां के जॉब मार्केट में एंट्री कैसे करें, इसकी ज्यादा जानकारी नहीं होती.
उन्होंने कहा, “भारत लौटने वाले NRI के लिए कोई किताब या गाइड नहीं है. सब कुछ अनुभव पर निर्भर करता है. पिछले तीन साल में मैंने कई ऐसी कमियां देखीं जिन्हें भरने की जरूरत है.” उन्होंने यह भी कहा कि जिन अमेरिकी वीजा अधिकारियों से उनकी बात हुई, वे भी H1-B नियमों में हुए बदलावों से ज्यादा खुश नहीं थे.
दो हफ्ते पहले 14 साल से ज्यादा समय बाद हैदराबाद लौटे श्रीधर वंका ने कहा कि H1-B को लेकर अनिश्चितता नियमों से ज्यादा उनके लागू होने के तरीके को लेकर थी.
उन्होंने कहा, “जब मेरे पास नौकरी भी थी, तब भी भारत छुट्टी मनाकर अमेरिका लौटते समय मुझे हमेशा डर रहता था कि कहीं एयरपोर्ट पर मुझे रोक न लिया जाए. इस बार नियमों को लागू करने का तरीका ज्यादा अनिश्चित था और खतरा भी ज्यादा महसूस हो रहा था.”
उन्होंने बताया कि H1-B नियमों को बेहद सख्ती से लागू किए जाने के कारण कई भारतीय अपने परिवार की आपात स्थिति में भी भारत नहीं आ पाए.
उन्होंने कहा, “मैं कम से कम एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूं जिनके माता-पिता का निधन हो गया था. लेकिन वह भारत नहीं आए क्योंकि उन्हें डर था कि शायद वह दोबारा अमेरिका जाकर अपनी नौकरी और अपनी जिंदगी वापस नहीं पा सकेंगे.”
यह स्थिति पिछले कुछ वर्षों से धीरे-धीरे बन रही थी. ट्रंप की राजनीति ने सिर्फ इसमें आखिरी धक्का दिया.
यह बदलाव कोविड के बाद शुरू हुए एक बड़े ट्रेंड के साथ भी जुड़ा है. भारतीय आईटी कंपनियां अब H1-B वीजा पर अपनी निर्भरता कम कर रही हैं और भारत से ऑफशोरिंग बढ़ा रही हैं. वहीं अमेरिकी टेक कंपनियां कनाडा और मेक्सिको जैसे देशों से अमेरिकी क्लाइंट्स के लिए काम करने वाले कर्मचारियों को ज्यादा भर्ती कर रही हैं. इसे नियरशोरिंग कहा जाता है.
नियरशोरिंग मॉडल को सितंबर 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के एक प्रोक्लेमेशन से भी बढ़ावा मिला. इसमें कहा गया कि उसके बाद दाखिल होने वाली कुछ H-1B याचिकाओं के साथ पात्रता की शर्त के तौर पर अतिरिक्त 1 लाख डॉलर का भुगतान करना होगा.
नौकरी का बाजार बदलाव के दौर में
वह दौर अब खत्म हो चुका है जब 2000 के दशक में अमेरिका से लौटे NRI भारतीय हेडहंटर्स की पहली पसंद होते थे और उन्हें बड़ी-बड़ी सैलरी ऑफर की जाती थी. आज भारत का जॉब मार्केट भी छोटा हो गया है.
भारत लौटने के बाद NRI होने का फायदा मिलने की उम्मीद रखने वाले कई आईटी प्रोफेशनल्स अब ऐसे जॉब मार्केट में पहुंच रहे हैं जो बदलाव के दौर से गुजर रहा है.

करीब 35 साल से NRI को भारत लौटने में मदद कर रहे हैदराबाद के कंसल्टेंट अच्युत मेनन ने कहा, “जॉब मार्केट खराब है. मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूं जो अमेरिका से लौटा. उसने कम से कम 500 नौकरियों के लिए आवेदन किया लेकिन सिर्फ ऑटोमेटेड जवाब मिले. इसके बाद ज्यादातर लोग खुद में सिमट जाते हैं.”
मेनन ने कहा कि वह हर हफ्ते ऐसे करीब 10 मामलों को संभालते हैं.
उन्होंने कहा, “पिछले 10 साल में भारतीय आईटी सेक्टर ने इतनी बेरोजगारी और कम रोजगार पहले कभी नहीं देखा.”
बेंगलुरु की ट्रांजिशन कंसल्टेंट और लेखिका नुपुर दवे भी इससे सहमत हैं. वह NRI को भारत लौटने की योजना बनाने में मदद करती हैं.
उन्होंने द प्रिंट से कहा, “इनमें ज्यादातर मिड-करियर प्रोफेशनल्स होते हैं या फिर ऐसे युवा जिनकी पहली नौकरी अमेरिका में लगी थी और अब वे भारत लौटना चाहते हैं. लेकिन मेरी नजर में मिड-करियर प्रोफेशनल्स ज्यादा हैं.”
अमेरिका में गूगल में काम कर चुकी नुपुर दवे ने दो किताबें लिखी हैं. Back Home: An Emotional Guide for NRIs Who Are on the Fence about Moving to India (बैक होम: उन NRI के लिए एक इमोशनल गाइड जो भारत लौटने के बारे में सोच-विचार कर रहे हैं) और The Unsettled NRI: The NRI’s Guide to Combating Loneliness, Pressure and Worry (अनसेटल्ड NRI: अकेलेपन, दबाव और चिंता से निपटने के लिए NRI की गाइड)
इंस्टाग्राम पर उनके 1.06 लाख फॉलोअर्स हैं, जिनमें ज्यादातर NRI हैं. वे म्यूचुअल फंड निवेश, ऑफिस फीडबैक, भारतीय टैक्स सिस्टम और दो अलग पहचान के बीच की दुविधा जैसे हर विषय पर उनसे सलाह लेते हैं.
दवे ने कहा कि पिछले दो साल में उनके सोशल मीडिया पर आने वाले सवालों की संख्या बढ़ी है.
उन्होंने कहा, “करीब 30-40 सवाल हर महीने आते हैं. इसमें सोशल मीडिया की बढ़ती पहुंच का भी असर है क्योंकि अब ज्यादा लोग मुझे जानते हैं. लेकिन अगर यह समान भी रहता, तब भी AI से जुड़ी छंटनी के कारण सवाल बढ़े हैं.”
उन्होंने कहा कि किसी NRI का भारत लौटने का फैसला कई कारणों का नतीजा हो सकता है.
उन्होंने कहा, “कभी कोई एक घटना वजह बनती है, तो कभी लंबे समय से बढ़ता दबाव. एक व्यक्ति ने मुझसे कहा कि मैंने अमेरिका को बहुत कुछ दिया, लेकिन बदले में उसने मुझे कुछ नहीं दिया. फिर मैं उसके प्रति वफादार क्यों रहूं.”
दवे के मुताबिक, उनसे संपर्क करने वाले ज्यादातर NRI अपने पैसों, बच्चों के स्कूल और भारत लौटने के बाद नौकरी मिलने को लेकर चिंतित रहते हैं.
उन्होंने पूरी प्रक्रिया समझाते हुए कहा कि ज्यादातर लोग उनका कंटेंट देखने के बाद सोशल मीडिया के जरिए उनसे संपर्क करते हैं. इसके बाद वे एक इंट्रो फॉर्म भरते हैं, जिससे उनकी समस्या और चिंता समझी जाती है. फिर 90 मिनट की कंसल्टेशन होती है. इसके बाद एक प्लान बनाया जाता है और जरूरत के हिसाब से सही लोगों से जोड़ा जाता है.
उन्होंने कहा, “अगर मुझे लगता है कि कोई सही व्यक्ति है, कोई कंपनी भर्ती कर रही है और यह व्यक्ति उसके लिए सही है, तो मैं उन्हें मिला सकती हूं. लेकिन मैं ऐसा नियमित रूप से नहीं करती क्योंकि बहुत से लोग कहते हैं कि नौकरी की गारंटी दे दीजिए, जबकि कोई भी नौकरी की गारंटी नहीं दे सकता.”
कुलकर्णी ने कहा कि उन्होंने अभी नौकरी की तलाश शुरू नहीं की है. वहीं वंका ने जल्दी शुरुआत कर दी थी. उन्होंने बताया कि अमेरिका में अपने आखिरी दिनों को “भावनात्मक रोलर कोस्टर” बताते हुए लिंक्डइन पर पोस्ट लिखने के बाद उन्हें बड़ी संख्या में लोगों के जवाब मिले.
उन्होंने कहा, “जब मैं फ्लाइट में था, तभी लोग मुझसे संपर्क करने लगे थे. जैसे ही मैं उतरा, इंटरव्यू शुरू हो गए. और अगले ही दिन मुझे नौकरी का ऑफर मिल गया.”
वंका ने यह भी कहा कि अमेरिका की तरह भारत में भी गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी टेक कंपनियों का जॉब मार्केट काफी बंद सा है.
उन्होंने कहा, “यह एक मजबूत दीवार की तरह है. आपको पता ही नहीं चलता कि अंदर क्या हो रहा है. आप अपना रिज्यूमे भेज देते हैं और फिर कोई जवाब नहीं आता. कभी-कभी किस्मत अच्छी हो तो जवाब मिल जाता है.”
‘टैलेंट बाद में आता है’
ऐसे कई आईटी प्रोफेशनल्स के लिए, जिनकी अमेरिका में ज़िंदगी एक वर्क वीजा पर टिकी होती है, यह पूरी प्रक्रिया किसी सजा से कम नहीं होती.
करीब एक महीने पहले Reddit पर शेयर की गई ऐसी ही एक कहानी बताती है कि H1-B वीजा रखने वालों के लिए अमेरिकी सपना कितना अस्थिर हो चुका है.
उसने 11 साल तक अमेरिकी सपना पूरा करने की कोशिश की. पढ़ाई की, कॉर्पोरेट नौकरी की, कार खरीदी. लेकिन इस पूरी कहानी में एक चीज हमेशा अधूरी रही. H-1B वीजा.
उसने 11 जुलाई को Reddit पर लिखा, “आप हमेशा एक छंटनी या एक लॉटरी रिजेक्शन दूर होते हैं अपना सामान पैक करने से. यह डर कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता.” दो महीने पहले उसने फैसला किया कि अब और इंतजार नहीं करेगा. उसने “वन-वे टिकट खरीदा और भारत लौट आया.” उसने अपनी पोस्ट खत्म करते हुए लिखा, “अमेरिका में पहले आपका वीजा देखा जाता है, उसके बाद आपका टैलेंट. यहां मैं सिर्फ एक ऐसा इंसान हूं जिसके पास स्किल्स हैं और जो योगदान देना चाहता है.”
मेनन के मुताबिक, पिछले 10 साल में अमेरिका में वर्क वीजा हासिल करने की प्रक्रिया और भी मुश्किल हो गई है क्योंकि दुनिया “डी-ग्लोबलाइजेशन” की तरफ बढ़ रही है.
उन्होंने कहा, “हर देश अपने नागरिकों को बचाने की कोशिश कर रहा है. इसी वजह से कई देशों ने या तो वर्क वीजा की फीस बढ़ा दी है या पूरी प्रक्रिया को ज्यादा मुश्किल बना दिया है.”
हालांकि, इस रिवर्स माइग्रेशन से एक अच्छी बात भी हुई है. अमेरिका से लौटने वाले सभी भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स यहां नौकरी करने नहीं आ रहे. कई लोग भारत में रोजगार और नए मौके पैदा करने के लिए लौट रहे हैं.
डेव ने कहा, “मेरे 60 प्रतिशत से ज्यादा ऑडियंस अपना खुद का बिजनेस शुरू करना चाहती है. एनआरआई बहुत उत्साहित हैं, लेकिन उन्हें समझ नहीं आता कि शुरुआत कहां से करें.”
नए मौके बना रहे हैं
नितिन हसन ने कभी अमेरिका में हमेशा के लिए बसने की योजना नहीं बनाई थी. उनका प्लान हमेशा भारत लौटने का था. 2023 में Meta, Amazon और Microsoft जैसी कंपनियों में 15 साल से ज्यादा काम करने के बाद वह भारत लौट आए. 43 वर्षीय हसन ने बेंगलुरु में Dolfyn Brands और B2I Elite Club की शुरुआत की. Dolfyn Brands AI आधारित ब्रांड सॉल्यूशंस देता है, जबकि B2I Elite Club भारत लौटने वाले एनआरआई को सामाजिक और पेशेवर तौर पर फिर से बसने में मदद करता है.

हसन ने कहा, “99 प्रतिशत लोग इसलिए वापस नहीं आ रहे क्योंकि वे आना चाहते थे. वे तब लौटते हैं जब उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचता. भारत आने के बाद उन्हें पहले की तुलना में सिर्फ दसवां हिस्सा सैलरी मिलती है.”
उन्होंने कहा कि जब तक कोई अपने “NRI इमेज” का फायदा नहीं उठा सकता या निवेशक नहीं ला सकता, तब तक यहां कोई उनके लिए रेड कार्पेट नहीं बिछाता.
उन्होंने कहा कि भारत लौटने वाले आईटी प्रोफेशनल्स की पहली पसंद अभी भी कोई दूसरा बेहतर देश तलाशना होती है. “अगर वे भारत भी आते हैं तो उसे अस्थायी मानते हैं. जैसे ही मौका मिलता है, वे फिर बाहर जाना चाहते हैं.”
हसन की तरह 35 वर्षीय प्रज्वल राजेंद्र प्रसाद और उनकी 33 वर्षीय पत्नी चंदना ने भी काफी पहले ही तय कर लिया था कि उन्हें भारत लौटकर शिक्षा के क्षेत्र में काम करना है.
प्रसाद ने कहा, “हम पहले भी मेंटरशिप प्रोग्राम करते थे. हमें शिक्षा में हमेशा रुचि थी. अमेरिका में रहते हुए भी जब भारत आते थे, तो अपने गांव के बच्चों को साइंस और आर्ट पढ़ाते थे.”
प्रसाद 2014 में ग्रेजुएशन के बाद अमेरिका गए थे. उन्होंने जॉर्जिया टेक, अटलांटा से कंप्यूटर साइंस में मास्टर्स किया. उनकी पहली नौकरी Oracle में टेक लीड की थी. नवंबर 2024 में वह Oracle में ही काम कर रहे थे, जब वह भारत लौटे. उनसे दो महीने पहले उनकी पत्नी चंदना Meta की नौकरी छोड़कर भारत आ गई थीं. फरवरी 2025 में प्रसाद ने भी Oracle की नौकरी छोड़ दी.
प्रसाद ने माना कि भारत लौटना आसान नहीं है, लेकिन “बहुत से लोग इसकी योजना बना रहे हैं.”
उन्होंने कहा, “लोग यह तय कर रहे हैं कि अमेरिका वाला घर बेचें या रखें. भारत में निवेश करें या नहीं.”
भारत लौटने के बाद प्रसाद और उनकी पत्नी ने Polygnan शुरू किया. यह इंजीनियरिंग छात्रों के लिए एक लर्निंग और कम्युनिटी प्लेटफॉर्म है, जो प्रैक्टिकल लर्निंग, एंटरप्रेन्योरशिप, AI अपस्किलिंग और इंडस्ट्री एक्सपोजर के जरिए कर्नाटक के छात्रों की मदद करता है.
नुपुर डेव के मुताबिक, भारत लौटकर देश को कुछ वापस देने की सोच कोई अपवाद नहीं बल्कि आम बात है. वे नौकरी ढूंढने के बजाय रोजगार देने वाले बनना चाहते हैं.
लेकिन भारत में बिजनेस शुरू करना भी आसान नहीं है.
‘भरोसे की कमी’
हसन ने कहा कि स्टार्टअप शुरू करने के मामले में अमेरिका और भारत में काफी अंतर है. इसकी वजह उन्होंने “चुनौतियां” बताईं.
उन्होंने कहा, “इन्फ्रास्ट्रक्चर, सरकारी व्यवस्था, इंसेंटिव और यहां काम करने का तरीका अमेरिका से बिल्कुल अलग है. यहां की नीतियां उस तरह नहीं बनी हैं.”
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, “अमेरिका में कंपनी रजिस्टर करने में 24 घंटे से भी कम समय लगता है. लेकिन भारत में मेरा अनुभव अलग रहा. यहां कंपनी रजिस्टर होने में चार से छह महीने लग गए. भारतीय स्टार्टअप सिस्टम से मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी.”
स्नेहल कुलकर्णी भी हसन की बात से सहमत हैं. उन्होंने कहा कि भारत लौटने वाले कई आईटी प्रोफेशनल्स भारतीय बाजार में आना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें तरीका नहीं पता.
उन्होंने कहा कि यहां नियोक्ताओं और नौकरी तलाशने वालों के बीच “भरोसे की कमी” है. भारत में आज भी ज्यादातर भर्ती रेफरल के आधार पर होती है.
उन्होंने कहा, “भारत में अभी तक ऐसा सिस्टम नहीं है जो विदेश से लौटे लीडर्स की प्रोफाइल का सही आकलन कर सके.”
हालांकि, कुलकर्णी भारत के भविष्य को लेकर आशावादी हैं.
उन्होंने कहा, “अगले 10 से 15 साल में भारत बहुत बेहतर स्थिति में होगा. मैं हर लीडर को सलाह दूंगा कि अगर भारत लौटना है तो अगले तीन-चार साल में योजना बनाकर लौट आएं. अगर पांच या आठ साल बाद आएंगे तो मौका हाथ से निकल जाएगा.”
इस बड़े रिवर्स माइग्रेशन के तहत भारत लौट रहे आईटी प्रोफेशनल्स के लिए यह एहसास अजीब भी है और अपना भी.
जैसा कि Reddit पर एक पोस्ट में लिखा गया.
“भारत लौटने के बाद का कल्चर शॉक सच में होता है. ट्रैफिक बहुत ज्यादा है, उमस परेशान करती है और यह समझने में काफी मेहनत लगेगी कि किस बिजनेस समस्या पर काम करना चाहिए. लेकिन किसी नौकरी के लिए आवेदन करते समय अब इमिग्रेशन का डर सिर पर नहीं रहता. मुझे पता है कि मैंने सही फैसला लिया है. घर लौटना अच्छा लग रहा है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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