छत्रपति संभाजीनगर/बीड/जालना: स्पेनिश शब्द एल नीनो इस साल ग्रामीण महाराष्ट्र में आम बोलचाल का हिस्सा बन गया है. बार-बार सूखे का सामना करने वाले इस इलाके के लिए इस साल हालात कुछ अलग रहे. आमतौर पर कुएं दिसंबर तक सूख जाते हैं, लेकिन अभी अक्टूबर ही है और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके के गांवों में लोग पहले से ही पानी के लिए परेशान हो रहे हैं.
नल सूख चुके हैं, खेतों की ज़मीन फट गई है और सूखकर बंजर हो रही है. परिवार पानी के हर मग को ऐसे संभालकर रख रहे हैं, जैसे वह सोना हो.
ऐसा नहीं है कि लोगों को आने वाले संकट की जानकारी नहीं थी.
मार्च में ही सरकारी अधिकारियों ने गांवों को एल नीनो के आने की चेतावनी देना शुरू कर दिया था. यह दुनिया की जलवायु से जुड़ी एक घटना है, जिसके कारण भारत में मानसून के दौरान कम बारिश हो सकती है, लेकिन जून में खूब बारिश होने से किसानों को लगा कि अब कोई परेशानी नहीं होगी.
कई किसानों ने मौसम के अनुमान पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और गन्ने, कपास और सोयाबीन की खेती में पैसा, बीज और पहले से कम उपलब्ध पानी लगा दिया. अब जब बारिश की कमी बढ़ती जा रही है, तो पहले दी गई चेतावनियां सच साबित हो रही हैं. किसानों के लिए अब बहुत देर हो चुकी है.
मराठवाड़ा में पिछले कई दशकों के सबसे खराब सूखे का खतरा मंडरा रहा है. इलाके की 76 में से 74 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित किया जा चुका है. बुजुर्ग किसानों को 1972 के भयानक सूखे की याद आ रही है. यह महाराष्ट्र के आज़ादी के बाद के इतिहास के सबसे खराब सूखों में से एक था और राज्य में खेती से जुड़े संकट के लिहाज से एक बड़ा मोड़ साबित हुआ था.

इसके बावजूद ऐसा लगता है कि कुछ भी नहीं बदला है. पिछले संकटों से कोई सबक नहीं सीखा गया है और खेती करने के तरीकों में कोई बदलाव नहीं आया है. ज्यादा पानी लेने वाली फसलें अब भी उगाई जा रही हैं. टिकाऊ खेती और पानी बचाने के तरीकों पर अब भी पर्याप्त निवेश नहीं किया जा रहा है. राज्य में सूखे का वही पुराना सिलसिला बार-बार दोहराया जा रहा है.
बीड जिले के अंबेसावली गांव के पंचायत सचिव चक्रधर हेंद्र ने कहा, “हमने अपने गांव की खेती की ज़मीन का सर्वे किया है और हमारे पास सिर्फ इतना पानी है कि अगले 15 दिन तक काम चल सके. हमने सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की है और उनसे पानी के टैंकर भेजने की व्यवस्था शुरू करने को कहा है. हमने अक्टूबर में कभी इतना बड़ा संकट नहीं देखा.”
छत्रपति संभाजीनगर के जिलाधिकारी विनय गौड़ा ने कहा, “हमारे शुरुआती आकलन से पता चलता है कि हमारे जलाशयों में सिर्फ करीब 31 प्रतिशत पानी बचा है. मवेशियों के चारे की भी इतनी ही व्यवस्था है कि फरवरी तक काम चल सके, लेकिन अगर बारिश के बिना सूखे दिन जारी रहे, तो हमें परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.”
हेंद्र के मुताबिक, अंबेसावली के लिए सूखा कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले दो साल से गांव बाढ़ से जूझ रहा था. सड़कें और खेत पानी में डूब गए थे. किसी ने नहीं सोचा था कि गांव में इतनी जल्दी बहुत ज्यादा पानी की स्थिति से लगभग पानी खत्म होने जैसी हालत हो जाएगी.
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों से पता चलता है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून मराठवाड़ा से करीब 39 प्रतिशत कम बारिश के साथ विदा हुआ. यह राज्य में बारिश की सबसे बड़ी कमी है. इसके बाद विदर्भ में करीब 27 प्रतिशत कम बारिश हुई. 25 सितंबर को महाराष्ट्र सरकार ने एक सरकारी आदेश जारी कर राज्य की 265 तहसीलों को आधिकारिक तौर पर सूखा प्रभावित घोषित कर दिया. इनमें लातूर, बीड, छत्रपति संभाजीनगर, जालना, धाराशिव और नांदेड़ भी शामिल हैं.
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के पूर्व सचिव और मानसून में बदलाव और उसके पूर्वानुमान पर काम करने वाले वरिष्ठ शोधकर्ता माधवन नायर राजीवन ने चेतावनी दी कि आने वाले महीने मुश्किल भरे हो सकते हैं.
उन्होंने कहा, “भारत में मानसून के दौरान कम बारिश का असर कृषि उत्पादन और पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है. खासकर उन इलाकों में, जहां पहले से ही पानी की कमी है. लेकिन इसका असर यहीं तक सीमित नहीं रहेगा. हमें आने वाले महीनों में इस मजबूत एल नीनो का असर जारी रहने की उम्मीद करनी चाहिए. आने वाली सर्दियां सामान्य से ज्यादा गर्म हो सकती हैं. इसके बाद मानसून से पहले का मौसम भी काफी गर्म और मुश्किल भरा हो सकता है. इस दौरान भीषण लू चलने का खतरा बढ़ सकता है.”
सूखे के लिए रिएक्शन बनाम तैयारी
विदर्भ इलाके के बुलढाणा में पोस्टेड एग्रीकल्चर ऑफिसर महेश दामोदर, सूखे के असर को कम करने के लिए पिछले दस साल में शुरू की गई लॉन्ग-टर्म स्कीम के बारे में सोचने के लिए एक पल रुकते हैं. वह अपना सिर खुजलाते हैं और आखिर में हार मानने से पहले हाथ में पेन क्लिक करते हैं.
उन्होंने शर्माते हुए कहा, “मुझे पक्का नहीं पता कि कोई स्कीम है भी या नहीं.”
दामोदर जैसे एग्रीकल्चर ऑफिसर, जो ज़मीन पर इस संकट को मैनेज कर रहे हैं, खुद को जवाबों के लिए जूझते हुए पाते हैं. मुआवज़े के लिए फसल के नुकसान का अंदाज़ा लगाने के लिए फील्ड सर्वे करने का काम सौंपे जाने पर, इन फ्रंट-लाइन अधिकारियों को अक्सर लोगों के गुस्से और निराशा का सामना करना पड़ता है.
उनका एक और तुरंत का काम गांव वालों को संकट के बारे में समझाना है, जिनमें से कई यह नहीं समझते कि हज़ारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर में शुरू होने वाली एक ग्लोबल क्लाइमेट घटना यह कैसे तय कर सकती है कि उनकी फसलें बचेंगी या नहीं. गांवों में, अधिकारियों ने अनियमित बारिश के असर को बताने और आने वाले सूखे महीनों के लिए लोगों को तैयार करने के लिए हर हफ़्ते मीटिंग करना शुरू कर दिया है.

लेकिन सरकार की गांववालों से बातचीत इन फील्ड ऑफिसर्स से आगे शायद ही कभी बढ़ती है. बीड, जालना और छत्रपति संभाजीनगर जिलों के लोगों का कहना है कि चुने हुए विधायक–जो चुनाव के मौसम में रेगुलर आते हैं–अभी तक उनकी परेशानियां सुनने नहीं आए हैं.
दिप्रिंट ने बीड के NCP (SP) के MLA संदीप रवींद्र क्षीरसागर से कॉल, टेक्स्ट और ईमेल के ज़रिए संपर्क करने की कोशिश की. जवाब मिलने पर यह रिपोर्ट अपडेट कर दी जाएगी.
इस इलाके की पॉलिटिकल ताकत को देखते हुए यह गैर-मौजूदगी खास तौर पर चौंकाने वाली है. बीड जिले ने कई हाई-प्रोफाइल नेता दिए हैं, जिनमें BJP की पंकजा मुंडे, जो अभी महाराष्ट्र की एनवायरनमेंट और क्लाइमेट चेंज मिनिस्टर हैं और एनसीपी के धनंजय मुंडे, जो पहले एग्रीकल्चर मिनिस्टर थे, शामिल हैं. सबसे ज़्यादा प्रभावित जिलों में से एक लातूर का प्रतिनिधित्व महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने पांच बार किया था.
सरकार इस इलाके में [पानी ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली] फसलों की खेती को सपोर्ट करना जारी नहीं रख सकती और यह उम्मीद नहीं कर सकती कि किसान जादुई तरीके से दूसरी फसलें उगा लेंगे. जब तक कोई मज़बूत विकल्प नहीं मिलता जिससे बराबर या ज़्यादा इनकम और बेहतर सरकारी मदद मिले, किसान ज़्यादा पानी वाली ये फसलें उगाते रहेंगे.
–नरहरि शिवपुरे, ग्राम विकास संस्था
यह आने वाला संकट महीनों पहले से ही महाराष्ट्र की पॉलिटिकल रडार पर था. जून के मॉनसून सेशन से पहले, शिवसेना (UBT) लीडर भास्कर जाधव ने एल नीनो की चेतावनियों को देखते हुए सरकार की तैयारियों पर सवाल उठाए. NCP (SP) लीडर जयंत पाटिल ने भी राज्य के घटते रिज़र्वॉयर लेवल पर ध्यान दिलाया, जो पिछले साल के 31 परसेंट के मुकाबले जून में 23 परसेंट था.
यह सूखा पिछले कुछ सालों में किसानों की मदद के लिए चलाई गई स्कीमों और मज़बूती के उपायों का असर दिखा सकता था. इसके बजाय, इस साल के संकट ने उस कमी को सामने ला दिया है जिसे एक्सपर्ट और किसान उस मदद में कमी बताते हैं. साल दर साल, सरकारी दखल रिएक्टिव रहा है, फ़सलें खराब होने या पानी के सोर्स सूख जाने के बाद दखल देता है, बजाय इसके कि किसानों को लंबे समय तक सूखे का सामना करने के लिए मज़बूत खेती का सिस्टम बनाने में मदद करे.

वर्ल्ड बैंक से मदद वाली नानाजी देशमुख कृषि संजीवनी प्रकल्प जैसी बड़ी योजनाएं, जिनका मकसद छोटे किसानों के खेतों को मौसम के हिसाब से ज़्यादा मज़बूत और फायदेमंद बनाना था और केंद्र की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जो फसल बीमा देती है, भी छोटे गांवों तक नहीं पहुंच पाई हैं.
जबकि महाराष्ट्र सिंचाई में भारी फंड डालने का दावा करता है, ये निवेश ऐसे प्रोजेक्ट्स के नेटवर्क में बदलने में नाकाम रहे हैं जो सूखे की आशंका वाले इलाकों को बार-बार होने वाले पानी के संकट से बचा सकें.
2018 में, केंद्र ने महाराष्ट्र को “सूखा-प्रूफ” बनाने के लिए 91 पेंडिंग सिंचाई प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए 13,651 करोड़ रुपये मंज़ूर किए थे. 2024-25 तक, पैकेज के तहत जारी की गई केंद्रीय मदद लगभग 3,024 करोड़ रुपये थी, सरकारी कागज़ात में दावा किया गया था कि 2.16 लाख हेक्टेयर सिंचाई की क्षमता बनाने के लिए 70 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं.
हालांकि, अभी भी बहुत ज़्यादा बैकलॉग है. इस साल अप्रैल में, राज्य कैबिनेट को दिए गए डेटा से पता चला कि 2022 से मंज़ूर 225 सिंचाई प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए और 2.56 लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत होगी.
ज़मीनी हकीकत बिना तैयारी के रिएक्शन का एक लगातार चलने वाला चक्र है.
रिजर्वायर सूख रहे हैं
एक साल पहले, मराठवाड़ा के आठ ज़िलों में बहुत ज़्यादा बारिश हुई थी—947 mm जबकि नॉर्मल बारिश 679.55 mm होती है. इस साल, उन्हें सिर्फ 445 mm बारिश मिली. लातूर पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा, जहां नॉर्मल बारिश से लगभग आधी बारिश हुई: 362.7 mm जबकि नॉर्मल बारिश 706 mm होती है.
छत्रपति संभाजीनगर के कलेक्टर और डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट विनय गौड़ा, जो भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है, ने दिप्रिंट को बताया कि ज़िले की दस में से नौ तहसीलों (सब-डिस्ट्रिक्ट) को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया गया है.
केंद्र सरकार के सूखा मैनेजमेंट मैनुअल के तहत, प्रभावित तहसीलें ‘ट्रिगर-1’ पर पहुंच गई हैं, जो तीन-स्टेप प्रोसेस में पहली खतरे की घंटी है. यह तब एक्टिवेट होता है जब इंडिकेटर्स का कॉम्बिनेशन तय लिमिट को पार कर जाता है जिसमें 21 दिनों से ज़्यादा का सूखा, बारिश में बदलाव, और स्टैंडर्ड बारिश के मेट्रिक्स शामिल हैं.

मैनुअल में कहा गया है कि खरीफ (जून में शुरू) या रबी (नवंबर में शुरू) के समय में मौसमी बारिश में 50 प्रतिशत या उससे ज़्यादा की कमी, या कुल मौसमी कमी 25 प्रतिशत से ज़्यादा होने पर, अपने आप ‘ट्रिगर-1’ एक्टिवेट हो जाता है. ट्रिगर-2 सूखे के असर का आकलन करता है, जबकि आखिरी स्टेज में गंभीरता और ज़रूरी राहत का पता लगाने के लिए फील्ड चेक शामिल हैं.
गौड़ा ने कहा, “हमारे जिले में समस्या असमान बारिश रही है. अगस्त और सितंबर में, छत्रपति संभाजीनगर में सामान्य बारिश का सिर्फ 35 प्रतिशत ही हुआ है. इससे खेती की पैदावार में भारी गिरावट आई है.”
पौधे चार से पांच फीट लंबे और कपास के फूलों से लदे होने चाहिए, लेकिन बारिश न होने की वजह से खेत पूरी तरह सूखे हैं–परमेश्वर शिंदे, अंबेसावली सरपंच
उन्होंने आगे कहा कि इस इलाके की एकमात्र राहत 50 साल पुराना जयकवाड़ी डैम है, जिसकी कैपेसिटी 2,909 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) है. यह डैम प्रभावित गांवों से लगभग 50-100 किलोमीटर दूर है, और नासिक की तरफ ज़्यादा बारिश होने की वजह से इसमें दूसरे जलाशयों के मुकाबले ज़्यादा पानी है. इसके जैसे दूसरे जलाशय, जैसे माजलगांव, सिना कोलेगांव और येलदारी जलाशय पहले ही क्रिटिकल लेवल पर पहुंच चुके हैं. राज्य के वॉटर रिसोर्स डिपार्टमेंट के पोर्टल के मुताबिक, इनका वॉटर लेवल 25-40 परसेंट के बीच है.
डीएम गौड़ा ने आगे कहा, “सूखे के मैनेजमेंट के नियमों के मौजूदा स्टेज में, हम नुकसान का अंदाज़ा लगाने के लिए ग्राउंड-लेवल सर्वे कर रहे हैं. हमारे शुरुआती अंदाज़े से पता चलता है कि हमारे जलाशयों में सिर्फ लगभग 31 परसेंट पानी है और फरवरी तक के लिए जानवरों का चारा भी बस इतना ही है, लेकिन अगर सूखा जारी रहा, तो हमें दिक्कत हो सकती है.” अभी के लिए, सूखे के मैनेजमेंट के लिए प्रशासन का टूलकिट नालों से मौसमी गाद निकालने और नए कुएं खोदने तक ही सीमित है.
गाद निकालने का काम राज्य के सालाना प्री-मॉनसून प्रोटोकॉल का हिस्सा है ताकि पानी के चैनल साफ रहें ताकि बारिश का पानी स्थानीय कुओं और जलाशयों तक पहुंच सके और ग्राउंडवाटर को रिचार्ज किया जा सके.
गौड़ा ने कहा, “हमने उन गांवों की भी पहचान की है जहां नए कुएं और बावड़ियां खोदी जाएंगी. इससे यह पक्का होगा कि जब भी बारिश हो, तो पानी भविष्य में इस्तेमाल के लिए जमा हो जाए.”
बिना समाधान के कामचलाऊ काम
मराठवाड़ा के ज़्यादातर गांवों में पानी इतना कम हो गया है कि कुओं और आस-पास के तालाबों से पानी अब सिर्फ पीने और दूसरी ज़रूरी ज़रूरतों तक ही इस्तेमाल होता है. कंस्ट्रक्शन जैसे ज़्यादा पानी वाले कामों पर भी कड़ी रोक लगा दी गई है. अब गांव की टूटी सड़कों पर टैंकर चल रहे हैं.
लेकिन यह संकट सबसे ज़्यादा खेतों में दिख रहा है. अक्टूबर की तेज़ धूप में, कपास के डंठल कमज़ोर हो गए हैं, सोयाबीन के पत्ते मुड़ गए हैं और मुरझा गए हैं, और किसानों के पैरों तले की मिट्टी उखड़ गई है.

मराठवाड़ा का क्लाइमेट संकट कोई नई बात नहीं है. हर साल, यह इलाका बार-बार सूखे और लंबे समय तक पानी की कमी का शिकार होता है. इन बार-बार आने वाले झटकों के बावजूद, अभी भी कोई भरोसेमंद, लंबे समय की स्ट्रेटेजी नहीं है जिस पर किसान या खेती से जुड़े अधिकारी बारिश न होने पर भरोसा कर सकें. रिएक्शन-मोड से ही सरकार हर बार संकट से निपटती है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने और ज़्यादा क्लाइमेट-रेज़िलिएंट खेती के तरीके अपनाने में मदद करने के बजाय, सरकार खेती के ऐसे तरीकों को बढ़ावा दे रही है जो उसके सीमित पानी के रिसोर्स पर बहुत ज़्यादा दबाव डालते हैं. इससे आने वाले सालों में किसानों को सूखे का और भी ज़्यादा खतरा हो सकता है, क्योंकि बारिश का इतिहास लगातार बदलता रहा है.
ग्राम विकास संस्था के फाउंडर सेक्रेटरी नरहरी शिवपुरे ने कहा, “मराठवाड़ा इलाका क्लाइमेट संकट के लिए सबसे ज़्यादा खतरे वाले इलाकों में से एक है. इस साल इसका असर एल नीनो की वजह से हुआ है, लेकिन पिछले दस सालों में हमने कई बार सूखा देखा है. सरकार को भरोसेमंद लंबे समय के समाधान निकालने चाहिए और हर बार इन घटनाओं पर रिएक्ट नहीं करना चाहिए.” यह संस्था मराठवाड़ा के किसानों के साथ पानी और मिट्टी बचाने पर काम करने वाली एक नॉन-प्रॉफिट संस्था है.
जब फसलें धूल में बदल जाती हैं
बीड के अंबेसावली गांव के नए चुने गए सरपंच, 29 साल के परमेश्वर शिंदे ने पिछला हफ्ता अपने खेतों का सर्वे करने में बिताया. साल के इस समय, ज़मीन के बड़े-बड़े हिस्से में हरी-भरी फसलें होनी चाहिए. इसके बजाय, खेत धूल और मरते हुए पौधों का राख जैसा ढेर हैं.
शिंदे नीचे झुकते हैं, एक छोटा, मुरझाया हुआ कपास का पौधा निकालते हैं और उसे अपनी हथेलियों के बीच दबाते हैं. जब वह अपनी मुट्ठी खोलते हैं, तो सूखा तना चूर्ण बन चुका होता है.

शिंदे ने कहा, “पौधे चार से पांच फीट लंबे होने चाहिए और कपास के फूलों से लदे होने चाहिए, लेकिन बारिश न होने के कारण, खेत पूरी तरह सूखे हैं.” पंचायत के शुरुआती सर्वे से पता चलता है कि इस साल सूखे से गांव की लगभग 90 प्रतिशत फसलें खराब हो गई हैं.
गांव में आखिरी बार जून में बारिश हुई थी. तब से, जब भी आसमान में एक पल के लिए भी बादल छाए होते हैं, पूरा गांव प्रार्थना के लिए इकट्ठा होता है.
पंचायत सेक्रेटरी हेंड्रे ने कहा, “लोगों ने फसल बचाने की उम्मीद छोड़ दी है. अभी उनका ध्यान ज़िंदा रहने पर है. पीने का पानी तेज़ी से खत्म हो रहा है. हमने 2012 और 2016 में भी सूखे जैसे हालात देखे थे, लेकिन उनमें से किसी भी साल अक्टूबर तक पानी खत्म नहीं हुआ था. आने वाले महीने बहुत बुरे लग रहे हैं.”

1972 के बाद सबसे बुरा सूखा?
बीड से करीब दो घंटे दूर, जालना में भी हालात अलग नहीं हैं. कंदारी गांव में पानी ही बातचीत का अकेला विषय बन गया है. इसने एक नई हायरार्की भी बना दी है. जिन लोगों की ज़मीन पर कुएं हैं, वे अचानक खुद को पावरफुल स्थिति में पा रहे हैं.
पानी के सोर्स सूख रहे हैं, इसलिए परेशान गांववाले इन कुआं मालिकों के पास जा रहे हैं, जिनमें से कुछ तो अपना पानी ज़्यादा पैसे में बेच रहे हैं. पानी की एक बाल्टी 100 रुपये में मिल रही है. गांववालों का कहना है कि यह सरकारी टैंकरों के आने का इंतज़ार करने और जब वे आते भी हैं, तो पानी के बर्तनों को किलोमीटरों तक अपने घरों तक ढोने से बेहतर ऑप्शन है.
कुएं के मालिक विश्वंबा नौसागर ने कहा, “अगर किसी को इमरजेंसी में ज़रूरत होती है, तो हम उन्हें एक या दो बाल्टी देते हैं, लेकिन चूंकि पानी का लेवल नीचे है, इसलिए हमें लगभग सात-आठ घंटे मोटर चलाने की ज़रूरत है और इसमें पैसे लगते हैं.”

कंडारी की एक और रहने वाली, 43 साल की शीला बबन डाकने, अपने पिता से 1972 के दुश्काल के बारे में सुनकर बड़ी हुई हैं.
उन्होंने उन कहानियों को याद करते हुए कहा, “मैंने सिर्फ 1972 के सूखे के बारे में कहानियां सुनी हैं. लोग और जानवर बस मर रहे थे. खेती की सारी ज़मीनें सूख गई थीं.”
उस समय, सूखे ने महाराष्ट्र के 26 ज़िलों में से 21 को तबाह कर दिया था, जिससे लगभग 1.8 करोड़ से 2 करोड़ लोग प्रभावित हुए थे. लगभग 50 लाख लोगों को ज़िंदा रहने के लिए सरकारी पैसे से चल रहे राहत काम पर निर्भर रहना पड़ा और कई लोग अपने गांव छोड़कर चले गए.
पिछले महीने, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक और 1972 का डर जताया था.
उन्होंने चेतावनी दी, “हम एक गंभीर सूखे की ओर बढ़ रहे हैं. यह 1972 से भी बुरा हो सकता है.”

गन्ने और कपास का विरोधाभास
एक ऐसा इलाका जो अक्सर सूखा रहता है, मराठवाड़ा में प्यासी फसलों के लिए एक अजीब सा लगाव है.
क्लाइमेट जर्नल में छपी 2023 की एक स्टडी ने इस विरोधाभास को उजागर किया. 1981 और 2018 के बीच, इस इलाके में बारिश में गिरावट का ट्रेंड दिखा, जिसका सालाना औसत 662.9 mm था. फिर भी, 1996 के बाद से, किसान कम पानी वाली फसलों—जैसे ज्वार, बाजरा और गेहूं से दूर होकर कपास, गन्ना, मक्का और सोयाबीन जैसी ज़्यादा पानी वाली फसलों की तरफ बढ़ रहे हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है, “पिछले दो दशकों (साल 2000 के बाद) में पूरे मराठवाड़ा में प्रति हेक्टेयर, ज़्यादा पानी की ज़रूरत वाली फसलों (ज़्यादातर कपास और गन्ना, वगैरह) का प्रोडक्शन और एरिया काफी बढ़ा है.” इसमें यह भी कहा गया है कि औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) में गन्ने के प्रोडक्शन में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी हुई, उसके बाद जालना और लातूर का नंबर आता है.

स्टडी में यह भी पाया गया कि ग्राउंडवाटर पर किसानों की बहुत ज़्यादा निर्भरता का असर पड़ रहा है. स्टडी किए गए समय में ग्राउंडवाटर लेवल में औसतन लगभग 3.5 मीटर की गिरावट आई. उस्मानाबाद को छोड़कर मराठवाड़ा के सभी जिलों में प्री- और पोस्ट-मॉनसून दोनों सीज़न में ग्राउंडवाटर लेवल में गिरावट देखी गई. सबसे ज़्यादा गिरावट परभणी (5 मीटर), हिंगोली (4 मीटर) और बीड (4 मीटर) में दर्ज की गई.
ग्राम विकास संस्था के नरहरी शिवपुरे ने कहा कि किसान इन फसलों को इसलिए उगा रहे हैं क्योंकि इनसे ज़्यादा इनकम होती है और सरकार का सपोर्ट भी मिलता है.
शिवपुरे ने कहा, “सरकार इस इलाके में इन फसलों की खेती को सपोर्ट करना जारी नहीं रख सकती और यह उम्मीद नहीं कर सकती कि किसान जादुई तरीके से दूसरी फसलों की तरफ चले जाएंगे. जब तक कोई मज़बूत ऑप्शन नहीं मिलता जो बराबर या ज़्यादा इनकम और बेहतर सरकारी सपोर्ट दे, किसान इन ज़्यादा पानी वाली फसलों को उगाते रहेंगे.”
उन्होंने कहा कि किसानों को ज़्यादा सस्टेनेबल फसलें उगाने के लिए मिलकर कोशिश करने के साथ-साथ, सरकार को ऐसे प्रोग्राम में इन्वेस्ट करना चाहिए जो सिंचाई के अच्छे तरीके सिखाएं और किसानों को सूखे के लिए तैयार करें.
एक ऐसा गांव जिसने इस चक्र को तोड़ा
शिवपुरे की टीम ने दिखाया है कि इससे निकलने का एक रास्ता है. छत्रपति संभाजीनगर के चिंचुली गांव में, किसानों ने मौजूदा सूखे को बिना किसी रुकावट के झेल लिया है. यह खेती और पानी के मैनेजमेंट के तरीकों में सालों से आए बदलावों का नतीजा था.
2018 में, जब शिवपुरे की टीम ने चिंचोली के साथ काम करना शुरू किया, तो उन्हें एक मुश्किल काम दिख रहा था. यहां के किसान खेती के पारंपरिक तरीकों से बहुत जुड़े हुए थे और उन्हें डर था कि उनसे कोई भी भटकाव उनकी रोज़ी-रोटी छीन लेगा, लेकिन सालों की लगातार कोशिशें रंग लाने लगी हैं. जब दूसरे गांव पानी के लिए जूझ रहे थे, यहां के किसानों के पास इस मौसम में गुज़ारा करने के लिए काफी पानी था.
इस मौसम में, ठीक जब सरकारी खेती के ऑफिसों में एल नीनो के अलार्म बज रहे थे, चिंचुली के लोगों ने मॉनसून की शुरुआत में आई बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए रिचार्ज पिट खोदे. अब वे अपनी रोज़ की ज़रूरतों को पूरा करने और सूखे के मौसम में अपने खेतों को सहारा देने के लिए इस जमा किए हुए पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं.
ग्राम विकास संस्था की मदद से, गांववालों ने डोनेशन और घर-घर जाकर पैसे इकट्ठा करके भी पैसे जमा किए हैं ताकि चेक डैम की मरम्मत, आस-पास की नालियों से गाद निकालने और ग्राउंडवॉटर रिचार्ज पॉइंट बनाने जैसे लंबे समय के कामों के लिए पैसे जुटाए जा सकें. उनकी मिट्टी बचाने की कोशिशों से पिछले आठ सालों में गांव में उपजाऊ मिट्टी का एरिया 1.5-2 परसेंट बढ़ गया है.
इन सालों में, यहां के किसानों को प्रोटेक्टिव इरिगेशन जैसे तरीकों की भी ट्रेनिंग दी गई है, यह एक ऐसा तरीका है जिसमें फसलों के बढ़ने के ज़रूरी स्टेज में कम पानी का इस्तेमाल होता है ताकि सूखे के मौसम में उन्हें पूरी तरह खराब होने से बचाया जा सके.
लेकिन चिंचुली एक अपवाद है. सरकार की लगातार मदद के बिना, कम्युनिटी की तरफ से किए गए ऐसे प्रयास अकेले ही चल रहे हैं. यहां तक कि उनके आस-पास के गांव भी सबसे अच्छे तरीके नहीं अपनाते और सूखे का खतरा बना रहता है.
क्लाइमेट चेंज से पलायन
अंबेसावली में, क्लाइमेट चेंज एक और संकट को बढ़ावा दे रहा है—बड़े पैमाने पर पलायन. सालों से बारी-बारी से सूखे और बाढ़ ने गांव वालों को अपने खेत छोड़कर कहीं और काम ढूंढने पर मजबूर कर दिया है. गांव के कम से कम आधे लोग मौसम के हिसाब से कर्नाटक और तमिलनाडु चले जाते हैं, जहां वे गन्ने के खेतों में मजदूरी करते हैं.
पलायन जुलाई में शुरू होता है. जवान लड़के और लड़कियां अपना बैग पैक करके दक्षिण की ओर जाने वाली ट्रेनों में सवार हो जाते हैं. अगले छह महीनों तक, उनके घर बंद रहते हैं और उन्हें उनके पड़ोसियों की देखभाल में छोड़ दिया जाता है.
अंबेसावली के रहने वाले रमेश गुंडेकर ने कहा, “वे दूसरे राज्यों में काम करके ज़्यादा कमाते हैं. वे छह महीने काम करते हैं, पैसे बचाते हैं, और फिर वापस आ जाते हैं. अगले छह महीनों तक, वे गांव में कोई छोटा-मोटा काम करते हैं.” उनके मुताबिक, जो लोग जाते हैं वे हर महीने 25,000-30,000 रुपये तक कमा लेते हैं.
रहने वालों का कहना है कि ये लोग धीरे-धीरे गांव के “अमीर और पॉश” बन गए हैं. उन्हें खेती के लोन की चिंता करने या साफ आसमान को बेचैनी से देखने की ज़रूरत नहीं है. उनकी इनकम का अंदाज़ा पहले से लगाया जा सकता है.
एक और निवासी तुकाराम गुंडेकर ने कहा, “पहले हम इन लोगों को नीची नज़र से देखते थे, लेकिन अब लगता है कि उन्होंने सही फैसला किया. कम से कम उन्हें हर साल बारिश की चिंता नहीं करनी पड़ती.”
जो लोग पीछे रह गए हैं, वे अपनी बची हुई फसलों को बचाने के लिए जूझ रहे हैं. कई लोगों ने अपने खेत पूरी तरह से छोड़ दिए हैं, जिससे फसलें सूख गई हैं. जो थोड़ी बहुत बची हुई है, उसे काटने में और पैसे लगेंगे. सीज़न की शुरुआत में बीज, फर्टिलाइज़र और खेती के सामान में अपनी बचत लगाने के बाद खर्च करने के लिए बहुत कम पैसा बचता है.
सबसे बुरा समय अभी आना बाकी है. IMD ने चेतावनी दी है कि एल नीनो अभी पीक पर नहीं है, जिसका मतलब है कि इसका असर इस साल और अगले मॉनसून सीज़न तक भी रहने की संभावना है.
हेंड्रे ने पूछा, “इस इलाके में खेती अब कोई फायदेमंद ऑप्शन नहीं है. एक किसान कीड़ों या कॉम्पिटिटिव मार्केट से लड़ सकता है, लेकिन वह मौसम से कैसे लड़ेगा?”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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