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Sunday, 24 May, 2026
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लोक कल्याण मार्ग विवाद: 100 साल पुराने ट्रैक को बचाने के लिए मोदी सरकार से लड़ रहा है दिल्ली रेस क्लब

केंद्र सरकार PM के घर के पास करीब 100 एकड़ प्राइम रियल एस्टेट को ‘पब्लिक मकसद’ के लिए लेना चाहती है. 100 साल पुराना दिल्ली रेस क्लब अपनी ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है.

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नई दिल्ली: कुछ हफ्ते पहले तक दिल्ली रेस क्लब अपने सालाना रेसिंग सीजन के साथ गुलजार था, जैसा कि करीब एक सदी से लगभग हर साल होता आया है. छोटे-छोटे लाउडस्पीकरों से लगातार अपडेट सुनाई दे रहे थे, सट्टा लगाने वाले लोग बेचैनी से अपनी पर्चियां देख रहे थे और घोड़े तेजी से फिनिश लाइन की ओर दौड़ रहे थे. अब मैदान में घास बेतरतीब तरीके से उग आई है. अस्तबल में घोड़े अपने चारे की बाल्टियों को सूंघ रहे हैं और एक अकेली आवारा बिल्ली वहां घूम रही है. लेकिन इस बार यह सिर्फ सीजन खत्म होने के बाद की सामान्य शांति नहीं है.

राजधानी के अभिजात्य वर्ग की सामाजिक पहचान रहा यह संस्थान अब इस खतरे का सामना कर रहा है कि जो सीजन अभी खत्म हुआ, वह शायद उसका आखिरी सीजन हो. और इसे रोकने के लिए वह केंद्र सरकार से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है.

100 साल पूरे होने के चार दिन बाद, 12 मार्च को दिल्ली रेस क्लब को आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत आने वाले लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस यानी L&DO की ओर से बेदखली का नोटिस दिया गया. क्लब को 15 दिन के भीतर 53.4 एकड़ जमीन खाली करने को कहा गया, जिस पर वह 1926 से मौजूद है. इसी तरह 15 एकड़ के जयपुर पोलो ग्राउंड और पास की तीन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों को भी नोटिस भेजे गए. ये सभी मिलाकर करीब 100 एकड़ की अहम जमीन है, जो प्रधानमंत्री आवास 7 लोक कल्याण मार्ग, जिसे पहले रेस कोर्स रोड कहा जाता था, के पास स्थित है.

L&DO ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया है कि वह इस जमीन का क्या करना चाहता है. उसने सिर्फ “योजना और विकास” का हवाला दिया है. जहां पोलो एसोसिएशन सरकार की बेदखली प्रक्रिया से बातचीत कर रही है और झुग्गी बस्तियां अदालत में केस हार चुकी हैं, वहीं रेस क्लब ने अपनी जमीन बचाने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू कर दी है. यहां करीब 250 घोड़े रखे जाते हैं और लगभग 5,000 लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है.

“पूरा उद्योग खत्म हो रहा है. हमारे जैसे कुछ जुनूनी लोग ही इसे जिंदा रखे हुए हैं.”
—अंगद सिंह संधू, हॉर्स ब्रीडर

देशभर में यह खेल पहले ही जमीन, पैसा और दर्शक खोता जा रहा है. सरकार के साथ जमीन को लेकर विवाद, सट्टेबाजी से होने वाली कमाई में गिरावट, ऊंचा जीएसटी और युवाओं की कम होती दिलचस्पी ने रेसिंग संस्कृति को उसकी पुरानी पहचान से बहुत दूर कर दिया है. दिल्ली में तो बेदखली नोटिस से पहले भी 1,000 दर्शकों की मौजूदगी को अच्छी भीड़ माना जाता था.

“यह एक बहुत ही भावुक कर देने वाली स्थिति है,” अंगद सिंह संधू ने कहा, जो घोड़ों के एक ब्रीडर हैं और शहर से दो घंटे की ड्राइव की दूरी पर ‘मुक्तेश्वर स्टड फार्म’ चलाते हैं. “मैं सचमुच वहीं पला-बढ़ा हूं. स्कूल के बाद मैं अक्सर घोड़ों की रेस देखने जाया करता था.”

दिल्ली रेस क्लब में हाल ही में संपन्न हुए सीज़न के दौरान एक रेस | फ़ोटो: Instagram/@nicheracing

15 मई को दिल्ली रेस क्लब के वकील सुहैल दत्त, जिनके सफेद बाल दूर से दिखते हैं, सरकार के चश्मा लगाए वकील के साथ कानून के तकनीकी मुद्दों पर बहस कर रहे थे. यह मार्च से चल रही कानूनी लड़ाई का नया दौर था.

सबसे पहले, 25 मार्च को हाई कोर्ट ने बेदखली पर रोक लगा दी और केंद्र सरकार को जबरन कार्रवाई से रोका. अप्रैल में L&DO ने एक कारण बताओ नोटिस भेजा और क्लब को एस्टेट ऑफिसर के सामने पेश होने को कहा. यह एस्टेट ऑफिसर उसी एजेंसी का कर्मचारी था जो क्लब को बेदखल करना चाहती है. क्लब ने इस नोटिस पर भी दूसरी बार रोक हासिल कर ली. अब सरकार दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय के सामने पहुंची और रोक हटाने की मांग की.

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने जमीन की अचानक जरूरत का सिर्फ एक कारण बताया. उन्होंने कहा, “अब इस जमीन का सार्वजनिक उद्देश्य है.” हालांकि उन्होंने कोई खास जानकारी नहीं दी.

अगर रोक जारी रहती है, तो क्लब जुलाई के आखिर में हाई कोर्ट के एक जज के सामने अपना पूरा पक्ष रखेगा. लेकिन अगर रोक हट जाती है, तो क्लब को एस्टेट ऑफिसर के सामने जाना पड़ेगा, जिससे बचने की वह कोशिश कर रहा है.

दिप्रिंट ने L&DO को टिप्पणी के लिए ईमेल भेजा है. जवाब मिलने पर रिपोर्ट अपडेट की जाएगी.

दिल्ली रेस क्लब के प्रशासन से जुड़े एक व्यक्ति ने कहा, “यह अस्तित्व का सवाल है.” अगर क्लब कानूनी लड़ाई हार गया, तो “यह उसका अंत होगा.”

कानूनी लड़ाई

यह विवाद एक सदी पुराने दस्तावेजों पर आधारित है, जिन्हें सरकार पिछले 10 साल में दो बार चुनौती दे चुकी है. इस बार बेदखली नोटिस के साथ कई तरह की अटकलें भी जुड़ गई हैं कि प्रधानमंत्री आवास के पास की जमीन का आगे क्या इस्तेमाल होगा.

पहले उद्धृत किए गए क्लब से जुड़े व्यक्ति ने कहा कि L&DO के साथ बातचीत से प्रबंधन को ऐसा लगा कि बेदखली का दबाव “ऊपर से” आया है. उन्होंने यह भी कहा कि सैन्य हलकों में ऐसी अफवाहें हैं कि पास का एयर फोर्स स्टेशन भी खाली कराया जा सकता है. हालांकि द प्रिंट इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं कर पाया.

रेस क्लब के मामले का केंद्र 1926 में औपनिवेशिक सरकार के साथ हुआ लंबी अवधि का पट्टा है, जिसे 1994 तक लगातार बढ़ाया जाता रहा. क्लब का कहना है कि यह पट्टा कभी वास्तव में खत्म नहीं हुआ. इसके बावजूद 1999 में सरकार ने उसे कारण बताओ नोटिस दिया और मामला कई साल तक अदालत में चलता रहा. 2013 में क्लब ने पुराने बकाये के तौर पर करीब 7.5 करोड़ रुपये जमा किए और हर साल किराया देता रहा. क्लब का कहना है कि L&DO द्वारा भुगतान स्वीकार करने का मतलब था कि पट्टे का विस्तार “माना हुआ” था.

“किसी भी मकान मालिक को कानून का सहारा लिए बिना किरायेदार को नहीं निकालना चाहिए. हर पक्षकार को यह महसूस होना चाहिए कि वह जीत सकता है.”
-संकल्प गोस्वामी, दिल्ली रेस क्लब के वकील

हालांकि L&DO ने 2017 में रेस क्लब और इसी इलाके की चार अन्य संपत्तियों को भी ऐसे ही नोटिस दिए थे, लेकिन बाद में मामला शांत हो गया. L&DO भुगतान स्वीकार कर रहा था, इसलिए क्लब को लगा कि उसकी कानूनी परेशानियां खत्म हो चुकी हैं. फिर अचानक नोटिस आ गया.

क्लब से जुड़े व्यक्ति ने कहा, “यह निश्चित रूप से चौंकाने वाला था.”

12 मार्च के नोटिस में कहा गया कि 1994 का पट्टा खत्म हो चुका है और जमीन “योजना और विकास” के लिए चाहिए. इसके बाद क्लब दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा और कहा कि जब तक सही कानूनी प्रक्रिया के तहत बेदखली नहीं की जाती, तब तक 1926 का पट्टा जारी रहेगा. L&DO ने जवाब दिया कि क्लब को लिखित रूप में पट्टा बढ़ाने का अनुरोध करना चाहिए था, जो उसने नहीं किया.

संकल्प गोस्वामी ने कहा, “वही पट्टा समझौता अब भी लागू है. हम उसी पट्टे के तहत जमीन पर हैं.”

उन्होंने कहा कि 2013 का समझौता क्लब की स्थिति को और मजबूत करता है.

उन्होंने कहा, “उन्होंने कहा था कि हम दोबारा कब्जा लेने का अपना अधिकार वापस लेते हैं.” उनके मुताबिक इससे 2038 तक के लिए “माना हुआ अनुबंध” बन गया. दिलचस्प बात यह है कि बेदखली नोटिस आने के कुछ ही समय बाद क्लब का सालाना किराया जमा करने का समय आया. क्लब से जुड़े व्यक्ति ने पुष्टि की कि पूरा भुगतान जमा कर दिया गया.

क्लब के भीतर अब इस जल्दबाजी को लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं, खासकर शुरुआती नोटिस में दिए गए सिर्फ 15 दिन के समय को लेकर.

दिल्ली रेस क्लब का रेसकोर्स अपने संभवतः आखिरी सीज़न के बाद वीरान नज़र आ रहा है | फ़ोटो: सहज शंकरन | दिप्रिंट

उस व्यक्ति ने कहा, “यह मजाक है.” उन्होंने कहा कि सिर्फ दो हफ्तों में इतने सारे घोड़ों को दूसरी जगह ले जाना असंभव है. उन्होंने यह भी बताया कि पहले L&DO के साथ अनौपचारिक बातचीत में वैकल्पिक जमीन देने की बात हुई थी, लेकिन कभी कुछ लिखित में नहीं आया. अब वे बातचीत भी बंद हो चुकी है.

उन्होंने कहा कि अब ऐसी चर्चाएं हैं कि यह जमीन सांसदों के सरकारी आवास के लिए चाहिए, खासकर परिसीमन प्रक्रिया को देखते हुए, जिससे लोकसभा में 300 से ज्यादा सीटें बढ़ सकती हैं.

15 मई को अदालत में सरकार ने भी स्थिति ज्यादा साफ नहीं की. जब पूछा गया कि पट्टा खत्म होने के 32 साल बाद अब कार्रवाई क्यों की जा रही है, तो अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने “एयर डिफेंस इंस्टॉलेशन” का उदाहरण दिया और कहा कि लोक कल्याण मार्ग के आसपास की “पूरी जमीन” की जरूरत होगी.

गोस्वामी ने कहा, “10 साल से ज्यादा समय बीत चुका है. लेकिन अब उन्हें लग रहा होगा कि जमीन की तुरंत जरूरत है.”

53.4 एकड़ में फैला दिल्ली रेस क्लब का अस्तबल लोक कल्याण मार्ग के पास स्थित है.

दिल्ली रेस क्लब के अस्तबल, जो लोक कल्याण मार्ग के पास 53.4 एकड़ ज़मीन पर फैले हैं | फ़ोटो: सहज शंकरन | दिप्रिंट

दो ट्रेक्स की कहानी

दिल्ली की दो सबसे पुरानी घुड़सवारी संस्थाएं, जिन्हें एक ही दिन नोटिस मिला था, अब अलग-अलग ट्रेक अपना रही हैं. दिल्ली रेस क्लब अदालत के जरिए लड़ाई लड़ रहा है, जबकि इंडियन पोलो एसोसिएशन सरकार की बेदखली प्रक्रिया से सीधे बातचीत करने का ट्रेक अपना रही है.

पोलो एसोसिएशन की लीज 1993 में खत्म हो गई थी. केंद्र सरकार का कहना है कि उसके बाद से जयपुर पोलो ग्राउंड पर एसोसिएशन सिर्फ “सहन किए गए किरायेदार” के रूप में बना हुआ है. शुरुआत में रेस क्लब के साथ मिलकर कानूनी लड़ाई लड़ने पर बातचीत हुई थी, लेकिन अब एसोसिएशन अदालत में बेदखली का विरोध नहीं कर रही है.

दोनों पड़ोसी संस्थाओं के ट्रेक तब अलग हो गए, जब सरकार ने 17 अप्रैल को उन्हें कारण बताओ नोटिस भेजकर एस्टेट ऑफिसर के सामने पेश होने को कहा.

गोस्वामी ने कहा, “वे एस्टेट ऑफिसर के सामने पेश हो रहे हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि रेस क्लब जानबूझकर उस ट्रेक से बच रहा है, क्योंकि उसे वहां अपने पक्ष की संभावना “बहुत कमजोर” लग रही है.

रेस क्लब की तुलना में पोलो एसोसिएशन की संस्थागत पकड़ काफी ज्यादा मजबूत मानी जाती है. इसके पदाधिकारियों में उद्योगपति नवीन जिंदल और जयपुर राजघराने के पद्मनाभ सिंह शामिल हैं. पद्मनाभ सिंह के परदादा ने ही दिल्ली में इस पोलो ग्राउंड की शुरुआत की थी. एसोसिएशन के अध्यक्ष उपेंद्र द्विवेदी हैं, जो मौजूदा सेना प्रमुख हैं.

BJP सांसद और इंडियन पोलो एसोसिएशन के पदाधिकारी नवीन जिंदल जयपुर पोलो ग्राउंड की वकालत कर रहे हैं | फ़ोटो: Facebook/@NaveenJindal

नवीन जिंदल, जो बीजेपी सांसद और इंडियन पोलो एसोसिएशन के पदाधिकारी भी हैं, जयपुर पोलो ग्राउंड को बचाने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं.

दिल्ली रेस क्लब की व्यवस्था अपेक्षाकृत कम चर्चित है. इसके अध्यक्ष जेएस बेदी एक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और इसके सदस्य ज्यादातर कारोबारी, घोड़ों के मालिक, ब्रीडर और रेसिंग के शौकीन लोग हैं. यहां किसी बड़े उद्योगपति परिवार का वारिस दिखाई नहीं देता.

पोलो एसोसिएशन के प्रभावशाली नेटवर्क ने अपने अस्तित्व को बचाने के लिए खुला अभियान शुरू कर दिया है. मार्च में विवादित जमीन पर खेले गए जिंदल स्टील पोलो चैंपियनशिप के फाइनल के दौरान सदस्यों ने खुलकर समर्थन मांगा.

जिंदल, जो बीजेपी सांसद भी हैं, ने घोषणा की, “हमने सरकार को लिखा है और उम्मीद है कि पोलो प्रेमियों की भावनाओं को समझा जाएगा.”

रेस क्लब के लिए ऐसा कोई सार्वजनिक अभियान अभी तक सामने नहीं आया है.

जयपुर पोलो ग्राउंड में हाल ही में हुआ एक मैच, जिसे बेदखली का नोटिस भी दिया गया है | फ़ोटो: Facebook/@NaveenJindal

घोड़ों के मालिक और ब्रीडर गौतम कोटवाल, जो एक दशक तक क्लब की प्रबंधन समिति में रहे, ने कहा कि उन्हें ट्रैक को कहीं और ले जाने या सरकार पर दोबारा विचार करने के लिए दबाव बनाने की किसी बड़ी संगठित कोशिश की जानकारी नहीं है. सब कुछ अदालत की लड़ाई के नतीजे पर टिका है.

‘प्लान बी’ की कमी ने पुराने सदस्यों और घोड़ों के मालिकों को परेशान कर दिया है.

अंगद सिंह संधू के लिए दोनों जगहें बेहद खास हैं. वह एक थरौब्रेड घोड़ा ब्रीडर भी हैं और पोलो खिलाड़ी भी. कई दूसरे लोगों की तरह उन्हें भी घोड़ों का शौक अपने पिता से मिला, जिन्होंने 1980 के दशक के आखिर में परिवार का पहला घोड़ा खरीदा था.

उन्होंने कहा, “घोड़ों के लिए मेरा प्यार इन्हीं दोनों जगहों से शुरू हुआ.”

दौड़ने के लिए जगह नहीं

अगर रेस क्लब बंद हो जाता है, तो घोड़ों और हजारों कर्मचारियों को दूसरी जगह ढूंढनी पड़ेगी. लेकिन विकल्प बहुत कम हैं.

क्लब में करीब 250 रेस घोड़े हैं, जिनमें से कई बिना किसी शुल्क के रखे जाते हैं.

अंदरूनी सूत्र ने कहा, “ये थरौब्रेड रेस घोड़े हैं. इन्हें खास देखभाल की जरूरत होती है.”

कुछ मालिक, जिनमें संधू भी शामिल हैं, तेज बेदखली की आशंका में अपने घोड़े पहले ही दूसरी जगह भेजने लगे हैं.

उन्होंने कहा, “दिल्ली में मेरे चार-पांच घोड़े होते, लेकिन अब सिर्फ एक बचा है.”

उन्हें सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि घोड़ों की देखभाल करने वाले कुशल कर्मचारी घोड़ों से पहले ही क्लब छोड़ देंगे.

“पांच हजार लोगों की रोजी-रोटी इस क्लब पर निर्भर है. जब वे पैदा होते हैं, तो सबसे पहले घोड़ा ही देखते हैं. उन्हें और क्या काम आता है?”
—दिल्ली रेस क्लब के एक सदस्य

संधू ने चिंता जताते हुए कहा, “वे रेसकोर्स छोड़कर चले जाएंगे, घोड़े प्रबंधन के पास आ जाएंगे और प्रबंधन पहले से ही व्यस्त है. जिस ट्रेनर के साथ मैंने ट्रेनिंग ली है, उसने मुझसे पूछा कि क्या वह किसी दूसरे रेसकोर्स में जा सकता है.”

जहां कोटवाल को भरोसा था कि देशभर के अस्तबलों में घोड़ों के लिए जगह मिल जाएगी और “उन्हें कहीं न कहीं रखा जा सकेगा”, वहीं संधू इतने आश्वस्त नहीं थे. उनका कहना है कि दिल्ली के घोड़े मुंबई या कोलकाता के घोड़ों जितने मजबूत नहीं माने जाते और उन्हें आसानी से कोई नहीं अपनाएगा.

उन्होंने कहा, “इतनी बड़ी संख्या में घोड़ों को दूसरी जगह भेजना लगभग असंभव होगा.” संधू का मानना है कि कई घोड़े आखिर में राइडिंग स्कूलों या ब्रीडिंग सेंटरों को बेच दिए जाएंगे. उनके लिए यह दुखद होगा. उन्होंने कहा, “वे दौड़ने के लिए पैदा हुए थे.”

इसके बाद बात उन लोगों की आती है जो रेसकोर्स को चलाते हैं — ट्रेनर, घोड़ों की देखभाल करने वाले, अस्तबल कर्मचारी और जॉकी.

सूत्र ने कहा, “पांच हजार लोग क्लब पर अपनी रोजी-रोटी के लिए निर्भर हैं.” उन्होंने बताया कि इनमें से कई लोग ऐसे परिवारों से आते हैं जो पीढ़ियों से रेस घोड़ों के साथ काम करते रहे हैं. “जब वे पैदा होते हैं, तो सबसे पहले घोड़ा देखते हैं. उन्हें और क्या काम आता है?”

दिल्ली रेस क्लब के अस्तबल में एक घोड़ा। कई सदस्यों ने कहा कि अगर रेसकोर्स बंद हो जाता है, तो इन ‘थरोब्रेड’ घोड़ों के लिए नया ठिकाना ढूंढना आसान नहीं होगा। | फ़ोटो: सहज शंकरन | दिप्रिंट

उन्होंने खास तौर पर जॉकी का जिक्र किया, जिनकी लंबाई मुश्किल से पांच फीट से थोड़ी ज्यादा होती है और वजन करीब 50 किलो होता है. उनका शरीर रेसिंग के हिसाब से बना होता है, लेकिन दूसरे शारीरिक कामों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता.

कई कर्मचारियों के लिए खतरा सिर्फ क्लब तक सीमित नहीं है. उनमें से कई पास की तीन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहते हैं, जिनमें से एक क्लब की जमीन से सिर्फ एक गेट की दूरी पर है. इन बस्तियों को भी बेदखली नोटिस मिल चुके हैं, जिन्हें छोटे-छोटे घरों की दीवारों पर चिपका दिया गया है.

इन लोगों को सवदा घेवरा में फ्लैट देने की योजना है, जो मध्य दिल्ली से करीब 40 किलोमीटर दूर है. लेकिन कई लोगों का कहना है कि इतनी दूरी होने पर वे अपनी मौजूदा नौकरी नहीं कर पाएंगे. 12 मई को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और उन्हें 15 दिन के भीतर जगह खाली करने का आदेश दिया.

रेस क्लब को उम्मीद है कि अदालत में उसे बेहतर नतीजा मिलेगा.

गोस्वामी ने कहा, “कानूनी प्रक्रिया अपनाए बिना कोई भी अपने किरायेदारों को नहीं निकाल सकता.” उन्होंने कहा कि उनके पक्ष में कई कानूनी उदाहरण मौजूद हैं. “हर पक्षकार को लगना चाहिए कि वह जीत सकता है.”

दिल्ली रेस क्लब से सटे एक JJ क्लस्टर में स्थित घर की दीवार पर चिपका, बेदखली का एक फटा-पुराना नोटिस | फ़ोटो: सहज शंकरन | दिप्रिंट

खत्म होती एक इंडस्ट्री

1980 के दशक में जो इंडस्ट्री 300 करोड़ रुपये की थी, जिसमें 3,000 थरौब्रेड घोड़े, 100 स्टड फार्म और साल में 400 से ज्यादा रेसिंग दिन होते थे, वह अब धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है. जमीन को लेकर सरकार के साथ चल रही लड़ाइयों ने इस गिरावट को और तेज कर दिया है.

अब देश में सिर्फ सात रेसकोर्स ही काम कर रहे हैं. अगर दिल्ली रेस क्लब अपनी जमीन खो देता है, तो दो साल के भीतर बंद होने वाला यह तीसरा बड़ा रेसिंग स्थल होगा.

2024 में तमिलनाडु सरकार ने मद्रास और ऊटी के ट्रैक वापस ले लिए, जिससे देश का सबसे पुराना रेस क्लब मद्रास रेस क्लब लगभग बंद हो गया. अब बेंगलुरु की बारी मानी जा रही है. जमीन को लेकर लंबे विवाद के बाद भले ही बैंगलोर टर्फ क्लब ने कर्नाटक सरकार के साथ दूसरी जगह जाने का समझौता कर लिया हो, लेकिन फरवरी में उसे सिर्फ दो साल के भीतर अपनी रेसिंग गतिविधियां कुनिगल स्टड फार्म में शिफ्ट करने का आदेश दिया गया. यह वही फार्म है, जिसे कभी भगोड़े कारोबारी और रेसिंग प्रेमी विजय माल्या को लीज पर दिया गया था.

दिल्ली रेस क्लब में 200 से ज़्यादा अस्तबल हैं, लेकिन अब यहां बड़ी संख्या में भीड़ नहीं जुटती और इसने पिछले कुछ सालों में खुद को नए सिरे से ढालने की भी कोई कोशिश नहीं की है | फ़ोटो: सहज शंकरन | दिप्रिंट

दिल्ली रेस क्लब में 200 से ज्यादा अस्तबल हैं, लेकिन अब वहां पहले जैसी भीड़ नहीं आती और क्लब ने खुद को समय के साथ बदलने की कोशिश भी नहीं की.

मुंबई के रॉयल वेस्टर्न इंडिया टर्फ क्लब की प्रबंधन समिति के सदस्य शिवेन सुरेंद्रनाथ ने कहा, “बेंगलुरु बहुत मुश्किल स्थिति में है. वह कभी भी बंद हो सकता है.”

रेस ट्रैक वापस लेने की कोशिश कर रही सरकारें अब यह दलील दे रही हैं कि ये क्लब बहुत महत्वपूर्ण सार्वजनिक जमीन पर बने हुए हैं, जो उन्हें दशकों पुरानी लीज पर बहुत कम कीमत में मिली थी. अदालतों ने भी कई मामलों में यह माना है कि इतनी कीमती जमीन को वापस लेना जनहित में है. उदाहरण के लिए मद्रास हाई कोर्ट ने माना कि मद्रास रेस क्लब के पास गिंडी ट्रैक की वैध लीज हो सकती थी, लेकिन फिर भी अदालत ने कहा कि “बड़ा जनहित” ज्यादा महत्वपूर्ण है. अब वहां इको पार्क और जलाशय बनाए जा रहे हैं.

जमीन की समस्या के साथ-साथ रेस देखने आने वाले लोग भी अब कम पैसे की बाजी लगा रहे हैं. कई लोग इसके लिए 2017 में सरकार द्वारा सभी सट्टों पर लगाए गए 28 प्रतिशत जीएसटी को जिम्मेदार मानते हैं. यह टैक्स अंतिम जीत की रकम पर नहीं बल्कि शुरुआती टिकट राशि पर लगता है. यानी 100 रुपये की हर बाजी में से 28 रुपये पहले ही कट जाते हैं.

“मिस्टर बेदी के आसपास यह एक छोटा और करीबी क्लब जैसा था. वही लोग लगातार बने रहे. क्लब ठीक-ठाक चल रहा था, इसलिए हमने कुछ बदलने की कोशिश नहीं की.”

-गौतम कोतवाल, दिल्ली रेस क्लब के पूर्व मैनेजिंग कमेटी सदस्य

लेकिन दिल्ली रेस क्लब का आंतरिक संकट इससे भी पुराना है. अगर भविष्य में दूसरी जमीन मिल भी जाए, तब भी घटती आर्थिक स्थिति वाले इस संस्थान के लिए पूरी व्यवस्था को दूसरी जगह ले जाना बहुत मुश्किल होगा.

अंदरूनी सूत्र ने कहा, “हमें बैठकें करनी होंगी… यह आर्थिक रूप से बहुत मुश्किल होगा.” उनकी आवाज से लग रहा था कि उन्हें भरोसा नहीं है कि क्लब समय रहते इतना पैसा जुटा पाएगा.

आखिरी दौर?

अपने सुनहरे दौर में दिल्ली रेस क्लब नेताओं, कारोबारियों और सेना अधिकारियों की पसंदीदा जगह हुआ करता था. फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की बेटी माजा दारूवाला ने उन शामों को याद किया है जब वह रेस देखने जाती थीं और परिवार के हमेशा हारने वाले घोड़े को ओट्स खिलाती थीं. अभिनेता रणदीप हुड्डा जैसे सेलिब्रिटी भी वहां देखे जाते थे.

2000 के दशक के बीच तक हजारों लोग जोश के साथ रेस देखने आते थे. माहौल इतना गर्म होता था कि कई बार गुस्साए सट्टेबाजों ने ट्रैक पर उतरकर हंगामा किया, क्योंकि उन्हें लगता था कि रेस फिक्स की गई है.

अब वह दौर खत्म हो चुका है. अंदरूनी सूत्र के मुताबिक महामारी से पहले के मुकाबले दर्शकों की संख्या आधी रह गई है. टिकट बिक्री, बुकमेकर लाइसेंस और सट्टेबाजी से होने वाली कमाई भी लगातार घट रही है.

मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में एक ‘ब्रूआउट’ रेसिंग कार्निवल आयोजित किया गया, जिसने खुद को इंस्टाग्राम पर मौजूद दर्शकों के बीच प्रचारित किया है. दिल्ली रेस क्लब की सोशल मीडिया पर ऐसी कोई खास मौजूदगी नहीं है | फ़ोटो: Instagram/@rwitcmumbai

जीएसटी के अलावा गिरावट की एक बड़ी वजह युवा दर्शकों की कमी भी है.

अंदरूनी सूत्र ने कहा, “अब सिर्फ बुजुर्ग सट्टेबाज ही आते हैं.”

क्लब की सदस्यता भी लगभग ठहर गई है और पिछले दस साल में बहुत कम नए सदस्य जुड़े हैं. नेतृत्व भी एक ही परिवार में रहा. क्लब अध्यक्ष जेएस बेदी, जिन्होंने अपने पिता पीएस बेदी की जगह ली, 2016 से लगातार सर्वसम्मति से चुने जाते रहे हैं. कुछ सदस्यों के लिए यही पुरानापन क्लब की खासियत था.

कोटवाल ने कहा, “यह मिस्टर बेदी के आसपास एक छोटा और करीबी क्लब जैसा था. वही लोग बने रहे. क्लब ठीक चल रहा था, इसलिए हमने कुछ नया करने की कोशिश नहीं की.”

जो रेस ट्रैक अभी भी ठीक-ठाक चल रहे हैं, वे या तो अपनी जमीन के मालिक हैं, या उन्होंने राज्य सरकारों के साथ लंबे समय का समझौता कर लिया है, या फिर उन्होंने संस्थागत सुस्ती से खुद को बचा लिया है. उदाहरण के लिए हैदराबाद का रेसकोर्स सुरक्षित है, क्योंकि 1956 में सातवें निजाम ने बहुत कम कीमत पर जमीन क्लब को बेच दी थी. वहीं मुंबई के रॉयल वेस्ट इंडिया टर्फ क्लब ने 2024 में नगर निगम से 30 साल की नई लीज हासिल की, लेकिन इसके बदले उसने अपनी 120 एकड़ केंद्रीय जमीन ट्रैक के पास सार्वजनिक पार्क के लिए छोड़ दी.

जहां सफलता की कहानियां हैं, वहां अमीर संरक्षक भी मौजूद हैं. महालक्ष्मी रेसकोर्स के मेंबर्स एरिया में नियमित रूप से आने वालों में साइरस पूनावाला का पूनावाला परिवार शामिल है, जो वैक्सीन निर्माता बनने से पहले घोड़े पालने के लिए जाना जाता था. शापूर मिस्त्री भी वहां आते हैं.

सुरेंद्रनाथ ने हंसते हुए कहा, “इस खेल को चलाने के लिए हमेशा पैसा मौजूद रहता है.”

कुछ क्लबों ने उसी पैसे से खुद को नया रूप दिया है. 2024 से रॉयल कलकत्ता टर्फ क्लब ने लाउंज, रेस्तरां और 35 साल से कम उम्र के लोगों के लिए अलग जगहें बनाई हैं. 2022 से 2024 के बीच पूनावाला परिवार ने पुणे टर्फ क्लब के नवीनीकरण पर 12 करोड़ रुपये खर्च किए. सुरेंद्रनाथ ने कहा कि मुंबई ने भी इस साल “आक्रामक तरीके” से खुद का प्रचार किया, जिसमें क्राफ्ट कॉकटेल बार, शानदार खाने के पॉप-अप और रेसिंग सीजन के दौरान लाइव बैंड शामिल थे. उनके मुताबिक 1 फरवरी को लंबे समय बाद डर्बी डे पर 18 से 19 हजार लोग पहुंचे.

लेकिन दिल्ली रेस क्लब के पास न निजाम की दी हुई जमीन है, न नगर निगम के साथ कोई समझौता, न कोई अमीर संरक्षक और न ही अब तक कोई बड़ा सार्वजनिक समर्थन अभियान. 1986 में भी इसकी दर्शक दीर्घाओं को “जर्जर” कहा गया था और अब वहां मुंबई के मुकाबले मुश्किल से दसवां हिस्सा लोग आते हैं.

जब क्लब अदालत के फैसले का इंतिजार कर रहा है, तब भी उसके पुराने सदस्य अगस्त में होने वाले रेसिंग सीजन का इंतजार कर रहे हैं.

अंगद सिंह संधू ने हल्के व्यंग्य में कहा, “पूरी इंडस्ट्री खत्म हो रही है. हमारे जैसे पागल लोग, जो इसके लिए जुनूनी हैं, वही इसे जिंदा रखे हुए हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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