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Wednesday, 21 October, 2026
होमThe FinePrintदिल्ली के पार्कों में अंधेरा, CCTV की कमी और महिलाओं में डर: क्या अलग 'पिंक पार्क' हैं समाधान?

दिल्ली के पार्कों में अंधेरा, CCTV की कमी और महिलाओं में डर: क्या अलग ‘पिंक पार्क’ हैं समाधान?

दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में हुए गैंगरेप के बाद सुरक्षा ऑडिट की झड़ी लग गई है, बेहतर लाइटिंग के वादे किए जा रहे हैं, और यहां तक कि 'महिला पार्कों' की योजनाएं भी बन रही हैं. ऐसा पहले भी हो चुका है.

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पिछले शुक्रवार शाम करीब 7 बजे तक हौज खास स्थित दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के जिला पार्क में अंधेरा छा गया था. रास्तों पर लगी लाइटें जल रही थीं, लेकिन पार्क में बने गज़ीबो और बैठने की जगहें मुश्किल से दिखाई दे रही थीं. झाड़ियों में जानवरों की आहट थी और घास में कीड़े-मकोड़ों की आवाजें सुनाई दे रही थीं. कुछ पुरुष दौड़ लगा रहे थे, लेकिन वहां एक भी महिला नज़र नहीं आई.

मुख्य गेट पर तैनात गार्ड ने कहा, “शाम 7-8 बजे तक सुरक्षित रहता है. इसके बाद रात में लोग, ज्यादातर पुरुष, दीवार फांदकर अंदर आ जाते हैं. वे गेट से नहीं आते.”

हौज खास का पार्क कोई अपवाद नहीं है. सूरज ढलते ही दिल्ली के कई पार्क अंधेरे में डूब जाते हैं और महिलाओं के लिए असुरक्षित हो जाते हैं. 21 सितंबर को आस्था कुंज पार्क में 17 साल की एक किशोरी के साथ कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया था. इस घटना के बाद सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा की मांग को लेकर सैकड़ों महिलाओं ने प्रदर्शन किया.

घटना और उसके बाद हुए विरोध ने अधिकारियों को कदम उठाने पर मजबूर किया है. 13 अक्टूबर को दिल्ली नगर निगम (MCD) ने शहर के सभी 250 वार्डों में महिलाओं के लिए एक-एक अलग पार्क बनाने का प्रस्ताव रखा. इन पार्कों में महिला सुरक्षा गार्ड तैनात करने और सीसीटीवी कैमरे लगाने की योजना है.

वहीं, दुष्कर्म की घटना के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण ने अपने पार्कों की सुरक्षा का आंतरिक ऑडिट कराया. DDA शहर के बड़े हरित क्षेत्रों का प्रबंधन करता है. ऑडिट में पता चला कि उसके 736 पार्कों में से केवल 16 में सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे हैं. यह कुल पार्कों का करीब 2 फीसदी है.

दिल्ली में DDA के हौज खास डिस्ट्रिक्ट पार्क में दौड़ता हुआ एक व्यक्ति. ‘आस्था कुंज’ गैंगरेप के बाद DDA के सुरक्षा ऑडिट में, इसे ‘हाई-रिस्क’ माने गए 190 पार्कों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया था | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

ऑडिट में 190 पार्कों को ‘अत्यधिक जोखिम वाले’ यानी हाई-रिस्क की श्रेणी में रखा गया. इनमें आस्था कुंज, हौज खास जिला पार्क, संजय झील, जहांपनाह सिटी फॉरेस्ट और यमुना के बाढ़ क्षेत्र में स्थित जैव विविधता पार्क शामिल हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, 520 पार्कों में अतिरिक्त लाइटें लगाने की जरूरत है, 323 पार्कों में कैमरे लगाए जाने चाहिए और 163 पार्कों के गेट ऐसे हैं जिन्हें बंद नहीं किया जा सकता. इसी महीने DDA ने बताया था कि 520 पार्कों में से 106 में लाइट लगाने का काम पूरा हो चुका है. यानी करीब पांच में से एक पार्क में यह काम पूरा हुआ है.

ऐतिहासिक रूप से, दिल्ली में ‘पर्दा बाग’ जैसे कुछ पार्क केवल महिलाओं के लिए हुआ करते थे. हाल ही में बागवानी विभाग के अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक में, स्थायी समिति के अध्यक्ष ने सुझाव दिया है कि हर वार्ड में एक ऐसा पार्क चुना जाए जिसे ‘महिला पार्क’ के रूप में घोषित किया जा सके.”

– संजीव मित्तल, एमसीडी एडिशनल कमिश्नर

हालांकि, दिल्ली के सार्वजनिक पार्कों में अंधेरे और सुरक्षा की कमी का मुद्दा पहली बार नहीं उठा है. इससे पहले भी सुरक्षा के नाम पर कई योजनाओं की घोषणा की गई, लेकिन अंधेरे और सुनसान कोनों में अपराध होते रहे. साल 2023 में घोषित ‘पिंक पार्क’ योजना भी आगे नहीं बढ़ पाई.

2012 में निर्भया सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद महिला अधिकार संगठन जागोरी ने ‘सेफ दिल्ली कैंपेन’ के तहत शहर में सुरक्षा ऑडिट किए थे. इनमें खराब रोशनी, सड़कों पर लोगों की कम मौजूदगी, सार्वजनिक परिवहन के आखिरी पड़ाव तक पहुंचने में दिक्कत और अंधेरा होने के बाद महिलाओं की कम आवाजाही जैसी समस्याएं सामने आई थीं.

इन निष्कर्षों को जस्टिस वर्मा समिति की रिपोर्ट में भी शामिल किया गया. रिपोर्ट में कहा गया कि अंधेरे वाले इलाकों में अपराध होने की आशंका अधिक रहती है और सड़कों पर बेहतर रोशनी की जरूरत है. 2014 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी दिल्ली पुलिस को महिलाओं के खिलाफ अधिक अपराध वाले इलाकों की पहचान करने का निर्देश दिया था. इसके बाद कई जगह स्ट्रीट लाइटों की कमी को सुरक्षा से जुड़ी समस्या के रूप में पहचाना गया.

दिल्ली के कालकाजी स्थित आस्था कुंज पार्क में हुए गैंगरेप की पीड़िता के समर्थन में LSR की छात्राओं ने एकजुटता मार्च निकाला | फोटो: सूरज सिंह बिष्ट | दिप्रिंट

इसके बावजूद, सुरक्षा से जुड़े ऐप सेफ्टीपिन ने 2016 में दिल्ली की सड़कों का सर्वे कर 7,438 अंधेरे वाले स्थानों की पहचान की. 2019 तक सरकारी कदमों के बाद इनकी संख्या घटकर 2,768 रह गई. हालांकि, शहर के बाहरी इलाकों में नए अंधेरे वाले हिस्से सामने आते रहे.

28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में हाल में हुई यौन हिंसा की घटनाओं, जिनमें आस्था कुंज का मामला भी शामिल है, पर स्वतः संज्ञान लिया. कोर्ट ने कहा कि लोगों की बुनियादी सुरक्षा सुनिश्चित करने में कानून लागू करने वाली एजेंसियों और नागरिक प्रशासन की व्यवस्था पूरी तरह नाकाम रही है.

कोर्ट ने चार हफ्ते के भीतर रोशनी, सीसीटीवी कैमरों और संवेदनशील इलाकों का ऑडिट करने का आदेश दिया. इसमें पार्कों को भी शामिल किया गया.

सड़कों पर लाइटें लगाने, निर्भया फंड के तहत सेफ सिटी प्रोजेक्ट और दूसरी योजनाओं के बावजूद दिल्ली के पार्कों में जाने वाली महिलाएं सूरज ढलने से पहले ही वहां से निकलना पसंद करती हैं. आस्था कुंज पार्क में अब लाइटें और कैमरे लगाए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद महिलाएं वहां खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही हैं.

लेडी श्रीराम कॉलेज की 22 वर्षीय छात्रा ने शाम करीब 5.30 बजे पार्क से निकलने की तैयारी करते हुए कहा, “कितनी भी लाइटें और कैमरे लगा दिए जाएं, मैं अंधेरा होने के बाद इस पार्क में नहीं रुक सकती. यहां अचानक सन्नाटा छा जाता है. यहां पहले भी कई अपराध हो चुके हैं. मैं अपनी सुरक्षा को जोखिम में क्यों डालूं?”

हर कोने में लाइट लगाना ‘संभव नहीं’

छात्रा की तरह 34 वर्षीय गृहिणी विभा भी अंधेरा होने से पहले पार्क से निकल जाती हैं. वह अक्सर बच्चों को ट्यूशन छोड़ने के बाद कुछ समय बिताने के लिए आस्था कुंज पार्क आती हैं. कभी अकेले तो कभी परिवार के साथ.

लेकिन पार्क का एक हिस्सा ऐसा है, जहां वह शाम 7 बजे के बाद अपने पति और दोस्तों के साथ भी जाने से बचती हैं. यह हिस्सा नेहरू प्लेस के पास स्थित मॉल से सटा हुआ है.

विभा ने कहा, “यहां से गुजरने में सिर्फ एक मिनट लगता है, लेकिन शाम 7 बजे के बाद इस रास्ते से नहीं जा सकते. सड़क पर लाइटें हैं, गाड़ियां चलती हैं और लोग नजर आते हैं. लेकिन कुछ ही कदम आगे पार्क में घुप अंधेरा है. ऐसा लगता है जैसे किसी डरावनी जगह पर आ गए हों.”

शुक्रवार शाम को सूरज ढलते ही, कई महिलाओं ने दिल्ली के कालकाजी स्थित डीडीए के ‘आस्था कुंज पार्क’ से जल्दी-जल्दी बाहर निकलना शुरू कर दिया। | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

पिछले महीने हुई वारदात पार्क के एक अंधेरे और सुनसान हिस्से में हुई थी. आरोप है कि पुलिसकर्मी बनकर आए तीन पुरुषों ने 17 वर्षीय किशोरी को उसके पुरुष मित्र से अलग कर दिया और उसके साथ यौन हिंसा की. बताया गया कि पार्क के प्रवेश द्वार पर लगे सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे और घटनास्थल के आसपास रोशनी भी बहुत कम थी या बिल्कुल नहीं थी. दिल्ली पुलिस के पहले के सर्वे में भी आस्था कुंज के आसपास के इलाके को अंधेरे वाले स्थानों में शामिल किया गया था.

झाड़ियों के पीछे एकदम अंधेरा है. सिर्फ रास्ते पर ही रोशनी है. पता नहीं झाड़ियों में कौन छिपा बैठा हो.

– विभा, 34 वर्षीय गृहिणी, आस्था कुंज पार्क

दिल्ली में ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं. अगस्त 2024 में बुद्ध जयंती पार्क में शाम के समय एक महिला के साथ दो पुरुषों द्वारा कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म किया गया था. 2016 में अमन विहार के एक पार्क में दो किशोरियों के साथ कथित तौर पर सामूहिक दुष्कर्म हुआ था.

सितंबर की घटना के बाद अधिकारियों ने आस्था कुंज पार्क के असुरक्षित हिस्सों को दुरुस्त करने की कोशिश की है. वहां तैनात एक गार्ड ने बताया कि रास्तों तक रोशनी पहुंचाने के लिए पेड़ों की छंटाई की गई है और पार्क में अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. गेटों पर करीब 10 गार्ड तैनात हैं और महिला पुलिसकर्मी स्कूटर से गश्त करती हैं. रात 8 बजे के बाद गार्ड टॉर्च लेकर पार्क में घूमते हैं और लोगों को सुनसान जगहों से हटाते हैं.

शाम ढलने पर कुछ महिलाएं अभी भी आस्था कुंज पार्क में थीं, लेकिन कई महिलाओं ने कहा कि वे अंधेरा होने से पहले चली जाएंगी | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

लेकिन DDA का यह पार्क करीब 142 एकड़ में फैला है और इसमें 29 गेट हैं. ऐसे में हर कोने की सुरक्षा करना चुनौती है. पार्क की चारदीवारी भी इतनी नीची है कि उसे आसानी से फांदा जा सकता है.

गार्ड ने कहा, “पार्क बहुत बड़ा है. हर कोने में लाइट लगाना संभव नहीं है.”

विभा का कहना है कि नई लाइटों से घनी झाड़ियों और पेड़ों के नीचे अब भी पर्याप्त रोशनी नहीं पहुंचती.

उन्होंने कहा, “झाड़ियों के पीछे सब अंधेरा है. सिर्फ पैदल चलने वाले रास्ते पर रोशनी है. पता नहीं झाड़ियों में कौन छिपा हो. ऐसा नहीं होना चाहिए कि पांच जगह कैमरे लगा दिए जाएं और दस जगह छोड़ दी जाएं. जहां कैमरे नहीं होंगे, अपराधी वहीं छिप सकते हैं.”

खुली सीमाएं और अंधेरे वाले हिस्से

हौज खास जिला पार्क के मुख्य गेट पर तैनात गार्ड के मुताबिक, पार्क में लाइटें पहले से लगी हुई हैं, हालांकि उनकी मरम्मत का काम चल रहा है. लेकिन करीब 100 एकड़ में फैले इस पार्क में रोशनी मुख्य रूप से पैदल चलने वाले रास्तों तक ही सीमित दिखाई देती है.

मुख्य प्रवेश द्वार पर बड़ी सफेद लाइट लगी थी, लेकिन अंदर जाने पर बहुत कम दिखाई दे रहा था. यहां-वहां बेंच पर किसी के बैठे होने का अंदाजा तो लगता था, लेकिन अंधेरे के कारण उन्हें साफ देख पाना मुश्किल था.

पार्क के बाहर लगे बोर्ड पर बंद होने का समय रात 9 बजे लिखा है. हालांकि, गार्ड ने बताया कि पार्क रात 8 बजे ही बंद कर दिया जाता है.

उसने कहा, “महिलाएं अंधेरा होने के बाद यहां नहीं आतीं. कभी-कभी एक-दो महिलाएं दौड़ लगाने आ जाती हैं.”

हौज़ खास डिस्ट्रिक्ट पार्क के अंधेरे विस्तार में रोशनी के कुछ हिस्से | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

गार्ड के मुताबिक, अंधेरा होने के बाद कुछ लोग पार्क में सिगरेट पीने, शराब पीने और नशा करने आते हैं. ऐसे लोगों को देखकर गार्डों को पुलिस बुलाने के निर्देश दिए गए हैं. लेकिन कई बार पुलिस के पहुंचने से पहले ही वे भाग जाते हैं.

पार्क में कई छोटे गेट भी हैं. इनमें एक मूर्ति के पीछे बने दो गेट ऐसे हैं, जिन्हें बंद नहीं किया जा सकता.

गार्ड ने कहा, “अगर मुख्य गेट बंद भी कर दें, तो दूसरा गेट खुला रहता है. कोई मुख्य गेट से आने की हिम्मत नहीं करता, लेकिन पीछे से लोग अंदर आ जाते हैं.”

लगभग 100 एकड़ में फैले हौज खास डिस्ट्रिक्ट पार्क के सभी गेटों पर पहरा नहीं लगाया जा सकता और न ही उन्हें ताला लगाया जा सकता है | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

रात में पूरे पार्क की निगरानी के लिए केवल तीन-चार गार्ड तैनात रहते हैं. मुख्य गेट पर मौजूद गार्ड ने बताया कि उसने खुद कभी रात की शिफ्ट में काम नहीं किया. उसके मुताबिक, ड्यूटी के दौरान चेन छीनने की एक घटना को छोड़कर उसने कोई बड़ी वारदात नहीं देखी.

रिपोर्टों के मुताबिक, DDA अब 5,000 नए सुरक्षा कर्मचारियों की भर्ती कर रहा है. साथ ही, 134 संवेदनशील पार्कों में हथियारबंद सुरक्षाकर्मियों को तैनात करने की योजना है. अन्य 231 पार्कों में रोशनी लगाने का काम चल रहा है. 245 बड़े पार्कों में रात के समय गश्त शुरू कर दी गई है और 602 पार्कों में गार्डों की बायोमेट्रिक हाजिरी की व्यवस्था लागू की गई है.

DDA के जनसंपर्क अधिकारी बिजय पटेल ने दिप्रिंट से कहा, “सभी पार्कों का ऑडिट पूरा हो गया है. जहां जरूरत है, वहां प्राथमिकता के आधार पर कदम उठाए जा रहे हैं.”

सुप्रीम कोर्ट के 28 सितंबर के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस भी शहर के संवेदनशील इलाकों का दोबारा सुरक्षा ऑडिट कर रही है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से सेफ सिटी प्रोजेक्ट की प्रगति की जानकारी भी मांगी है. यह परियोजना 2018 में सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी. इसके तहत सीसीटीवी निगरानी और पुलिस की त्वरित कार्रवाई को बेहतर बनाने की योजना है.

दिल्ली पुलिस के दक्षिण-पश्चिम जिले में तैनात सब-इंस्पेक्टर परमवीर ने कहा कि पुलिस महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है और सभी पार्कों में गश्त की जाती है.

ऊंची दीवारें और तेज रोशनी भी काफी नहीं

पार्कों में अधिक गार्ड तैनात करना, लाइटें लगाना और चारदीवारी ऊंची करना ही सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काफी नहीं है. सेफ्टीपिन की कार्यक्रम प्रबंधक ऋत्विका राजीव के मुताबिक, कुछ मामलों में ऐसे कदम उलटे नुकसान भी पहुंचा सकते हैं.

उन्होंने कहा, “तीन चीजें सबसे ज्यादा जरूरी हैं. रोशनी उनमें से एक है. बाकी दो हैं—दिखाई देना और नजर की सीध में होना.”

उन्होंने शहरी नियोजन विशेषज्ञ जेन जैकब्स के ‘सड़कों पर लोगों की मौजूदगी से निगरानी’ के विचार का जिक्र किया. इसका मतलब है कि आसपास लोगों की मौजूदगी से सार्वजनिक जगहों पर स्वाभाविक निगरानी बनी रहती है.

ऊंची दीवारें और घनी झाड़ियां किसी जगह को चारों तरफ से बंद और सुनसान बना सकती हैं. ऐसी जगहों पर अपराध होने और लोगों के मन में अपराध का डर पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है.

राजीव ने कहा, “अगर कोई युवती ऐसी जगह फंस जाए और वहां चारों तरफ ऊंची दीवारें हों, तो कोई उसे देख नहीं पाएगा. मदद के लिए उसकी चीख भी किसी तक नहीं पहुंचेगी.”

आस्था कुंज पार्क में नई और तेज़ रोशनी वाली लाइटें लगाई गई हैं, लेकिन कई महिलाओं का कहना है कि रात के समय उन्हें वहाँ अभी भी सुरक्षित महसूस नहीं होता | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

उनका सुझाव है कि पार्कों में ऐसे रास्ते होने चाहिए, जहां से दूर तक साफ दिखाई दे. बाहर निकलने के कई रास्ते हों और चारदीवारी इतनी नीची हो कि बाहर से भी अंदर की गतिविधियां नजर आ सकें. दिन के अलग-अलग समय पर पार्क में लोगों की पर्याप्त आवाजाही भी होनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “असुरक्षा से जुड़े इन जोखिमों को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है कि पार्क में गतिविधियां बढ़ाई जाएं और ज्यादा से ज्यादा लोग वहां आएं.”

असल में तीन मुख्य बातें मायने रखती हैं: इनमें से एक है लाइटिंग. बाकी दो हैं विज़िबिलिटी (दृश्यता) और लाइन ऑफ़ साइट (नज़र का दायरा).

– ऋत्विका राजीव, प्रोग्राम मैनेजर, सेफ़्टीपिन

राजीव के मुताबिक, लाइटें लगाने की योजना भी सोच-समझकर बनानी चाहिए. लाइटें ऐसी जगह लगनी चाहिए कि पेड़ों की वजह से अंधेरे वाले हिस्से न बनें. साथ ही, घनी और बढ़ी हुई झाड़ियों की नियमित छंटाई भी जरूरी है, ताकि आसपास साफ दिखाई दे.

अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील और दक्षिण कोरिया में किए गए अध्ययनों के 2022 के एक संयुक्त विश्लेषण में पाया गया कि सड़कों पर बेहतर रोशनी होने से कुल अपराधों में 14 फीसदी की कमी जुड़ी हुई थी. हालांकि, हिंसक अपराधों में कोई बड़ी कमी नहीं मिली.

ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के 2019 के एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि तेज रोशनी होने से जरूरी नहीं कि महिलाएं खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करें. कभी-कभी इससे खतरे का एहसास बढ़ भी सकता है. उदाहरण के लिए, अगर रास्ता तेज रोशनी में हो लेकिन उसके आसपास अंधेरा हो, तो सामने से आने वाले व्यक्ति को देख पाना मुश्किल हो सकता है.

आस्था कुंज पार्क में एक सीसीटीवी कैमरा | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

आस्था कुंज पार्क में झील के पास 20 वर्षीय खुशबू अपनी दो सहेलियों के साथ बैठी थीं. बिहार की रहने वाली खुशबू ने बताया कि एक बार पार्क में कुछ पुरुषों ने उनकी बहन को पकड़ लिया था. उनकी बहन चिल्लाने लगीं, जिसके बाद वह किसी तरह बच पाईं. उस समय दिन ढलने में अभी समय था.

नई लाइटों और कैमरों के बारे में खुशबू ने कहा, “यह सब दिखावे के लिए है. भारत में किसी घटना के बाद ही बदलाव होता है. हर किसी को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ती है. अगर कोई अपराध करना चाहता है, तो वह करेगा ही.”

36 वर्षीय घरेलू कामगार ममता अपनी 14 साल की बेटी के साथ पार्क में थीं. वह पास में रहती हैं और पार्क से सटी रिहायशी कॉलोनियों में काम करती हैं. वह पिछले आठ-नौ साल से कुछ समय शांति से बिताने के लिए यहां आती रही हैं.

ममता ने कहा, “पहले यह पार्क अच्छा हुआ करता था. बाहर से आए लोगों ने शहर को बिगाड़ दिया है. अंधेरा होने के बाद यहां जुआ खेलने वाले और शराब पीने वाले लोग आ जाते हैं.”

उन्हें नहीं लगता कि लाइटें लगाने से ज्यादा फर्क पड़ेगा.

उन्होंने कहा, “रोशनी होने के बावजूद पुरुष दुष्कर्म कर सकते हैं. फिर रात में यहां आने की जरूरत ही क्या है?”

हौज़ खास डिस्ट्रिक्ट पार्क में गेट के पास बने रास्तों पर अच्छी रोशनी है. मोनाश यूनिवर्सिटी की 2019 की एक स्टडी में पाया गया कि अंधेरे से घिरे हुए, लेकिन तेज़ रोशनी वाले रास्तों पर महिलाओं को कम सुरक्षित महसूस हो सकता है, क्योंकि उन्हें यह देखने में दिक्कत होती है कि उनकी तरफ कौन आ रहा है | फोटो: हिमांशी अग्रवाल | दिप्रिंट

फिर लौट रही ‘पिंक पार्क’ की योजना?

दिल्ली नगर निगम का प्रस्ताव केवल सुरक्षा बढ़ाने तक सीमित नहीं है. इसके तहत महिलाओं के लिए अलग पार्क बनाने की योजना है. नगर निगम दिल्ली के सभी 250 वार्डों में एक-एक पार्क सिर्फ महिलाओं के लिए आरक्षित करना चाहता है. इस प्रस्ताव पर निगम की स्थायी समिति की बैठक में चर्चा हुई थी.

MCD के अतिरिक्त आयुक्त संजीव मित्तल ने दिप्रिंट से कहा, “दिल्ली में पहले भी कुछ पार्क, जैसे पर्दा बाग, सिर्फ महिलाओं के लिए हुआ करते थे. हाल ही में स्थायी समिति के अध्यक्ष ने बागवानी विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक में सुझाव दिया कि हर वार्ड में एक पार्क की पहचान कर उसे महिला पार्क बनाया जाए.”

यह योजना 2023 में आम आदमी पार्टी के नेतृत्व वाले दिल्ली नगर निगम की ओर से प्रस्तावित ‘पिंक पार्क’ योजना जैसी है. उस समय भी दिल्ली के सभी वार्डों में महिलाओं के लिए अलग पार्क बनाने की बात कही गई थी. हालांकि, संसाधनों की कमी के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई.

माता सुंदरी रोड के पास एक पायलट पिंक पार्क बनाया गया था, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक अब उसकी हालत खराब हो चुकी है. दिल्ली में पहले से भी कुछ ऐसे पार्क हैं, जहां सिर्फ महिलाओं के जाने की व्यवस्था रही है. इनमें दरियागंज का पर्दा बाग और जामा मस्जिद तथा तुर्कमान गेट के पास स्थित महिला पार्क शामिल हैं.

दिल्ली के दरियागंज में परदा बाग | फोटो: अलमीना खातून | दिप्रिंट

मित्तल ने कहा कि नया प्रस्ताव अभी शुरुआती चरण में है. बागवानी विभाग संबंधित इलाकों की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) से बातचीत करके ऐसे पार्कों की पहचान करेगा. इसके बाद प्रस्ताव स्थायी समिति के अध्यक्ष के सामने रखा जाएगा.

उन्होंने कहा, “हम RWA से इन सुविधाओं की जरूरत पर चर्चा करेंगे. इसके बाद प्रस्ताव पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.”

मित्तल ने बताया कि MCD के ज्यादातर पार्क छोटे हैं और रिहायशी इलाकों में स्थित हैं. कुदसिया बाग जैसे कुछ पार्क इसके अपवाद हैं. उनके मुताबिक, इन छोटे पार्कों में रोशनी की समस्या उतनी गंभीर नहीं है.

उन्होंने कहा, “फिर भी माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक पार्कों में सुधार के कदम उठाए जा रहे हैं. इनमें चारदीवारी की मरम्मत, अंधेरे वाले हिस्सों को ठीक करना, बेहतर रोशनी और सुरक्षा गार्ड तैनात करना शामिल है. ऑडिट जारी हैं और टेंडर की प्रक्रिया चल रही है.”

हालांकि, सेफ्टीपिन की कार्यक्रम प्रबंधक ऋत्विका राजीव ने महिलाओं के लिए अलग-अलग पार्क बनाने के विचार पर सवाल उठाए. उनका कहना है कि सार्वजनिक जगहों को सुरक्षित बनाने के बजाय महिलाओं को अलग जगहों तक सीमित करना सही समाधान नहीं है.

उन्होंने कहा, “यह बेहद चिंताजनक है कि सार्वजनिक जगहों को असुरक्षित बनाने वाली वजहों को दूर करने के बजाय महिलाओं के लिए अलग जगहें बनाई जा रही हैं. इससे सार्वजनिक जगहों तक महिलाओं की पहुंच और उनके अनुभव में पहले से मौजूद असमानता और बढ़ सकती है.”

राजीव ने आगाह किया कि इस कदम से महिलाओं की आजादी सीमित हो सकती है.

उन्होंने कहा, “ऐसी स्थिति बन सकती है, जहां महिलाओं से सवाल किया जाए कि जब उनके लिए अलग पार्क बनाए गए हैं, तो वे आम सार्वजनिक पार्कों में क्यों जा रही हैं. इससे यह सोच सामान्य हो जाएगी कि महिलाओं की सुरक्षा तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब उन्हें बाकी लोगों से अलग रखा जाए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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