नई दिल्ली: भारत में मौत की सजा से जुड़े कानून के अनुसार, अदालतों को सिर्फ अपराध को नहीं देखना चाहिए, बल्कि दोषी व्यक्ति को भी समझना चाहिए. इसमें उसका पारिवारिक और सामाजिक बैकग्राउंड, मानसिक स्वास्थ्य और सुधरने की संभावना शामिल है. ट्रायल कोर्ट यानी निचली अदालतों द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन 2023 से सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी किसी भी सजा को बरकरार नहीं रखा है. मौत की सजा से जुड़े मामलों का अध्ययन करने वाले वकीलों का कहना है कि ट्रायल कोर्ट अक्सर इन बातों पर गंभीरता से विचार नहीं करती है.
2025 के आखिर तक कम से कम 574 लोग मौत की सजा पाने के बाद जेल में थे. सजा सुनाए जाने और ऊपरी अदालतों में उसकी जांच होने के बीच लंबे अंतर से यह सवाल उठता है कि भारत में मौत की सजा किस तरह दी जा रही है.
पिछले हफ्ते मेरठ की एक अदालत ने 26 साल की मुस्कान रस्तोगी और 28 साल के साहिल शुक्ला को मुस्कान के पति सौरभ राजपूत की हत्या की साजिश रचने और हत्या करने के लिए मौत की सजा सुनाई. यह मामला ‘ब्लू ड्रम’ केस के नाम से मशहूर हुआ था. 2025 में हुई इस हत्या ने पूरे देश का ध्यान खींचा था. सौरभ के शरीर के टुकड़े किए गए थे और उन्हें सीमेंट से भरे एक प्लास्टिक के ड्रम में डाल दिया गया था. इस मामले की सुनवाई सिर्फ 13 महीने में पूरी हो गई थी.
17 अक्टूबर 2026 को कर्नाटक के मैसूर में एक विशेष फास्ट ट्रैक अदालत ने 32 साल के कार्तिक को मौत की सजा सुनाई. उसे 2025 में नौ साल की बच्ची के साथ बेरहमी से यौन हिंसा करने और उसकी हत्या करने के मामले में पॉक्सो कानून के तहत दोषी ठहराया गया था. अदालत ने इस मामले को “दुर्लभ से दुर्लभतम” यानी “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” बताया. अदालत ने अपराध की बेहद क्रूरता को इसका आधार बनाया. बच्ची के शरीर पर चाकू से 27 बार वार किए गए थे.
16 अक्टूबर को मेरठ के एक अलग मामले में अमरदीप और रवीता को मौत की सजा सुनाई गई. दोनों ने रवीता के पति अमित कश्यप की गला घोंटकर हत्या कर दी थी. इसके बाद उन्होंने हत्या को सांप के काटने से हुई मौत बताने की कोशिश की. इसके लिए उन्होंने एक ऐसा सांप इस्तेमाल किया जिसके जहरीले दांत निकाल दिए गए थे और जो जहरीला नहीं था. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जयवीर सिंह नागर ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि “सजा का डर समाज को नियंत्रण में रखता है”.
मुजफ्फरनगर के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर इस साल सिर्फ चार महीनों में 10 मामलों के 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाने के कारण चर्चा में रहे हैं. पिछले महीने एक अन्य मामले में मौत की सजा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि वह अपराधियों के गिरोहों या अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी खतरों से डरकर काम करने के बजाय मरना पसंद करेंगे. उनके हिंदी आदेश में लिखा था, “मैं कायर जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करूंगा”.
भारत में कानून के अनुसार, ट्रायल कोर्ट द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट को उस सजा की पुष्टि करनी होती है. लेकिन समय के साथ ऐसा कम होता गया है. 2016 से 2025 के बीच हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की 70 मौत की सजाओं को बरकरार रखा. इनमें से सुप्रीम कोर्ट ने 37 मामलों पर फैसला सुनाया. हाई कोर्ट से मंजूर इन 37 मौत की सजाओं में से 14 यानी 37.83 प्रतिशत को सुप्रीम कोर्ट ने बदलकर उम्रकैद में तब्दील कर दिया. 15 मामलों यानी 40.54 प्रतिशत में आरोपियों को मौत की सजा से पूरी तरह बरी कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मामले में मौत की सजा को बरकरार नहीं रखा.
सिर्फ 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा से जुड़े 19 मामलों पर फैसला सुनाया. पांच अलग-अलग मामलों में पांच लोगों की मौत की सजा को बदलकर उम्रकैद कर दिया गया. इन सभी पांच मामलों में हाई कोर्ट पहले ही मौत की सजा की पुष्टि कर चुका था. 2025 में इन सभी पांच लोगों की सजा बदलकर ‘बिना किसी छूट के उम्रकैद’ यानी LWOR कर दी गई. इसका मतलब है कि दोषियों को अपनी बाकी पूरी जिंदगी जेल में बितानी होगी और उन्हें सजा में कोई छूट नहीं मिलेगी.
भारत में मार्च 2020 के बाद से किसी को फांसी नहीं दी गई है. मार्च 2020 में 2012 के दिल्ली गैंगरेप मामले में दोषी ठहराए गए चार लोगों को फांसी दी गई थी. 2023 से अब तक सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मौत की सजा की पुष्टि नहीं की है. इससे सजा सुनाने की प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं.
2022 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ नाम के ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि मौत की सजा तय करते समय सिर्फ अपराध को नहीं, बल्कि आरोपी व्यक्ति को भी ध्यान में रखना जरूरी है. अदालत ने निर्देश दिया था कि आरोपी के पक्ष में जाने वाली परिस्थितियों से जुड़ी जानकारी जुटाई जाए. इसमें उसका पारिवारिक और आर्थिक-सामाजिक बैकग्राउंड, मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी स्थितियां और जेल में उसका व्यवहार शामिल हैं.
2025 में ‘वसंता संपत दुपारे बनाम भारत संघ एवं अन्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक जांच, बौद्धिक अक्षमता, मानसिक बीमारी और सजा सुनाने के दौरान उचित मदद नहीं मिलने जैसे मुद्दों के महत्व पर विचार किया.
पछतावा आखिर दिखता कैसा है?
कोलकाता की ट्रायल कोर्ट में वकालत करने वाली संजुति चक्रवर्ती ने मौत की सजा दिए जाने वाले मामलों में आरोपियों का प्रतिनिधित्व किया है. उनका कहना है कि ट्रायल कोर्ट समय-समय पर मौत की सजा सुनाती रहती हैं, लेकिन इससे यह सवाल उठता है कि जज दोषी के सुधरने की संभावना का कितना सतही तरीके से आकलन करते हैं.
उनके मुताबिक, जज अक्सर अपनी निजी सोच के आधार पर तय करते हैं कि दोषी को अपने किए पर कितना पछतावा है और क्या वह सुधर सकता है. वे कई बार पछतावे को दिखाने के तरीके को लेकर अपनी धारणाओं पर भरोसा करते हैं. साथ ही, वे दोषी के पक्ष में मौजूद महत्वपूर्ण बातों को बिना ठोस कारण बताए खारिज कर देते हैं. वे “सामूहिक अंतरात्मा” यानी सामूहिक जनभावना के विचार का भी सहारा लेते हैं. इस तरह फैसले कानून के तय सिद्धांतों के बजाय जज की निजी सोच पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं.
अपनी बात को समझाने के लिए चक्रवर्ती पिछले पांच सालों में मनोज फैसले के बाद ट्रायल कोर्ट द्वारा मौत की सजा सुनाने के कारणों और बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा उन सजाओं को उम्रकैद में बदलने के कारणों के बीच बड़े अंतर का उदाहरण देती हैं.
मिसाल के तौर पर, वह कहती हैं कि ट्रायल के दौरान आरोपी अदालत में किस तरह व्यवहार करता है, इसे उसके पछतावे और सुधरने की संभावना का आधार बनाना गलत हो सकता है. इससे किसी व्यक्ति के भविष्य में बदलने की क्षमता जैसी जटिल बात का आकलन उसके शारीरिक हाव-भाव और व्यवहार के आधार पर होने लगता है. यह सोच औपनिवेशिक दौर की अनुशासन संबंधी धारणाओं से जुड़ी हुई है.
दूसरी ओर, हाई कोर्ट ने इन टिप्पणियों को खारिज करते हुए कहा कि राज्य यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी के सुधरने की संभावना पूरी तरह खत्म हो चुकी है. यह साबित करने की जिम्मेदारी राज्य की थी, लेकिन वह जरूरी सबूत पेश नहीं कर सका.
राज्य की कानूनी सहायता सेवाओं में पहले काम कर चुकीं चक्रवर्ती कहती हैं कि पश्चिम बंगाल के जिन मामलों का उन्होंने अध्ययन किया है, उनमें राज्य अक्सर प्रोबेशन रिपोर्ट, जेल में आरोपी के व्यवहार की रिपोर्ट और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जांच की रिपोर्ट जैसे दस्तावेज जमा करता है. लेकिन कई बार ऐसा सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए किया जाता है. इन दस्तावेजों में क्या जानकारी है और उसका क्या मतलब निकलता है, इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया जाता.
वह कहती हैं, “यहीं पर मौत की सजा से जुड़े कानून की उस बुनियादी जरूरत और वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर साफ दिखाई देता है, जिसमें सभी संबंधित लोगों से सजा तय करते समय अलग-अलग विषयों और विशेषज्ञताओं की मदद लेने की उम्मीद की जाती है, लेकिन इसके लिए जरूरी प्रशिक्षण की कमी है”.
चक्रवर्ती के मुताबिक, प्रशिक्षण की कमी पश्चिम बंगाल में एक और बार-बार सामने आने वाली समस्या में दिखाई देती है. वहां आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों को ऐसे देखा जाता है, जैसे वह सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहा हो. जबकि इन परिस्थितियों का स्वतंत्र रूप से आकलन किया जाना चाहिए.
उनका कहना है कि सजा तय करते समय इन परिस्थितियों को देखने का मकसद यह तय करना नहीं है कि जज को आरोपी पर तरस आता है या नहीं. बल्कि मौत की सजा तय करने का उद्देश्य अपराध से आगे बढ़कर अपराध करने वाले व्यक्ति को समझना है, ताकि यह सही तरीके से आकलन किया जा सके कि उसने अपराध किन परिस्थितियों में किया.
इसके अलावा, चक्रवर्ती भारतीय कानून के उस बुनियादी नियम पर भी चिंता जताती हैं, जिसके तहत मौत की सजा तय करते समय अपराध को गंभीर बनाने वाली परिस्थितियों, आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों और उसके सुधरने की संभावना के बीच संतुलन बनाना जरूरी है.
उनका कहना है कि अपराध से जुड़ी गंभीर परिस्थितियों को आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों के साथ तौलने की यह प्रक्रिया अपने आप में विरोधाभासी हो सकती है, क्योंकि किसी भी व्यक्ति की जिंदगी ऐसी नहीं होती जिसमें उसके पक्ष में जाने वाली कोई परिस्थिति मौजूद ही न हो.
इससे फिर वही समस्या पैदा होती है जिसमें सजा तय करने की प्रक्रिया जज की निजी सोच पर निर्भर हो जाती है. एक जज जिस बात को आरोपी के पक्ष में मान सकता है, दूसरा जज उसी बात को उसके खिलाफ मान सकता है. जबकि सुप्रीम कोर्ट ऐसी सोच को हतोत्साहित करना चाहता है.
वह मौत की सजा तय करने में जनता की भूमिका पर भी एक बड़ा सवाल उठाती हैं, खासकर उन मामलों में जो मीडिया में बहुत ज्यादा चर्चा में रहते हैं. उनका कहना है कि भारतीय मौत की सजा से जुड़े फैसलों में अक्सर इस्तेमाल होने वाला “सामूहिक अंतरात्मा” का विचार एक काल्पनिक धारणा है, जिसे किसी वस्तुनिष्ठ तरीके से परिभाषित करना संभव नहीं है.
उनके अनुसार, जजों को किसी अपराध के बाद जनता की तत्काल प्रतिक्रिया और सजा तय करने वाले कानूनी सिद्धांतों के बीच अंतर समझना चाहिए.
वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा पिछले करीब 30 साल से आपराधिक कानून के मामलों में वकालत कर रहे हैं. उनका मानना है कि ट्रायल कोर्ट द्वारा बढ़ती संख्या में मौत की सजा सुनाया जाना इस बात को दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट के बदलते कानूनी सिद्धांतों को सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है.
उनका कहना है कि कोई अपराध कितना भी गंभीर या परेशान करने वाला क्यों न हो, सिर्फ उसकी गंभीरता के आधार पर मौत की सजा नहीं दी जा सकती. आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों और उसके सुधरने की संभावना का सावधानी से आकलन करना जरूरी है.
मल्होत्रा बताते हैं कि यह साबित करने की जिम्मेदारी राज्य की है कि कैदी के सुधरने की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि कैदी राज्य की हिरासत में रहता है. अगर राज्य यह साबित नहीं कर पाता, तो मौत की सजा दी जानी चाहिए या नहीं, यह तय करते समय इसका फायदा आरोपी को मिलना चाहिए.
मल्होत्रा खास तौर पर इस बात की आलोचना करते हैं कि ट्रायल कोर्ट कई बार जनता की भावनाओं और अपराध की क्रूरता से प्रभावित होकर मौत की सजा सुनाती हैं. हाल के ‘ब्लू ड्रम’ हत्या मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “ट्रायल कोर्ट वास्तव में इस मामले की भावनाओं में बह गई है”.
वह यह भी बताते हैं कि ऐसे मामलों में मौत की सजा सुनाने से अतिरिक्त कानूनी कार्रवाई बढ़ती है, जबकि ऊपरी अदालतों द्वारा उस सजा को बरकरार रखे जाने की संभावना कम होती है.
ट्रायल कोर्ट द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद उस सजा की पुष्टि के लिए मामला हाई कोर्ट भेजना जरूरी होता है. साथ ही, दोषी की अपील पर भी सुनवाई होती है. मल्होत्रा का तर्क है कि अगर ट्रायल कोर्ट ऐसे मामलों में उचित उम्रकैद की सजा सुनाए, जो मौत की सजा के तय मानकों पर खरे नहीं उतरते, तो पुष्टि के लिए होने वाली अनावश्यक कानूनी कार्यवाही से बचा जा सकता है.
मल्होत्रा मीडिया कवरेज को भी आपराधिक न्याय व्यवस्था पर दबाव डालने वाला एक संभावित कारण मानते हैं, खासकर ट्रायल कोर्ट के स्तर पर.
वह कहते हैं, “आपराधिक मामलों में 30 साल से वकालत करते हुए मेरा ईमानदारी से मानना है कि जिस भी मामले में मीडिया दखल देने लगता है, आरोपी के लिए स्थिति बहुत खराब हो जाती है”.
मल्होत्रा के मुताबिक, ऐसे मामले बताते हैं कि अदालतों को जनता की धारणा और उचित संदेह से परे अपराध साबित करने के कानूनी मानक के बीच अंतर बनाए रखना चाहिए.
वह कहते हैं, “मीडिया कुछ हद तक शैतान की भूमिका निभाता है”. उनका मतलब है कि मीडिया का प्रभाव ट्रायल कोर्ट और जनता की राय को प्रभावित कर सकता है.
आंकड़े क्या बताते हैं?
2025 के आखिर में भारत में मौत की सजा पाने वाले कैदियों की संख्या 574 तक पहुंच गई. 2016 के बाद से किसी साल के आखिर में दर्ज की गई यह सबसे बड़ी संख्या थी.
स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की 2026 की रिपोर्ट ‘भारत में मौत की सजा: 2025 के सालाना आंकड़े’ के अनुसार, देशभर की ट्रायल कोर्ट यानी सत्र अदालतें लगातार लोगों को मौत की सजा सुना रही हैं.
सिर्फ 2025 में सत्र अदालतों ने 94 मामलों में 128 लोगों को मौत की सजा सुनाई. 2016 से 2025 के बीच के 10 सालों में ट्रायल कोर्ट ने 822 मामलों में 1,279 लोगों को शामिल करते हुए कुल 1,310 मौत की सजाएं सुनाईं.
इसके बावजूद, 2016 से 2025 के पूरे दशक में भारत में सिर्फ चार लोगों को फांसी दी गई. ये चारों फांसी 2020 में एक ही मामले में दया याचिकाएं और सुधारात्मक याचिकाएं अंतिम रूप से खारिज होने के बाद दी गई थीं.
31 दिसंबर 2025 तक, 478 कैदियों से जुड़े 312 मामले हाई कोर्ट में मौत की सजा की पुष्टि के इंतजार में लंबित थे. इन मामलों के लंबित रहने का औसत समय 2.99 साल था. सबसे ज्यादा देरी 19.11 साल तक पहुंच गई थी.
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मौत की सजा से जुड़े 18.2 प्रतिशत मामले 10 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं. वहीं, 21.2 प्रतिशत मामले सात से 10 साल के बीच से लंबित हैं.
2016 से 2025 के बीच ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 1,310 मौत की सजाओं में से 468 मामले सिर्फ हाई कोर्ट के स्तर पर लंबित हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2025 के दशक में हाई कोर्ट ने 285 लोगों को बरी किया, जो कुल मामलों का 33.84 प्रतिशत था. वहीं, 411 सजाओं को बदल दिया गया, जो 48.81 प्रतिशत था.
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा से जुड़े जिन 19 मामलों पर फैसला सुनाया, उनमें आधे से ज्यादा मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया गया. ऐसे कुल 10 मामले थे.
स्क्वायर सर्कल क्लिनिक के 2026 में प्रकाशित 10 साल के अध्ययन के अनुसार, 2016 से 2025 के बीच हाई कोर्ट ने जिन 1,085 मौत की सजाओं पर फैसला किया, उनमें से सिर्फ 106 सजाओं की पुष्टि की. यह लगभग 9.8 प्रतिशत है.
स्क्वायर सर्कल क्लिनिक में रिसर्च की निदेशक मैत्रेयी मिश्रा ने दिप्रिंट से बात करते हुए बताया कि 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जिन लोगों को बरी किया, उनके मामलों में बार-बार कई गंभीर समस्याएं सामने आईं.
इनमें ऐसे कबूलनामे शामिल थे जिन्हें अदालत में सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता था, सबूत जुटाने में गंभीर कमियां, भरोसे के लायक नहीं रहने वाले गवाह, गढ़ी गई गवाहियां, अभियोजन पक्ष की ओर से मामले को पेश करने में समस्याएं और अदालतों का जरूरत से ज्यादा उत्साह दिखाना शामिल था.
मिश्रा बताती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष के काम पर ही चिंता नहीं जताई, बल्कि इस बात पर भी सवाल उठाए कि अदालतें सबूतों की मजबूती की सही जांच किए बिना दोष साबित करने की दिशा में किस तरह आगे बढ़ती हैं.
वह सजा सुनाने की प्रक्रिया में ट्रायल कोर्ट के स्तर पर मौजूद एक गंभीर व्यवस्था संबंधी समस्या की ओर भी ध्यान दिलाती हैं.
उनका कहना है कि हाई कोर्ट से पुष्टि के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे सत्र अदालतों के मौत की सजा वाले मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक भी मौत की सजा को बरकरार नहीं रखा.
2025 के ‘वसंता संपत दुपारे’ फैसले के बाद, अगर सजा सुनाने के दौरान ‘मनोज’ फैसले के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जाता, तो यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.
मिश्रा बताती हैं कि जब सत्र अदालतें इन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रही हैं, तो फिलहाल रिकॉर्ड में मौजूद मौत की ज्यादातर सजाओं की संवैधानिक वैधता पर “गंभीर सवाल” उठते हैं.
वह आगे कहती हैं, “उदाहरण के लिए, हमारे आंकड़े बताते हैं कि 2025 में हाई कोर्ट से पुष्टि किए गए पांच मामलों में से सिर्फ एक मामले में, जिसमें पांच आरोपी थे, अदालत ने मनोज फैसले के दिशा-निर्देशों का पालन किया”.
सजा सुनाए जाने के चरण में मौजूद समस्याओं पर चिंता जताते हुए मिश्रा कहती हैं, “अगर ट्रायल कोर्ट वास्तव में ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ के मानकों को सही तरीके से लागू कर रही होतीं, तो ऊपरी अदालतों में फैसलों को बदलने की दर ऐसी नहीं होती”.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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