प्रदर्शन कई महीनों से जारी हैं. देशभर में लोग एक बार फिर सड़कों पर उतर आए हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और उसके युवा समर्थक एक बार फिर बैरिकेड के पास पहुंच गए हैं, जबकि उनके कुछ बड़े नेता हिरासत में हैं, लेकिन जेन ज़ी पीछे हटने को तैयार नहीं है. विपक्ष भी फिर से बैरिकेड के पास है और इस बार हम भी पीछे हटने वाले नहीं हैं.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने नागरिकों का वोट देने का अधिकार छीनकर ऐसा माफ नहीं किया जा सकने वाला काम किया है, जो लोगों के खिलाफ अपराध है और संविधान के बुनियादी ढांचे का अपमान है. दरअसल, 2024 के बाद से ‘वोट चोरी’ वाले चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वाले चुनाव आयोग के सभी अधिकारी भी इसके लिए जिम्मेदार हैं. इनमें हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार और बंगाल के विधानसभा चुनाव शामिल हैं.
विपक्ष तब तक प्रदर्शन नहीं रोकेगा, जब तक नए चुनाव आयोग का गठन नहीं हो जाता और ज्ञानेश कुमार को पद से हटा नहीं दिया जाता.
मोदी सरकार ने जवाब देने के लिए वही पुराना तरीका अपनाया है. प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों को बदनाम करो, जोर-जोर से उन्हें बुरा-भला कहो, उनके इरादों पर सवाल उठाओ और यह कहो कि कोई और उनके पीछे से सब कुछ चला रहा है, लेकिन अब पुराने आरोप वैसे ही लगने लगे हैं, जैसे वे असल में हैं—घिसे-पिटे तरीके, पुराने आरोप और बार-बार दोहराई जाने वाली बेकार बातें. सरकार इन्हें इसलिए दोहरा रही है, क्योंकि उसके पास लोगों को समझाने के लिए कोई ठोस जवाब नहीं बचा है. मोदी सरकार के पास अब न विश्वसनीयता बची है, न नए विचार, न तर्क और न ही अच्छी नीतियां.
वे सवाल जिनसे मोदी सरकार बच नहीं सकती
पहले उस आरोप को देखिए कि विपक्ष कथित तौर पर घुसपैठियों को बचा रहा है. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को मतदाता सूची से घुसपैठियों के नाम हटाने का तरीका बताया गया है, लेकिन घुसपैठिए हैं कहां? SIR में वास्तव में कितने विदेशी नागरिकों की पहचान की गई? मतदाता सूची से 13.39 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा बताया गया है. इसमें तीन चरणों में शुरुआती सूची से हटाए गए नाम भी शामिल हैं. इनमें ऐसे लोग भी हैं, जिनकी मौत हो गई, जो दूसरी जगह चले गए या जिनके नाम एक से ज्यादा बार दर्ज थे.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है: हटाए गए लोगों में से कितने लोगों की पहचान सरकार ने घुसपैठियों के रूप में की है? सरकार आंकड़े क्यों नहीं दे रही है? सूचना के अधिकार (RTI) के तहत पूछे गए सवालों और संसद में उठाए गए सवालों के जवाब नहीं दिए गए हैं. इसके बजाय, असली नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं. बंगाल में जिन मतदाताओं की अपीलों पर सुनवाई हुई है, उनमें से 93 प्रतिशत के नाम मतदाता सूची में फिर से जोड़ दिए गए हैं. लाखों लोगों के नाम अब भी हटे हुए हैं. उनकी अपीलों पर अभी सुनवाई तक नहीं हुई है.
अगर मोदी सरकार के पास ‘घुसपैठियों’ के सबूत हैं, तो उसे उन्हें सार्वजनिक करना चाहिए. अगर उसके पास कोई आंकड़ा है, तो उसे सामने रखना चाहिए. किसी गंभीर आरोप या राजनीति के लिए लगाए गए खोखले नारे से ठोस आंकड़ों पर आधारित साफ जवाब की जगह नहीं ली जा सकती.
इसके बाद मोदी सरकार का दावा आता है कि प्रदर्शनों के लिए विदेश से पैसा मिल रहा है. इसका सबूत कहां है? ‘विदेशी हाथ’ का आरोप राजनीति में बहुत पुराना तरीका है. इंदिरा गांधी ने 1970 के दशक में भी इसका सहारा लिया था. इसके बाद भी जब-जब सरकारें दबाव में आईं, उन्होंने यही तरीका अपनाया. किसी आरोप को बार-बार दोहराने से वह सच नहीं हो जाता. इससे एक और सवाल उठता है: जवाब मांगने वाले नागरिकों को किसी अनजान ताकत का एजेंट क्यों बताया जाता है? अगर किसी प्रदर्शन के लिए पैसा दिया जा रहा है, तो कृपया सबूत दिखाइए. लोगों को गालियां देने और मीडिया के जरिए उनके खिलाफ अभियान चलाने का सहारा मत लीजिए. मोदी समर्थक मीडिया ऐसे आरोपों को खूब बढ़ावा देता रहा है, लेकिन अब यह तरीका काम नहीं कर रहा है.
शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को ‘अराजकतावादी’ कहा जा रहा है, लेकिन अव्यवस्था कौन फैला रहा है? वह नागरिक जो शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने आता है या वे अधिकारी जो सार्वजनिक जगहों पर बैरिकेड लगाते हैं, मेट्रो स्टेशन बंद करते हैं और उन जगहों पर रोक लगाते हैं जहां लोग इकट्ठा हो सकते हैं?
मोदी सरकार ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया है. जंतर-मंतर हमेशा से शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की जगह रहा है. इसके कारण प्रदर्शन सड़कों पर होने लगे हैं. तो क्या मोदी सरकार खुद अराजकता नहीं फैला रही है? जब हिंदुत्ववादी समूहों के लोग लोगों को पीटते हैं या डराते-धमकाते हैं, तो क्या हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि कानून का राज कौन कमजोर कर रहा है? असली अराजकतावादी कौन हैं—शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी या वह सरकार जो लोगों को परेशान करने के लिए रोजमर्रा की सुविधाएं बंद कर देती है?
इसके बाद वह आरोप आता है, जिसे सबसे पहले मोदी ने लोकप्रिय बनाया था—‘दिमागी नक्सल’. इस शब्द का इस्तेमाल असहमति जताने वालों को खतरनाक दिखाने के लिए किया जाता है, लेकिन देखिए, प्रदर्शन करने कौन आ रहा है. युवा, छात्र, प्रोफेसर, फिल्म अभिनेता, डॉक्टर, माता-पिता, अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े नागरिक, जानी-मानी हस्तियां और ऐसे लोग भी, जो शायद पहले कभी किसी प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए.
ये लोग मोदी की उस सुविधाजनक तस्वीर में फिट नहीं बैठते, जिसमें प्रदर्शन करने वालों को कुछ पेशेवर आंदोलनकारियों का छोटा-सा समूह बताया जाता है. प्रदर्शन का दायरा इसलिए बढ़ा है क्योंकि लोगों की चिंताएं भी बढ़ी हैं. इनमें नौकरी, शिक्षा, नागरिक अधिकार और वोट देने का अधिकार शामिल हैं.
बीजेपी का दावा है कि विपक्ष बंटा हुआ है. यह पूरी तरह गलत है. भारत के चुनावों और मतदाता सूचियों की रक्षा करने और देश के लोकतंत्र को बचाने के मुद्दे पर विपक्षी दल पहले से कहीं ज्यादा एकजुट हुए हैं. हम पूरी तरह एक साथ हैं. यह एकजुटता खास है, क्योंकि चिंता किसी एक पार्टी से बड़ी है. सवाल यह है कि क्या नागरिक उस प्रक्रिया पर भरोसा कर सकते हैं, जिसके जरिए उनके नाम मतदाता सूची में बने रहते हैं या हटा दिए जाते हैं.
बीजेपी की मीडिया मशीन राहुल गांधी का मज़ाक उड़ाने के लिए पुराने अपमानजनक नाम ‘पप्पू’ का इस्तेमाल करती है, लेकिन घिसे-पिटे आरोप असली राजनीतिक बदलाव और किसी व्यक्ति के विकास को मिटा नहीं सकते. आज के राहुल गांधी को हराना आसान नहीं है. वह संघर्ष से मजबूत हुए ऐसे नेता हैं, जो सड़कों पर लड़ते हैं, पैदल चलते हैं, लोगों की बातें सुनते हैं, प्रदर्शन करते हैं और सीधे सरकार को चुनौती देते हैं.
उन्हें 12 साल से सत्ता का स्वाद नहीं मिला है. इसके बजाय, वह साल-दर-साल सड़कों पर उतरकर सत्ता से लड़ते रहे हैं. ‘पप्पू’ जैसा पुराना और घिसा-पिटा नाम अब उस असाधारण राजनीतिक नेता की पहचान नहीं बता सकता, जो आज हमारे सामने है.
मोदी के समर्थकों और बीजेपी के लोगों ने ‘सत्ता परिवर्तन’ यानी ‘रेजीम चेंज’ शब्द को ऐसे पकड़ लिया है, जैसे यह देश के लिए कोई खतरा हो. ऐसा नहीं है. लोकतंत्र में हर विपक्षी पार्टी चुनाव के जरिए सरकार बदलना और अपनी नीतियां व कार्यक्रम लागू करना चाहती है. विपक्ष होने का मतलब ही यही है.
‘सत्ता परिवर्तन’ को कोई खतरनाक शब्द बताना सिर्फ शब्दों का खेल है. यह सोशल मीडिया पर लोगों को भड़काने और गुस्सा दिखाने का तरीका है, कोई ठोस तर्क नहीं.
पुराने आरोप अब काम नहीं करेंगे
तो विपक्ष को बदनाम करने की कोशिश इस बार नाकाम क्यों हो रही है? क्योंकि लोग अब सरकार के इस पुराने तरीके को पहचानने लगे हैं. नागरिक पहले भी ‘विदेशी हाथ’ के आरोप सुन चुके हैं. उन्होंने प्रदर्शनकारियों को ‘राष्ट्र विरोधी’, ‘अराजकतावादी’ और ‘विदेश से पैसा पाने वाला’ कहते हुए देखा है. वे जानते हैं कि किसी को कोई नाम दे देने से असली सवालों के जवाब नहीं मिल जाते. बार-बार चिल्लाकर दूसरों पर आरोप लगाने का तरीका अब पुराना पड़ चुका है. अब इन बातों का लोगों पर कोई असर नहीं हो रहा है.
आज प्रदर्शन किसी एक पार्टी, एक नेता या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं. गिरफ्तारियों और पाबंदियों के बावजूद युवा आंदोलन को लोगों का समर्थन मिल रहा है, जबकि विपक्षी नेता एक साथ मार्च निकाल रहे हैं. इस बार प्रदर्शनों का दायरा इतना बड़ा है कि उसके सामने मोदी सरकार छोटी पड़ गई है. सरकार के सामने विरोध का एक बड़ा सैलाब खड़ा है.
सरकार हमें कुछ भी कह सकती है. वह पुराने तरीके अपनाकर गाली दे सकती है और अपमानजनक नामों से बुला सकती है. लेकिन इससे असली सवाल खत्म नहीं हो सकते. कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए और क्यों? उनमें से कितने लोगों को वास्तव में विदेशी नागरिक पाया गया? जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए, उनके लिए क्या सुरक्षा उपाय हैं? विदेश से पैसा मिलने के आरोपों के समर्थन में क्या सबूत हैं?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक गाली देने और लोगों की गलत तस्वीर पेश करने की कोशिशें बेअसर होती रहेंगी. विपक्ष सड़कों पर है, नागरिक सवाल पूछ रहे हैं और मोदी सरकार के पुराने घिसे-पिटे आरोप अब काफी नहीं हैं. इस बार विपक्ष को बदनाम करने की कोशिशें—चाहे राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जाए या प्रदर्शन कर रहे आम नागरिकों को—काम नहीं कर रही हैं.
खिका अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सांसद (राज्यसभा) हैं. उनका एक्स हैंडल @sagarikaghose है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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