कोलकाता: 17 साल की तानिया बिस्वास, बरनाली हलदर और श्रेया हलदर अपने दम पर शहर घूमना चाहती थीं. दुर्गा पूजा का टाइम इसके लिए बिल्कुल सही था. इस दौरान कोलकाता पंडालों में घूमने, सड़कों पर रोशनी और तरह-तरह के पकवानों से जगमगा उठता है, लेकिन परिवार के बिना उनकी पहली सैर चोरबागान में एक दुखद हादसे के साथ खत्म हुई.
बरनाली की मौके पर ही मौत हो गई, लेकिन तानिया की सांसें चल रही थीं. श्रेया ने अपनी आंखों के सामने यह हादसा होते देखा. उन्होंने अपनी सहेलियों को बचाने की कोशिश की, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकीं.
तानिया की मां बबिता बिस्वास ने कहा, “यह पहली बार था, जब मेरी बेटी मेरे बिना पंडाल देखने गई थी. इससे पहले मैं हर जगह उसके साथ जाती थी. यहां तक कि उसकी ट्यूशन की क्लास के बाहर भी इंतज़ार करती थी, लेकिन मुझे लगा कि वह बड़ी हो रही है और उसे भी अपनी मर्जी से घूमने-फिरने का मौका मिलना चाहिए.”
तानिया के पिता बिस्वजीत बिस्वास ने बेटी की मौत के लिए भीड़ को ठीक से संभालने में लापरवाही और पुलिस के ढीले रवैये को जिम्मेदार ठहराया.
बिस्वजीत ने कहा, “पहले भी छोटी-मोटी घटनाएं हुई हैं, लेकिन कभी किसी की मौत नहीं हुई. ऐसा पहली बार हुआ है. हमें बताया गया कि भगदड़ में फंसे लोगों की मदद करने के बजाय पुलिसकर्मी अपने फोन देखने में व्यस्त थे.”

चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में भगदड़ के दौरान मारे गए 19 लोगों में से 13 महिलाएं थीं. इनमें किशोरियां और बच्चे भी शामिल थे. शनिवार शाम उत्तर कोलकाता के इस मशहूर दुर्गा पूजा पंडाल में यह हादसा हुआ. बाहर निकलने के लिए बनी संकरी गली में अचानक भीड़ बढ़ गई. इसके साथ ही तेज़ बारिश, भीड़ को ठीक से नहीं संभाल पाने और आयोजकों की ओर से की गई एक घोषणा के कारण हालात बिगड़ गए और कई लोगों की जान चली गई. मृतकों और दो दर्जन से ज्यादा घायलों को कलकत्ता मेडिकल कॉलेज (CMC) ले जाया गया.
पश्चिम बंगाल सरकार ने मृतकों के परिवारों को 25-25 लाख रुपये का मुआवजा देने का ऐलान किया है. वहीं, प्रधानमंत्री ने प्रत्येक मृतक के परिवार को 2 लाख रुपये देने की घोषणा की है.
इस घटना के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर भी सवाल उठे हैं. पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 15 साल के शासन को खत्म कर पहली बार पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाली है.
हादसे के एक दिन बाद कोलकाता के उन प्रमुख पूजा पंडालों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई गई, जहां बड़ी संख्या में लोगों के आने की आशंका है. समिति ने तीन पूजा समितियों-बालीगंज कल्चरल, चेतला अग्रणी और त्रिधारा सम्मिलनी- को नोटिस जारी किए. इनमें एलपीजी सिलेंडर रखे होने, हवा आने-जाने की ठीक व्यवस्था न होने और पर्याप्त रोशनी नहीं होने की बात उठाई गई. इन कमियों से सुरक्षा को खतरा हो सकता है और भीड़ बढ़ने के साथ अफरा-तफरी मच सकती है.
लेकिन इन कदमों से न तो बीते समय को वापस लाया जा सकता है और न ही चोरबागान की इस त्रासदी से बिखरी ज़िंदगी को फिर से जोड़ा जा सकता है.
‘उसकी सांसें चल रही थीं’
तानिया और बरनाली बचपन की पक्की सहेलियां थीं. दोनों एक ही स्कूल और ट्यूशन क्लास में जाती थीं. अक्सर छुट्टियों के दिन एक-दूसरे के घर पर बिताती थीं.
बाहर निकलने वाले गेट पर बरनाली ज़मीन पर गिर गईं और भीड़ ने उन्हें कुचल दिया. मौके पर ही उनकी मौत हो गई, लेकिन तानिया की सांसें अभी चल रही थीं. हालांकि, बहुत हल्की थीं. उनकी सहेली श्रेया ने उन्हें होश में लाने के लिए सीपीआर दिया और छाती को दबाकर सांसें लौटाने की कोशिश की. श्रेया तानिया के साथ कलकत्ता मेडिकल कॉलेज (CMC) भी गई, जहां उन्हें इलाज के लिए ले जाया गया, लेकिन परिवारों का आरोप है कि इलाज मिलने में हुई देरी उनकी मौत की वजह बनी.
तानिया की मां बाबिता ने दिप्रिंट को बताया, “अगर डॉक्टरों ने समय पर उसका इलाज किया होता, तो मेरी बेटी आज जिंदा होती. उसकी सहेलियां कहती हैं कि उसकी सांसें चल रही थीं.”

श्रेया ने तानिया के पिता बिस्वजीत को फोन किया. इसी फोन से परिवार को पता चला कि उनके साथ क्या हुआ था. इसके बाद अस्पताल में जो कुछ हुआ, उसने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया. खासकर तानिया की मां इस घटना से बुरी तरह टूट गई हैं.
कार चलाने वाले बिस्वजीत को घटनास्थल पर पहुंचने में देर हो गई. वहीं, तानिया की मां बबिता पहले ही अस्पताल पहुंच चुकी थीं. वहां वह सफेद कपड़ों से ढके शवों की कतार के पास चल रही थीं. वह एक-एक करके कपड़ा हटातीं और देखतीं कि कहीं वह उनकी बेटी तो नहीं है.
हर बार जब पता चलता कि शव किसी और का है, तो वह राहत की सांस लेतीं. उन्हें उम्मीद थी कि शायद तानिया अभी ज़िंदा हो.
बबिता ने कहा, “इसके बाद पुलिस ने मुझे फोन किया और मृतकों की तस्वीरें देखने को कहा. वहीं मैंने अपनी बेटी को पहचाना. फिर वे मुझे अस्पताल परिसर के अंदर एक दूसरे शवगृह में ले गए, जहां मेरी बेटी का शव रखा था.”
अब बिस्वास परिवार के अधूरे बने घर में, जहां सीमेंट की दीवारें खुली हैं और कमरे खाली हैं, एक मेज पर दो तस्वीरें रखी हैं. एक तस्वीर तानिया की है और दूसरी में तानिया और बरनाली साथ हैं.

बबिता रोते हुए कहती हैं, “मैं खुद को दोष देती हूं कि मैंने पहली बार अपनी बेटी को अकेले जाने दिया. अगर मैं उसके साथ गई होती, तो उसे बचा लेती.” वह फूट-फूटकर रोने लगती हैं. “पहली बार वह मेरे बिना गई थी और हमेशा के लिए मुझे छोड़कर चली गई.”
‘कोशिश की, लेकिन अपनी सहेलियों को नहीं बचा सकी’
श्रेया बहुत कम बोलती है. वह खाना नहीं खाती और पिछले तीन दिनों से एक पल भी नहीं सोई. वह बार-बार एक ही बात दोहराती हैं और हर बार रोने लगती हैं. “मैंने कोशिश की, लेकिन अपनी सहेलियों को नहीं बचा सकी.”
भगदड़ के दौरान श्रेया भी ज़मीन पर गिर गई थीं, लेकिन रेलिंग का सहारा लेकर वह किसी तरह खड़ी हो गईं. उनके नाखून टूट गए थे और पैर में चोट लगी थी.
खड़े होने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपनी सहेलियों को ढूंढना शुरू किया.
श्रेया की मां ने कहा, “मेरी बेटी ने मुझे बताया कि बरनाली की मौके पर ही मौत हो गई थी. उसकी गाल की हड्डियां टूट गई थीं और चेहरा बिगड़ गया था, लेकिन तानिया की सांसें चल रही थीं.”
उन्होंने आगे कहा, “मेरी बेटी ने बताया कि पंडाल की थीम की वजह से वहां रोशनी कम थी. इसके बाद जब यह घोषणा की गई कि पंडाल गिर सकता है, तो अफरा-तफरी मच गई.”

श्रेया की मां ने उन्हें रिश्तेदारों के पास रहने भेज दिया है, ताकि वह उस मोहल्ले से दूर रह सके जहां वह तानिया और बरनाली के साथ शाम को टहलने जाती थी. तीनों सहेलियां लगभग हर दिन वहां साथ समय बिताती थीं. अब मोहल्ले में हर तरफ भगदड़ और दोनों लड़कियों की मौत की चर्चा हो रही है.
श्रेया की मां ने उनका फोन भी अपने पास रख लिया है. उनका कहना है कि श्रेया बार-बार उन तस्वीरों और वीडियो को देखती रहती है, जिन्हें तीनों ने साथ बिताए सालों के दौरान रिकॉर्ड किया था.
मां ने कहा, “मेरी बेटी इस घटना से गहरे सदमे में है. चोटों के इलाज के लिए भी हम उसे डॉक्टर के पास ले गए थे. भगदड़ के बाद से वह लंगड़ाकर चल रही है. डॉक्टर ने उसे सोने में मदद के लिए नींद की गोलियां भी दी हैं.” यह बताते हुए उनकी आंखों में आंसू भर आए.
मोहल्ले की छोटी-सी दुकान पर लोगों की बातचीत बार-बार इस बात पर लौट आती है कि जमीन पर गिरने के बावजूद श्रेया चमत्कारिक तरीके से भगदड़ से कैसे बच गई. हर कोई इस त्रासदी को समझने की कोशिश कर रहा है. कुछ लोग इसे मां दुर्गा का बुलावा कहते हैं, तो कुछ इसे बदकिस्मती मानते हैं. हर कोई इस नुकसान को समझने का अपना तरीका ढूंढ रहा है. इस घटना ने पूरे मोहल्ले को हिलाकर रख दिया है.
एक संकरी गली के आखिर में बनी छोटी-सी झोपड़ी, जहां से बरनाली हलदर का घर जाने का रास्ता है, पर ताला लगा है. पड़ोसियों का कहना है कि परिवार उसकी अस्थियां गंगा में विसर्जित करने गया है.

बाबिता बार-बार अपनी बेटी के फोन को देखती हैं. भगदड़ से पहले तानिया ने एक वीडियो बनाया था. इसमें वह भीड़ भरे पंडाल से गुजरते हुए अपनी सहेलियों के साथ जीत का निशान दिखा रही थीं. तभी अचानक फोन गिर जाता है और स्क्रीन काली हो जाती है. इसके बाद सिर्फ शोर सुनाई देता है.
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