राजनीति में एक अजीब बात देखने को मिलती है. कोई राजनीतिक दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को गाली देकर निशाना बनाता है, लेकिन अपने राजनीतिक फायदे के लिए कुछ लोगों के नाम हटाने या कुछ लोगों को बाहर रखने का समर्थन भी करता है.
हालांकि, यहां एक सीधी-सी बात पर ध्यान देना ज़रूरी है. मतदाता सूची तैयार करने या चुनाव कराने की कोई भी सफल प्रक्रिया सिर्फ निर्वाचन आयोग के अपने दम पर नहीं चलती. इसकी वजह यह है कि निर्वाचन आयोग राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से दिए गए कर्मचारियों पर निर्भर करता है. साथ ही, प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए राजनीतिक दलों की सक्रिय और सकारात्मक भागीदारी भी जरूरी है.
इस मामले में दो अलग-अलग कहानियां हैं. एक अब पंजाब की और दूसरी पहले पश्चिम बंगाल की. पंजाब में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं. वहां चार पार्टियां—आम आदमी पार्टी (आप), कांग्रेस, बीजेपी और अकाली दल—या तो सत्ता में बने रहने, मौजूदा सरकार को हटाने या 2022 के मुकाबले अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं.
लेकिन जहां सभी विपक्षी दल एसआईआर की कमियों को लेकर निर्वाचन आयोग को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब की चारों बड़ी पार्टियों ने राज्य में एसआईआर की प्रक्रिया को पूरा करने के तरीके की तारीफ की. उन्होंने राज्य की मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनिंदिता मित्रा की भी तारीफ की. वह सभी पार्टियों की शिकायतें और परेशानियां सुनने के लिए उपलब्ध रहीं. कम से कम इस राज्य में निर्वाचन आयोग के खाते में एक सफलता तो दर्ज हुई.
अब सुनिए कि राजनीतिक दलों ने खुद क्या सही किया. इससे मेरी यह बात साबित होती है कि एसआईआर की प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में आप के प्रवक्ता फेरी सोफत के हवाले से कहा गया है कि बड़ी पार्टियों के 90,000 बूथ स्तर के एजेंटों (बीएलए) ने एसआईआर की प्रक्रिया में हिस्सा लिया और इसे सफल बनाने में मदद की.
उन्होंने यह भी कहा कि पंजाब सरकार ने निर्वाचन आयोग की ओर से नियुक्त बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) को उनके दूसरे सरकारी कामों से राहत दी, ताकि वे एसआईआर और मतदाता सूची में बदलाव के काम पर ध्यान दे सकें.
अब इसकी तुलना पश्चिम बंगाल में हुई घटनाओं से कीजिए. पहले दिन से ही मुख्यमंत्री का निर्वाचन आयोग और एसआईआर का काम करने के लिए नियुक्त राज्य के अधिकारियों के साथ टकराव चल रहा था. उन्होंने एसआईआर की प्रक्रिया को सफल बनाने में न सिर्फ प्रशासनिक और कानूनी रुकावटें खड़ी कीं, बल्कि बार-बार निर्वाचन आयोग के अधिकारियों और एसआईआर का काम कर रहे राज्य के अधिकारियों को धमकी देकर इस प्रक्रिया को पटरी से उतारने की भी कोशिश की.
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने ऐसे कई खास उदाहरण दिए, जब ममता बनर्जी ने ‘भड़काऊ भाषण’ दिए और लोगों से कानून अपने हाथ में लेने को कहा. उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं के समूह अक्सर चुनाव अधिकारियों को घेर लेते थे, ताकि वे अपना काम न कर सकें. इस दौरान वे राजनीतिक नारे भी लगाते थे. इससे चुनाव अधिकारियों पर “अनुचित दबाव” पड़ रहा था.
91 पन्नों के हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने आरोप लगाया कि स्थानीय पुलिस बूथ स्तर के अधिकारियों (बीएलओ) की शिकायतें दर्ज करने से इनकार कर रही थी. कई बार शिकायतें दर्ज कराने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को दखल देना पड़ता था. 24 नवंबर 2024 को कोलकाता में मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय को घेर लिया गया था. प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के बैरिकेड तोड़कर जबरन कार्यालय में घुसने की कोशिश की. उन्होंने कार्यालय में तोड़फोड़ की और अधिकारियों की आवाजाही पर रोक लगा दी.
जबरन कार्यालय में घुसने की इस घटना के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय को मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय को वाई श्रेणी की सुरक्षा देनी पड़ी. पूरे देश में इस स्तर की सुरक्षा पाने वाला यह एकमात्र ऐसा कार्यालय था.
सीधी-सी बात यह है कि अगर पश्चिम बंगाल में एसआईआर एक बड़ा विवाद बन गया, तो इसकी मुख्य जिम्मेदारी सिर्फ ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के आक्रामक कार्यकर्ताओं पर ही डाली जानी चाहिए.
अब हमें पता है कि एसआईआर की प्रक्रिया का तृणमूल कांग्रेस की ओर से हिंसक विरोध शायद इसलिए किया गया, ताकि हजारों ऐसे लोगों को बचाया जा सके जो भारत के नागरिक नहीं थे, खासकर अल्पसंख्यक समुदायों के लोग. ये लोग सत्ताधारी पार्टी के लिए भरोसेमंद वोट बैंक थे. दरअसल, मतदाता सूची में ऐसे लोगों के नाम बड़े पैमाने पर जोड़े गए, जो मतदाता बनने के योग्य नहीं थे. इसे नजरअंदाज करना संभव नहीं था.
निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची में ‘तार्किक गड़बड़ियों’ की ओर ध्यान दिलाया था. आयोग के मुताबिक, आसनसोल के एक विधानसभा क्षेत्र बाराबनी में एक व्यक्ति के कथित तौर पर 389 बच्चे थे और इन सभी के नाम 2025 की मतदाता सूची में शामिल थे. बच्चे पैदा करने की इस क्षमता को देखकर महाभारत के धृतराष्ट्र को भी शर्म आ जाए, जिनके नाम सबसे ज्यादा संतान होने का रिकॉर्ड था.
लेकिन यह व्यक्ति कोई अकेला मामला नहीं था. बाली में आसनसोल वाले व्यक्ति के बाद दूसरे स्थान पर रहे एक व्यक्ति के 310 बच्चे मतदाता बन गए थे. वहीं, सात अन्य लोगों ने भी 100 या उससे ज्यादा बच्चों के होने की जानकारी दी. यानी वे भी धृतराष्ट्र के बराबर या उनसे आगे निकल गए. दस अन्य लोगों के 50 से ज्यादा बच्चे थे, जिनके नाम मतदाता सूची में शामिल थे. दस और माता-पिता के 40-40 बच्चे थे. चौदह लोगों के 30 या उससे ज्यादा बच्चे थे. पचास लोगों की 20 से ज्यादा संतानें थीं. इसके अलावा, हैरान करने वाली बात यह थी कि 8,682 मतदाताओं ने 10-10 बच्चों के होने की जानकारी दी. ऐसा लगता है कि कुछ परिवारों में बच्चे किसी कारखाने की तरह लगातार पैदा हो रहे थे.
अब इन इंसानों जैसी न लगने वाली प्रजनन क्षमताओं की तुलना पश्चिम बंगाल की घटती कुल प्रजनन दर (टीएफआर) से कीजिए. राज्य में यह दर 1.4 है, जो जनसंख्या को एक ही स्तर पर बनाए रखने के लिए जरूरी 2.1 की दर से काफी कम है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मतदाताओं की संख्या जनसंख्या से जुड़े रुझानों के मुकाबले इतनी ज्यादा बढ़ सकती है?
प्रोफेसर विधु शेखर और मिलन कुमार के एक अध्ययन, जिसका शीर्षक *पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में बढ़ोतरी: वैध मतदाताओं की संख्या का जनसांख्यिकीय आकलन* है, के मुताबिक राज्य में 1.04 करोड़ (1 करोड़ 4 लाख) ऐसे अतिरिक्त मतदाता थे, जिनकी संख्या जनसंख्या से जुड़े रुझानों से मेल नहीं खाती थी. यह संभव है कि इनमें से कुछ अतिरिक्त मतदाता दूसरे राज्यों और बांग्लादेश से आकर यहां बसे हों.
यह साफ है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर की जरूरत उन दूसरे राज्यों के मुकाबले कहीं ज्यादा थी, जहां जनसंख्या से जुड़े रुझान कुछ हद तक ऐसे ही हैं.
लेकिन यहां एक और बात पर जोर देना जरूरी है. पश्चिम बंगाल में भी एसआईआर के बेहतर नतीजे आ सकते थे, अगर ममता बनर्जी की सरकार ने इस प्रक्रिया में रुकावट डालने के बजाय इसका समर्थन किया होता.
पंजाब और इससे पहले तमिलनाडु और केरल में एसआईआर की प्रक्रिया पटरी से नहीं उतरी, क्योंकि वहां की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने निर्वाचन आयोग को ठीक-ठाक काम करने में मदद करने का फैसला किया. केरल में हारने वाले एलडीएफ ने कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या असामान्य रूप से बढ़ने या घटने को लेकर सवाल उठाए हैं. लेकिन मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने एसआईआर में किसी गड़बड़ी की बात से इनकार किया. उन्होंने कहा कि उन्होंने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के साथ कई बार बातचीत की, ताकि किसी भी असली मतदाता का नाम सूची से न हटे. हालांकि, राज्य विधानसभा ने हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया.
समस्या तब होती है, जब राजनीतिक दल चुनाव हारने के बाद एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठाने लगते हैं, जैसा कि अब डीएमके कर रही है. बताया जाता है कि जिन कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम ज्यादा संख्या में हटाए गए, वहां अभिनेता जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) ने ज्यादा सीटें जीतीं. वहीं, जिन क्षेत्रों में कम नाम हटाए गए, वहां डीएमके का प्रदर्शन बेहतर रहा.
लेकिन अगर यह माना जाए कि डीएमके की बूथ स्तर के मतदाताओं पर पकड़ नई-नई बनी टीवीके के मुकाबले ज्यादा मजबूत थी, तो यह दलील सही नहीं भी हो सकती.
इससे हम पंजाब और पश्चिम बंगाल के बीच के अंतर पर पहुंचते हैं. पंजाब में आम आदमी पार्टी और उसकी तीन विरोधी पार्टियों ने बूथ स्तर पर अपने पास मौजूद जानकारी के जरिए निर्वाचन आयोग की मदद करने का फैसला किया. पश्चिम बंगाल में इसका उलटा हुआ. पंजाब में चुनाव हारने वाली पार्टी एसआईआर को लेकर शिकायत कर सकती है, लेकिन अगर सभी पार्टियां राज्य की मुख्य निर्वाचन अधिकारी की तारीफ कर रही थीं, तो चुनाव के बाद दी जाने वाली सफाई को सही नहीं माना जा सकता.
यहां यह समझना जरूरी है कि मतदाता सूची में बदलाव की किसी भी सफल प्रक्रिया के लिए राजनीतिक दल कितने जरूरी हैं. मतदाता सूची में सामान्य बदलाव और विशेष बदलाव, दोनों ही अलग-अलग राज्यों में निर्वाचन आयोग की ओर से नियुक्त अधिकारी करते हैं. लेकिन राजनीतिक दलों के पास बूथ स्तर पर मतदाताओं के बारे में काफी जानकारी होती है. वे गड़बड़ियों की जानकारी देकर या नए नाम जोड़ने की मांग करके इस प्रक्रिया में मदद करते हैं.
दो चुनावों के बीच राजनीतिक दल अक्सर मतदाताओं के घर जाकर फॉर्म 6 या फॉर्म 8 भरवाते हैं, ताकि नए मतदाताओं के नाम सूची में जुड़ सकें या जरूरी बदलाव किए जा सकें. इसके बाद वे ये फॉर्म बड़ी संख्या में निर्वाचन आयोग को सौंप देते हैं. जांच के बाद आयोग मतदाता पहचान पत्र जारी करता है.
बहुत कम मतदाता यह काम अपने दम पर करते हैं. इसी वजह से मतदाता सूची से मृत लोगों के नाम हटाने और एक जगह से दूसरी जगह जाने पर पुराने पते से नाम हटाने का काम हमेशा पूरी तरह सही तरीके से नहीं हो पाता. लोग आम तौर पर खुद आगे आकर अपना नाम हटाने की मांग नहीं करते. राजनीतिक दल भी ऐसा नहीं करते, क्योंकि उन्हें इस काम के बदले कोई फायदा नहीं मिलता. लेकिन नए मतदाताओं के नाम जुड़वाने में उनका समय लगाना फायदेमंद होता है, क्योंकि वे उन लोगों के नाम जुड़वाने में मदद करते हैं, जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वे उन्हें वोट देंगे.
पंजाब और पश्चिम बंगाल का अंतर हमें यह बताता है कि एसआईआर सफल हो सकता है, अगर राजनीतिक दल वह काम करें जिसमें वे सबसे ज्यादा माहिर हैं—बूथ स्तर पर मतदाताओं के नाम जुड़वाने में मदद करना. लेकिन तृणमूल कांग्रेस जैसी अड़ियल पार्टी हो, तो वह एसआईआर के काम को नुकसान भी पहुंचा सकती है.
आर. जगन्नाथन ‘स्वराज्य’ पत्रिका के संपादक और पूर्व संपादकीय निदेशक हैं. उनका एक्स हैंडल @TheJaggi हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
यह लेख लेखक के पर्सनल ब्लॉग से दोबारा पब्लिश किया गया है. ओरिजिनल लेख यहां पढ़ें.
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