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Saturday, 10 October, 2026
होममत-विमतज्ञानेश कुमार ने विपक्ष, छात्र नेताओं और सिविल सोसाइटी को एकजुट कर दिया, यह एक नए गठबंधन का उभार है

ज्ञानेश कुमार ने विपक्ष, छात्र नेताओं और सिविल सोसाइटी को एकजुट कर दिया, यह एक नए गठबंधन का उभार है

दिल्ली के बैरिकेड्स से लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क तक, ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज़ हो रहे हैं और राजनीतिक दल तथा छात्र संगठन इस मुद्दे पर एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं.

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नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी पुलिस की बैरिकेडिंग पर चढ़ गए और उन्होंने तिरंगा लहराया. कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भारतीय संविधान को अपने हाथों में उठाया हुआ था, जब पुलिसकर्मी उन्हें धक्का देते हुए पुलिस वैन के अंदर ले जा रहे थे. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा सड़क पर लेट गईं. उन्होंने अपने हाथों को सीने पर बांध लिया और अपनी जगह से हटने से इनकार कर दिया.

विपक्षी नेता आकाशवाणी भवन परिसर के पास एक पेड़ के नीचे कई घंटों तक बैठे रहे. इसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया. मुंबई में चचेरे भाई उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे अपने समर्थकों के साथ सड़कों पर उतरे. उनके समर्थकों के हाथों में सिर्फ तिरंगा था, पार्टी का झंडा या चुनाव चिह्न नहीं.

इन सभी की मांग एक ही थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया को रद्द किया जाए.

मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के सबसे लोकप्रिय नारों में से एक है, “ज्ञानेश, अब बहुत हो गया भाई!” यह नारा भी काफी अहम है. यह NEET विरोध प्रदर्शन के उस दौर की याद दिलाता है, जब प्रदर्शनकारी थकने लगे थे और माहौल में निराशा छाने लगी थी. उस समय ऐसी अफवाहें भी फैल रही थीं कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देने वाले हैं. तब बॉलीवुड स्टार सलमान खान ने प्रदर्शनकारियों से घर लौट जाने की अपील की थी.

सलमान खान की इस पोस्ट ने विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मीम बनाने वालों को सबसे ज्यादा मसाला दिया.

सलमान खान ने कहा था, “सोनम, अब बहुत हो गया भाई. इसे और मत बढ़ाओ.” इसके दो दिन बाद एक ऐसा घटनाक्रम हुआ, जिसने आंदोलन कर रहे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं को भी हैरान कर दिया. धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया.

मौजूदा विरोध प्रदर्शनों का नारा NEET आंदोलन के उस अनिश्चित दौर की याद दिलाता है और एक संदेश देता है. अगर प्रदर्शनकारी एक कैबिनेट मंत्री से इस्तीफा दिलवा सकते हैं, तो वे मुख्य चुनाव आयुक्त कुमार को भी पद से हटवा सकते हैं. NEET विरोध प्रदर्शन के दौरान लोगों ने अलग-अलग तरीके आजमाए थे और विरोध करने के अधिकार को लेकर बातचीत भी हुई थी. लेकिन इस बार आंदोलन ज्यादा व्यवस्थित नजर आ रहा है. ऐसा लगता है कि राजनीतिक नेताओं और छात्र नेताओं के बीच इस बात को लेकर होड़ लगी है कि कौन सबसे ज्यादा बैरिकेडिंग पर चढ़ता है या किसका पुलिस से सबसे ज्यादा सामना होता है. एक नया गठबंधन बन रहा है, जिसमें चुने हुए जनप्रतिनिधि, युवा संगठन और सिविल सोसाइटी के लोग एक साथ आ रहे हैं.

और इसीलिए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन दिप्रिंट का न्यूज़मेकर ऑफ़ दि वीक है.

खान चाचा से मोएट्स तक

NEET विरोध प्रदर्शन के दौरान ज्यादातर विपक्षी नेता, कार्यकर्ता और सिविल सोसाइटी से जुड़े लोग जुलाई में ही जंतर-मंतर पहुंचे थे. ऐसा तब हुआ, जब CJP ने 20 जून को तय प्रदर्शन स्थल पर लंबे समय तक धरना देने का ऐलान किया था और इसके कुछ दिन बाद ये लोग वहां पहुंचे.

NEET आंदोलन के दौरान राहुल गांधी का सबसे अहम प्रदर्शन भी 21 जुलाई को हुआ था. इससे एक दिन पहले 50,000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों ने नई दिल्ली के पूरे पुलिस जिले पर कब्जा कर लिया था. इसके जवाब में पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और कथित तौर पर पैलेट गन का भी इस्तेमाल किया. इसके बाद गांधी ने INDIA गठबंधन के अपने साथियों के साथ प्रधानमंत्री के आवास के बाहर प्रदर्शन किया था.

राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के जरिए अपनी “पप्पू” वाली छवि को पीछे छोड़ना शुरू किया था. अब मौजूदा विरोध प्रदर्शनों के साथ उनका यह सफर अपने चरम पर पहुंचता दिख रहा है. पिछले साल से ही वह अपने ‘वोट चोरी’ के आरोपों को आम लोगों के बीच बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. पिछले साल उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आरोप लगाया था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा सीट के एक हिस्से में वोटों की चोरी हुई थी.

हालांकि, पिछले महीने प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट ने चुनाव आयोग के खिलाफ पहले से बढ़ रहे अविश्वास को और मजबूत कर दिया. अब राहुल गांधी के साथ विपक्षी सांसद भी चल रहे हैं. उनकी मांगें भी पहले से ज्यादा स्पष्ट और सख्त हैं. वे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे, SIR को रद्द करने और वोटर लिस्ट में कथित हेरफेर की जांच की मांग कर रहे हैं.

पिछले कुछ दिनों से इन विरोध प्रदर्शनों के कारण दिल्ली के होटल-रेस्तरां कारोबार और पुलिस व्यवस्था का आपस में सीधा संबंध बन गया है. ऐसा लग रहा है कि विपक्षी सांसद खाने-पीने की जगहों की यात्रा पर निकले हैं, जहां खाने के साथ विरोध प्रदर्शन भी शामिल है. वे पेप्सिको के स्टिंग एनर्जी ड्रिंक की बोतल से अपनी प्यास बुझा रहे हैं और पेट भरकर खाना खा रहे हैं. इसके बाद अचानक सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करने पहुंच जाते हैं.

मंगलवार को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी, पार्टी कार्यकर्ताओं और विपक्ष के करीब 300 सांसदों के साथ अशोक रोड पर निर्वाचन सदन की ओर मार्च कर रहे थे. लेकिन उन्हें बीच रास्ते में ही रोक दिया गया. इसके बाद उन्होंने आकाशवाणी भवन के पास घेराव किया और करीब आठ घंटे तक एक पेड़ के नीचे बैठे रहे. आखिरकार उन्हें हिरासत में ले लिया गया.

बुधवार को विपक्षी नेता जनपथ में सागर रत्ना रेस्तरां के बाहर खड़ी तीन डीलक्स बसों में सवार हो गए. इससे ठीक पहले उन्होंने दोपहर का खाना खाया था, जो देखने में एक सामान्य लंच लग रहा था. इसके बाद उन्होंने ऐलान किया कि वे जंतर-मंतर जाएंगे. इमरान मसूद, दीपेंद्र हुड्डा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग समेत कई सांसदों ने अपनी बस के ऊपर खड़े होकर तिरंगा लहराया. इसके बाद पुलिस से टकराव हुआ. प्रियंका गांधी सड़क पर लेट गईं और कई अन्य नेताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें चोटें आई हैं. फिर पुलिसकर्मियों ने उन्हें जबरन पुलिस बसों में बैठा दिया.

गुरुवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी की अगुवाई में INDIA गठबंधन के सांसदों ने एक बार फिर दोपहर के खाने के लिए बैठक की. इस बार यह बैठक कनॉट प्लेस के मोएट्स रेस्तरां में हुई. इसके बाद वे राजघाट की ओर मार्च करने निकले.

हम सब साथ खड़े हैं

इस बीच, छात्र संगठन और सिविल सोसाइटी के समूह भी इन विरोध प्रदर्शनों में आगे बढ़कर हिस्सा ले रहे हैं. वे एक-दूसरे के साथ हाथ मिलाकर, सचमुच भी और विचारों के स्तर पर भी, आंदोलन चला रहे हैं. समाज के हर वर्ग में तेजी से आगे आने की भावना दिख रही है. सभी अपनी आवाज सुनाने और अपनी मांगें पूरी करवाने के लिए मिलकर लगातार प्रयास करना चाहते हैं.

26 सितंबर को नेहा बोरा, योगेंद्र यादव, सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, वकील प्रशांत भूषण और CPI(M) नेता दीपंकर भट्टाचार्य समेत करीब 60 लोगों को जंतर-मंतर के पास हिरासत में लिया गया था. 2 अक्टूबर को सैकड़ों छात्रों और कार्यकर्ताओं को एक बार फिर जंतर-मंतर की ओर मार्च करते समय हिरासत में लिया गया. इसी दौरान शुक्रवार को मुंबई के शिवाजी पार्क में हजारों लोग जमा हुए. वहां कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन किया.

3 अक्टूबर को AISA की नेहा बोरा ने राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल, राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण और RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज के साथ जंतर-मंतर तक मार्च निकाला. उस दिन भी भूषण, भारद्वाज और बोरा समेत 160 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. 4 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन जारी रहे. जंतर-मंतर पहुंचने की कोशिश कर रहे 500 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. मुंबई में शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की मांग को लेकर मार्च निकाला. इस मार्च में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार (NCP-SP) के नेता भी शामिल हुए.

इस बार अलग-अलग संगठनों और समूहों के बीच इस बात को लेकर आपसी भरोसा और समझ भी दिखाई दे रही है कि विरोध प्रदर्शन को आगे कैसे बढ़ाया जाए.

दरअसल, मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में नेहा बोरा ने साफ कहा कि “लोकतंत्र को बचाने की यह लड़ाई किसी पार्टी या छात्र संगठन के झंडे तक सीमित नहीं है.” वह 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अपील कर रही थीं. इस प्रदर्शन में कई अन्य छात्र संगठन और सिविल सोसाइटी के समूह भी शामिल होने वाले हैं.

उन्होंने सड़कों पर संघर्ष कर रहे राजनीतिक नेताओं की भी तारीफ की. उन्होंने कहा कि आम नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और जनता के असली प्रतिनिधि सड़कों पर उतर रहे हैं. उन्होंने कहा, “हम देखते हैं कि विपक्ष के नेता और INDIA गठबंधन की अलग-अलग पार्टियां लोकतंत्र की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर रही हैं.”

नेहा बोरा ने कहा, “वे साबित करते हैं कि लोकतंत्र को बचाने की इस लड़ाई में देश की सभी विपक्षी पार्टियां और आम लोग एक तरफ हैं, जबकि दूसरी तरफ सिर्फ चुनाव आयोग (ECI) और BJP हैं.”

(इस न्यूज़मेकर ऑफ़ दि वीक को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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