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Saturday, 10 October, 2026
होमइंडियन लिबरल्स मैटरसिर्फ वोट डालने से मजबूत नहीं होगा लोकतंत्र, जनता की भागीदारी भी जरूरी: लियोनेल फर्नांडिस

सिर्फ वोट डालने से मजबूत नहीं होगा लोकतंत्र, जनता की भागीदारी भी जरूरी: लियोनेल फर्नांडिस

लियोनेल फर्नांडिस ने मार्च 1998 में लिखा था कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जागरूकता, सामाजिक सरोकार, संवेदनशीलता, खुलापन, ईमानदारी और साहस जरूरी हैं.

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लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास तभी गहराई से जड़ें जमा सकता है, जब राजनीतिक व्यवस्था पूरी तरह खुली, पारदर्शी और जनता के प्रति जवाबदेह हो. ऐसी व्यवस्था को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आम लोगों को अपनी सुरक्षा, गरिमा और आजीविका सुरक्षित महसूस हो और हर चुनाव के बाद उनके जीवन की गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार दिखाई दे.

वास्तविक लोकतंत्र वही है जिसमें जनता की सक्रिय भागीदारी हो. सहभागी लोकतंत्र के बिना लोकतंत्र अपने अर्थ का विरोधाभास बन जाता है. हर सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वे पूरे समाज के हित में क्या उचित है, यह तय करने और लिए गए निर्णयों को लागू करने में सक्रिय भूमिका निभाएं. इसके बाद उन निर्णयों के परिणामों का मूल्यांकन किया जाए और जहां आवश्यक हो, वहां सुधारात्मक कदम उठाए जाएं. वास्तव में लोकतंत्र एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें आम नागरिकों की निरंतर भागीदारी आवश्यक है. लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र का अर्थ अब केवल समय-समय पर मतदान करने और फिर उसके परिणामों को स्वीकार करने तक सीमित रह गया है. लोकतंत्र एक ऐसी औपचारिक प्रक्रिया बन गया है, जो अंततः ऐसे परिणाम देती है जो, कम-से-कम कहें तो, निराशाजनक हैं तो आखिर गलती कहां हुई?

लोकतंत्र के मूल तत्व

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि एक जीवंत लोकतंत्र कुछ ऐसे महत्वपूर्ण आधारों पर टिका होता है, जिन्हें हम अक्सर स्वाभाविक मान लेते हैं. इनमें पहला है सजगता. जब तक लोग लगातार सतर्क नहीं रहेंगे और अपने अधिकारों व जिम्मेदारियों, सामने मौजूद सार्वजनिक मुद्दों तथा अपने नेताओं और प्रतिनिधियों की क्षमता और कार्यप्रणाली से पूरी तरह परिचित नहीं होंगे, तब तक उनके प्रतिनिधि आसानी से उन्हें अपने हित में इस्तेमाल कर सकते हैं.

दूसरा तत्व है सरोकार. इसका अर्थ है अपनी राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ाव और उसके सुख-दुःख में सहभागी होने की सच्ची भावना. कोई व्यक्ति अपने आसपास हो रही घटनाओं से पूरी तरह परिचित हो सकता है, फिर भी उनसे अलग, उदासीन और असंबद्ध रह सकता है. यदि बड़ी संख्या में लोग इस तरह व्यवस्था से विमुख हो जाएं, तो लोकतंत्र को विदा कहने का समय आ जाता है.

तीसरी आवश्यकता है संवेदनशीलता. इसका अर्थ है अपनी जागरूकता और सरोकार को परिस्थितियों के अनुसार ढालना—सामान्य बातों से आगे बढ़कर विशेष परिस्थितियों को समझना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने को तैयार रहना.

चौथी आवश्यकता है खुलापन, अपने से अलग सोच, भावनाओं और व्यवहार को स्वीकार करने की क्षमता. हम एक ऐसे बहुलतावादी समाज में रहते हैं जहां अलग-अलग जातीय और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोग साथ रहते हैं. लोकतंत्र की सफलता के लिए उन व्यवहारों के प्रति सहनशीलता और सम्मान आवश्यक है जो हमारे अपने व्यवहार से अलग हों.

पांचवां तत्व है ईमानदारी, हम जो सोचते हैं, कहते हैं और करते हैं, उनमें एकरूपता हो. हमारे विचार, शब्द और कार्य अलग-अलग न हों, क्योंकि दोहरे विचार, दोहरी भाषा और दोहरे आचरण से सहमति और एकजुटता कायम करना संभव नहीं होता.

छठी आवश्यकता है साहस—सार्वजनिक रूप से वही रुख अपनाने का साहस, जिन मूल्यों और सिद्धांतों की हम निजी जीवन में बात करते हैं. बहुत से लोग निजी तौर पर सिद्धांतों की बड़ी दृढ़ता से बात करते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनका पालन करने से बचते हैं. यह विरोधाभास लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है.

इन छह तत्वों की अनुपस्थिति या कमजोरी ही सहभागी लोकतंत्र के सामने मौजूद बाधाओं का कारण है. इसलिए आज भारतीय समाज की स्थिति पर विचार करना और उससे ऐसे सबक लेना आवश्यक है, जो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत कर सकें.

सजगता

पहली आवश्यकता, यानी सजगता या जागरूकता, से शुरुआत करें तो हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या हमारे लोग नागरिक के रूप में अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति पर्याप्त रूप से जागरूक हैं. दुर्भाग्य से इसका उत्तर काफी हद तक नकारात्मक है. सामान्य रूप से मानवाधिकारों और विशेष रूप से नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूकता अभी भी बहुत अस्पष्ट है. यही कारण है कि पुलिस, सुरक्षा बलों, स्वयंभू निगरानी समूहों, हिंसक भीड़, उग्रवादियों आदि द्वारा इन अधिकारों का उल्लंघन अक्सर और व्यापक रूप से होता है. जब इसका तुरंत और विश्वसनीय समाधान नहीं मिलता, तो लोगों में निराशा, अलगाव और व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ता है, जो लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए नुकसानदेह है.

जहां तक अपने नेताओं और प्रतिनिधियों की योग्यता और उनके प्रदर्शन के प्रति जनता की जागरूकता का सवाल है, यह देखकर राहत मिलती है कि चापलूसी भले ही पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन लोग अब सार्वजनिक अधिकारियों के भ्रष्टाचार और मनमानी को पहले की तुलना में कम सहन कर रहे हैं और उनसे अधिक जवाबदेही तथा बेहतर काम की खुले तौर पर मांग कर रहे हैं. आम आदमी भले ही अशिक्षित हो, लेकिन वह मूर्ख नहीं है. स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में बार-बार यह साबित हुआ है, जब नागरिकों ने अपनी स्वाभाविक समझ और विवेक का परिचय दिया है. लोकतंत्र के लिए यह एक अच्छा संकेत है और इसे लगातार प्रोत्साहित किया जाना चाहिए.

सरोकार और संवेदनशीलता

सरोकार और संवेदनशीलता की बात करें तो हमारे समाज के बड़े हिस्से में इनकी कमी दिखाई देती है. लोगों की निष्ठाएँ अक्सर भाषा, जाति और धर्म तक सीमित रहती हैं. व्यापक समाज के प्रति जुड़ाव की ऐसी नागरिक संस्कृति बहुत कम दिखाई देती है, जो संकीर्ण सामुदायिक सीमाओं से ऊपर उठ सके. इसलिए जब महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और अन्य कमजोर वर्गों के साथ अन्याय होता है, या राष्ट्रीय स्मारकों को नुकसान पहुंचाया जाता है, संसाधनों को बर्बाद किया जाता है, पर्यावरण को नष्ट किया जाता है या सार्वजनिक विश्वास का दुरुपयोग होता है, तब भी व्यापक आक्रोश दिखाई नहीं देता. राष्ट्र की एकता और समाज को कमजोर करने वाली सामाजिक बुराइयों के प्रति एक व्यापक उदासीनता दिखाई देती है. ऐसी कमजोर नींव पर सहभागी लोकतंत्र खड़ा नहीं किया जा सकता.

सभी स्तरों और सभी क्षेत्रों में एक व्यापक अभियान चलाने की आवश्यकता है. इसकी शुरुआत जमीनी स्तर पर लोगों को सामाजिक रूप से जागरूक करने वाले माध्यमों से हो और इसे उच्च स्तर के संस्थानों से जोड़ा जाए, ताकि अधिक से अधिक नागरिक सामाजिक न्याय और सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता के प्रति संवेदनशील बनें. इनके बिना सहभागी लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाता.

खुलापन

आज का भारत एक अत्यंत विविधतापूर्ण समाज है. इसलिए अलग-अलग विचारों और संगठनात्मक तरीकों के प्रति खुलापन स्वीकार और सहनशीलता की उस लोकतांत्रिक भावना को मजबूत करता है, जिसकी हमें आवश्यकता है. अधिकांश समय हमारे लोग विविधता में एकता कायम करना जानते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं, जब स्वार्थी हितों और बदले की भावना रखने वाले तत्वों के उकसावे में पूरे समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ हिंसक हो जाते हैं. ऐसी पुरानी और विनाशकारी प्रवृत्तियों से बचने के लिए व्यवस्था में पहले से सुरक्षा उपाय होने चाहिए. मानवीय संवेदना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त सामूहिक सोच विकसित करनी होगी. समाज को दिशा देने वाले सभी संस्थानों और माध्यमों के सामने यही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.

ईमानदारी

सहभागी लोकतंत्र के लिए ईमानदारी एक आवश्यक आधार है. इसके बावजूद, “सत्यमेव जयते” जैसे महान सिद्धांत हमारी उस भूमि में सार्वजनिक जीवन की ईमानदारी और शुचिता लगातार कम होती जा रही है, जो संस्कृति और मर्यादा की बात करती है.

सार्वजनिक पद को आम भलाई के लिए सौंपे गए विश्वास के रूप में देखने के बजाय, उसे निजी लाभ और सत्ता के बंटवारे के साधन के रूप में देखा जाने लगा है. सार्वजनिक नैतिकता केवल भाषणबाजी और अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ने की कोशिश तक सीमित होती जा रही है. चुनावी वादों और नीतिगत घोषणाओं की कोई विशेष विश्वसनीयता नहीं रह गई है. चूंकि, जनता की याददाश्त को सामान्यतः छोटी माना जाता है, इसलिए नेता कई बार अपने पुराने रुख से आसानी से पलट जाते हैं और उन्हें इसका कोई गंभीर परिणाम नहीं भुगतना पड़ता. ईमानदार लोगों को किनारे किया जाता है, जबकि बेईमान और सिद्धांतहीन लोग आगे बढ़ते रहते हैं. इसका परिणाम जनता की, जनता के लिए और जनता द्वारा चलने वाली सरकार का विकृत रूप है.

कहा जाता है कि ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है. हमारी शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ी कमी को दूर करना आवश्यक है—वह है मूल्य-शिक्षा का पर्याप्त अभाव. व्यक्तिगत, सामाजिक और पेशेवर नैतिकता की भावना बचपन से ही हर नागरिक में विकसित की जानी चाहिए. अन्यथा ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की आदतें गहराई से विकसित नहीं हो पाएंगी.

साहस

अंत में सहभागी लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में साहस को देखें. यह गुण पूरी तरह अनुपस्थित नहीं है, लेकिन पर्याप्त मात्रा में दिखाई नहीं देता और इसे बचपन से ही विकसित करने की आवश्यकता है. अनुशासन का अर्थ बिना सोचे-समझे किसी बात को मान लेना या किसी के सामने पूरी तरह झुक जाना नहीं होना चाहिए. पहल करने की क्षमता, रचनात्मक सोच, अपनी बात स्पष्ट रूप से कहने की स्वतंत्रता के साथ विवेक, अपने उद्देश्य पर दृढ़ रहना और जहां किसी दूसरे का श्रेय बनता हो, उसे श्रेय देना—साहस के ये सभी रूप विकसित किए जाने चाहिए.

ये गुण सहभागी लोकतंत्र को गहरा, मजबूत और समृद्ध बनाते हैं तथा चापलूसी और व्यक्तिपूजा की उस प्रवृत्ति को सीमित करते हैं, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए नुकसानदेह है. खुद पर हँस सकना, सत्ता या व्यवस्था के दिखावे को चुनौती दे सकना और अपनी गलतियों को स्वीकार करना भी नागरिक साहस के ऐसे रूप हैं, जो लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करते हैं.

लोकतंत्र का संरचनात्मक पक्ष

सहभागी लोकतंत्र के सामने ऊपर बताई गई बाधाएं मुख्यतः ‘मनोवैज्ञानिक क्षेत्र’ से जुड़ी हैं. लेकिन हमें ‘संरचनात्मक क्षेत्र’ की उन बाधाओं को भी पहचानना होगा, जिनके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों आयाम हैं. संरचनात्मक क्षेत्र में वे सामाजिक संरचनाएं और राजनीतिक संस्थाएं शामिल हैं, जो लोगों के सोचने, एक-दूसरे से संबंध रखने और सामान्य रूप से व्यवहार करने के तरीकों को आकार देती हैं. दोनों प्रकार की संरचनाओं का एक साथ आलोचनात्मक मूल्यांकन, सुधार और जहाँ आवश्यक हो, पुनर्गठन किया जाना चाहिए.

इसलिए सहभागी लोकतंत्र की बाधाओं को दूर करने के लिए मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में शैक्षिक प्रयास और संरचनात्मक क्षेत्र में सामाजिक-राजनीतिक कार्रवाई, दोनों का आपस में समन्वय आवश्यक है. सदियों से चली आ रही सामंती और औपनिवेशिक सामाजिक-मानसिक संरचनाओं को स्वतंत्रता के केवल आधी सदी में समाप्त नहीं किया जा सकता. केवल बाहरी साधनों—जैसे समय-समय पर होने वाले चुनाव, संसद में बहस, सरकारी प्रस्ताव, कानून और संवैधानिक संशोधन—के सहारे, बिना किसी निरंतर ‘आंतरिक परिवर्तन’ के, सहभागी लोकतंत्र स्थापित नहीं किया जा सकता. बाहरी ढाँचे को ही वास्तविक लोकतंत्र समझने की भूल नहीं करनी चाहिए.

हमारी कई सार्वजनिक संस्थाएं केवल औपचारिक और परंपरागत ढंग से काम कर रही हैं. वे अभिजात वर्ग या माफिया के हितों के अनुकूल हो सकती हैं, लेकिन आम जनता के हित में नहीं. आम आदमी सरकार की किसी भी शाखा—कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका—के साथ सहज महसूस नहीं करता, चाहे वह स्थानीय, राज्य या राष्ट्रीय स्तर की ही क्यों न हो. सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता भी अक्सर अपने हितों के नेटवर्क विकसित कर लेते हैं और आम आदमी को मजबूरी में आखिरी उपाय के रूप में उन्हीं की ओर जाना पड़ता है. इससे राजनीतिक व्यवस्था के प्रति निराशा पैदा होती है और शासकों तथा जनता के बीच दूरी बढ़ती जाती है. ऐसे वातावरण में सहभागी लोकतंत्र कैसे फल-फूल सकता है?

राजनीतिक सत्ता के रहस्य और आभा को समाप्त कर उसे व्यावहारिक और साधन के रूप में देखा जाना चाहिए. राजनीतिक नेताओं को उनकी वास्तविक भूमिका के अनुरूप देखा जाए, उन्हें जरूरत से अधिक बड़ा या महान बनाकर पेश न किया जाए. स्वैच्छिक क्षेत्र को मजबूत किया जाना चाहिए और सरकारी एजेंसियों तथा राजनीतिक दलों पर निर्भरता कम की जानी चाहिए. मीडिया को सार्वजनिक जीवन के हर पहलू पर नजर रखनी चाहिए और हर प्रकार की अनियमितता को लगातार उजागर करना चाहिए. राजनीतिक संघर्ष के शोर में जनता की रचनात्मक आलोचनात्मक आवाज दबनी नहीं चाहिए.

चुनाव से पहले और चुनाव के बाद मतदाताओं की समितियां होनी चाहिए, जो राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों और सत्ता में आने या विपक्ष में रहने के दौरान उनके प्रदर्शन की जांच करें तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के काम का लगातार ‘राजनीतिक ऑडिट’ करें. ऐसे कदम हमारे लोकतंत्र को फिर से जीवंत कर सकते हैं और उसे वास्तविक रूप से सहभागी तथा सशक्त बना सकते हैं.

अंततः, सहभागी लोकतंत्र को वास्तव में स्थापित करने के लिए दृष्टिकोण में बदलाव उतना ही आवश्यक है जितना संस्थागत सुधार.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “सहभागी लोकतंत्र की प्रासंगिकता” था और इसका प्रकाशन मूलरूप से मार्च 1998 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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