नई दिल्ली: नीतीश कुमार को ‘सुशासन बाबू’ के रूप में पहचान मिलने से बहुत पहले—या फिर राजनीतिक पाला बदलने के कारण आलोचकों द्वारा ‘पलटू राम’ कहे जाने से पहले—वह पटना की सड़कों पर नारे लगाने वाले जेपी आंदोलन के एक युवा कार्यकर्ता थे. बिहार के 75-वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री के राजनीतिक जीवन की वह जोशीली शुरुआत लगभग लोगों की यादों से गायब हो चुकी थी, लेकिन अब उसे फिर से सामने लाने की एक डिजिटल कोशिश शुरू हुई है.
Nitish Archive नाम की एक नई वेबसाइट उन भूले-बिसरे वर्षों को खोजकर सामने ला रही है, ताकि बिहार की राजनीतिक यादों को डिजिटल रूप में संजोया जा सके. यह परियोजना पिछले महीने एक फेसबुक पेज के रूप में शुरू हुई थी. इसमें नीतीश कुमार के संसद में दिए गए दुर्लभ भाषण, 1990 के दशक की अखबारों की कतरनें और उनके पुराने दोस्तों के इंटरव्यू साझा किए जा रहे हैं. उनके राजनीतिक जीवन के हर दौर को इसमें जगह दी जा रही है—समता पार्टी के दिनों से लेकर केंद्रीय रेल मंत्री के कार्यकाल और कई बार मुख्यमंत्री रहने तक.
नीतीश आर्काइव के संस्थापक संजीव कुमार ने कहा, “नीतीश भारत के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं. इन दिनों उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती और जेपी आंदोलन के उनके लगभग सभी साथी अब काफी बुजुर्ग हो चुके हैं. इसलिए हमने तय किया कि उनके करीब रहे लोगों की नज़र से नीतीश कुमार का दस्तावेजी रिकॉर्ड तैयार किया जाए.”
संजीव कुमार पटना के एक शोधकर्ता हैं और ‘जातिगत जनगणना: सब हैं राजी, फिर क्यों बयानबाजी’ नामक किताब के लेखक भी हैं, जो बिहार की जाति जनगणना पर आधारित है.
नीतीश आर्काइव अब राजनीतिक नेताओं को समर्पित गैर-आधिकारिक ऑनलाइन संग्रहालयों और श्रद्धांजलि मंचों की बढ़ती सूची में शामिल हो गया है. इनमें कुछ लोकप्रिय फैन पेज एक्स और इंस्टाग्राम पर चलते हैं, जैसे Nehruvian और Modi Archive, जबकि कुछ परिवारों, राजनीतिक दलों या संस्थानों द्वारा संचालित किए जाते हैं.
नवंबर 2025 में जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड ने Nehru Archive शुरू किया था. यह एक मुफ्त और पूरी तरह खोजी जा सकने वाली डिजिटल लाइब्रेरी है, जिसमें नेहरू की Selected Works के सभी 100 खंड मौजूद हैं. इस परियोजना का नेतृत्व कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने किया था, जो फंड के ट्रस्टी भी हैं. इसके अलावा चरण सिंह आर्काइव भी है, जिसे 2015 में शुरू किया गया था और इसे पूर्व प्रधानमंत्री के पोते हर्ष सिंह लोहित संचालित करते हैं.

हालांकि, 17 मई को जद(यू) के एक नेता ने नीतीश आर्काइव का औपचारिक शुभारंभ किया था, लेकिन यह एक स्वतंत्र परियोजना है और केवल प्रशंसा करने वाला मंच नहीं है. कई राजनीतिक फैन पेजों के विपरीत, जो सिर्फ टिप्पणी या तारीफ पर केंद्रित होते हैं, नीतीश आर्काइव बिहार के राजनीतिक इतिहास के अलग-अलग दौरों का एक संग्रह बनने की कोशिश करता है.
संजीव कुमार, जो तीन-चार शोधकर्ताओं की टीम के साथ इस मंच को चलाते हैं, कहते हैं, “विश्लेषण या राय देने के बजाय नीतीश आर्काइव पुरानी रिकॉर्डिंग और दस्तावेजों को खुद बोलने देता है. ऐसा करके यह इस बात पर चर्चा शुरू करता है कि पिछले तीन दशकों में बिहार और उसके सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे नेता में कितना बदलाव आया है.”
एक महीने से भी कम समय में इस फेसबुक पेज के 20,000 फॉलोअर हो चुके हैं. यह परियोजना इंस्टाग्राम पर भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है. हाल ही में इस हैंडल ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एक पीएचडी शोधार्थी का संदेश साझा किया, जिसमें उन्होंने बिहार की जाति और राजनीति पर अपने शोध के लिए इस सामग्री को “बेहद मूल्यवान” बताया.
पुराने एल्बम के पन्ने खोलना
जेन-ज़ी पीढ़ी के लिए, जो नीतीश कुमार को सिर्फ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में जानती है, यह आर्काइव राज्य की राजनीति का एक पुराना पारिवारिक एल्बम जैसा है, जिसे फिर से साफ करके लोगों के सामने लाया गया है.
इसमें 1990 के दशक के राजनीतिक अभियानों की तस्वीरें, संसद में दिए गए भाषणों के अंश, समाजवादी राजनीति के अंदरूनी संघर्षों की कहानियां और उन दोस्तों के किस्से शामिल हैं, जो नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनने से बहुत पहले से जानते थे. जून के पहले हफ्ते में आर्काइव टीम के सदस्यों ने मुजफ्फरपुर का अपना पहला दौरा किया. वहां दिवंगत जॉर्ज फर्नांडिस की जयंती पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. जॉर्ज फर्नांडिस के साथ ही नीतीश कुमार ने 1994 में समता पार्टी की स्थापना की थी. उस कार्यक्रम में नीतीश के पुराने कई सहयोगी भी मौजूद थे.
संजीव कुमार ने कहा, “बाद के वर्षों में नीतीश और फर्नांडिस के रिश्ते अच्छे नहीं रहे थे. उन बुजुर्ग लोगों की यादों को दर्ज करने से नीतीश के बारे में एक नया नज़रिया सामने आया.”

आर्काइव की पोस्टों में नीतीश कुमार के रेल मंत्री के कार्यकाल, जॉर्ज फर्नांडिस के साथ उनकी राजनीतिक साझेदारी और 1990 के दशक में बिहार में समता पार्टी के विस्तार की अंदरूनी कहानियां भी शामिल हैं.
एक पोस्ट में युवा नीतीश कुमार की एक दुर्लभ तस्वीर है, जिसमें वह दरभंगा में प्रोफेसर जगत रंजन के घर गए हुए दिखाई देते हैं. उस समय नीतीश नई बनी समता पार्टी को मजबूत करने के लिए मिथिला क्षेत्र का दौरा कर रहे थे और रंजन का घर क्षेत्रीय राजनीतिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था.

यह आर्काइव कई स्रोतों से सामग्री जुटाता है—अखबारों की रिपोर्ट, संसद और विधानसभा के रिकॉर्ड, निजी संग्रह और सबसे महत्वपूर्ण, उन लोगों की मौखिक यादें जिन्होंने इन घटनाओं को अपनी आंखों से देखा था. संजीव ने कहा, “एक महीने से भी कम समय में नीतीश के पुराने दोस्तों के परिवार वालों ने हमें उनकी पुरानी तस्वीरें भेजी हैं. यह जनसहयोग और जनभागीदारी पर आधारित कार्यक्रम है.”
उन्होंने कहा कि आने वाले महीनों में टीम जद(यू) नेता के जीवित पुराने दोस्तों से भी संपर्क करेगी, ताकि और अधिक “छिपी हुई कहानियां” सामने आ सकें.
उनके लिए सबसे बड़ी जरूरत सरकारी रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने से ज्यादा यादों को दर्ज करना है.
कुमार ने कहा, “कई ऐसे लोग हैं जिनके पास घटनाओं का प्रत्यक्ष अनुभव है. मेरा उद्देश्य इन कहानियों को बहुत देर होने से पहले रिकॉर्ड करना है.”
ऐसी ही एक याद वरिष्ठ राजनेता सरयू राय से जुड़ी है, जो 1960 के दशक के मध्य में पटना साइंस कॉलेज में नीतीश कुमार के साथ पढ़ते थे. बाद में दोनों की राजनीतिक राहें अलग हो गईं—नीतीश समाजवादी युवजन सभा के साथ काम करने लगे, जबकि राय एबीवीपी से जुड़ गए, लेकिन उनके व्यक्तिगत संबंध बने रहे.
राय ने बताया कि 2009 में झारखंड विधानसभा चुनाव हारने के बाद नीतीश कुमार बार-बार उन्हें बिहार आने के लिए कहते थे. उन्होंने मंत्री बनाने और राज्यसभा भेजने तक का प्रस्ताव दिया था. राय ने कहा, “मैंने उनसे कहा था कि मैं वहां एक बार हारा हूं और अगली बार वहीं से जीतूंगा. पांच साल तक वह दोस्तों के बीच मुझे चिढ़ाते रहे और कहते थे, ‘मैं इसे बार-बार अपने साथ आने को कहता हूं, लेकिन यह आता ही नहीं.’”

कभी-कभी पुरानी राजनीतिक विवादित बातें भी फिर से सामने लाई जाती हैं. एक पोस्ट में केंद्रीय रेल मंत्री के रूप में नीतीश कुमार के कार्यकाल की उस चर्चा को दोबारा उठाया गया है, जिसमें कहा गया था कि दिल्ली से पटना तक उनकी विशेष ट्रेन यात्राओं पर हर बार लगभग 5 लाख रुपये खर्च होते थे.
उस समय की एक अखबार की कटिंग में शीर्षक था, “Nitish Kumar’s ride costs railways dear” यानी “नीतीश कुमार की यात्रा रेलवे को महंगी पड़ती है.”
एक अन्य पोस्ट में संसद में बोलते हुए नीतीश कुमार 1990 के दशक की भारतीय राजनीति के एक बड़े विभाजन को बयान करते नजर आते हैं.
उन्होंने कहा था, “हिंदुस्तान में दो तरह के हिंदू हैं. एक मंडल और दूसरा कमंडल.” यहां ‘मंडल’ का मतलब जाति आधारित सामाजिक न्याय की राजनीति से था, जबकि ‘कमंडल’ हिंदुत्व आधारित राजनीतिक लामबंदी का प्रतीक माना जाता था.
कर्पूरी से नीतीश और फिर लालू?
जनवरी 2024 में मोदी सरकार द्वारा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की घोषणा से दो महीने पहले संजीव कुमार उनके बारे में शोध करने के लिए कर्पूरी ग्राम गए थे.
वहीं, से नीतीश कुमार के जीवन को दस्तावेजी रूप में दर्ज करने का विचार उनके मन में आया. संजीव ने पाया कि कर्पूरी ठाकुर को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले कई लोग अब इस दुनिया में नहीं रहे. बाद में जब मई 2024 में संतोष सिंह की किताब ‘The Jannayak Karpoori Thakur: Voice of the Voiceless’ प्रकाशित हुई, तो उसमें एक कमी ने उनका ध्यान खींचा.
कुमार ने कहा, “जब मैंने किताब पढ़ी तो महसूस किया कि उसमें उनके दोस्तों या करीबी लोगों का कोई विवरण नहीं है. सारी जानकारी सार्वजनिक दस्तावेजों या नेताओं के बयानों पर आधारित है.”
इससे उन्हें एहसास हुआ कि अगर नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन को उन लोगों की यादों के जरिए दर्ज करना है, जो उन्हें करीब से जानते थे, तो यह काम अभी शुरू करना होगा. नहीं तो कर्पूरी ठाकुर के साथ जो हुआ, वही नीतीश कुमार के साथ भी हो सकता है.

हालांकि, इस विचार को हकीकत में बदलने में लगभग दो साल लग गए.
संजीव कहते हैं कि शुरू से ही उनकी इच्छा थी कि यह पहल किसी राजनीतिक दल की आधिकारिक परियोजना न बने, बल्कि स्वतंत्र बनी रहे. लेकिन सामग्री और लोगों तक पहुंच पाने के लिए जनता दल (यूनाइटेड) के कुछ लोगों का सहयोग भी जरूरी था.
उन्होंने जद(यू) के विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार से संपर्क किया. बाद में नीरज कुमार ने 17 मई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस आर्काइव का शुभारंभ किया.
नीरज कुमार ने कहा, “नीतीश आर्काइव सिर्फ दस्तावेजीकरण की परियोजना नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक यात्रा को सुरक्षित रखने की एक ऐतिहासिक पहल है. इतिहास में कई महान नेताओं से जुड़ी महत्वपूर्ण यादें समय के साथ खो गई हैं. नीतीश आर्काइव इस ऐतिहासिक चूक को रोकने का एक संगठित प्रयास है.”
संजीव का कहना है कि वह सिर्फ नीतीश कुमार तक सीमित नहीं रहना चाहते. वह उन्हें बिहार के “आधुनिक निर्माताओं” में से एक मानते हैं, लेकिन जोर देकर कहते हैं कि उनका उद्देश्य प्रशंसा नहीं, बल्कि दस्तावेजीकरण है.
उन्होंने कहा, “यह सिर्फ नीतीश कुमार तक सीमित नहीं रहेगा. लालू यादव अगला नाम हो सकते हैं, क्योंकि दोनों ही बिहार की राजनीति के बड़े और प्रभावशाली नेता रहे हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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