24 मई को दिल्ली के लाल किले में 500 से अधिक समुदायों के लगभग दो लाख जनजाति लोग जंजाति सांस्कृतिक समागम में शामिल हुए. उनकी मांग साफ थी—जो लोग धर्मांतरण के बाद जनजाति आस्था, संस्कृति, परंपराओं और सामुदायिक जीवन को छोड़ चुके हैं, उन्हें अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए दिए जाने वाले संवैधानिक लाभ मिलते नहीं रहने चाहिए. यह मांग जनजाति सुरक्षा मंच के नेतृत्व में उठाई गई है और यह कोई नई मांग नहीं है. यह मौजूदा राजनीति की अचानक प्रतिक्रिया भी नहीं है.
इसकी जड़ें पांच दशक से भी पहले उठाए गए एक सवाल में हैं. यह सवाल प्रमुख जनजाति नेता, तीन बार लोकसभा सांसद और इंदिरा गांधी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे कार्तिक ओरांव ने उठाया था. उनका सवाल था—क्या कोई व्यक्ति, जिसने जनजाति परंपराओं, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और अपने समुदाय की पहचान से खुद को अलग कर लिया है, फिर भी अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक दर्जा पाने का दावा कर सकता है?
भारत ने इस सवाल से बहुत लंबे समय तक बचने की कोशिश की है.
धर्मांतरण और एसटी दर्जे पर अदालतों ने क्या कहा है?
संविधान में “अनुसूचित जनजाति (एसटी)” की परिभाषा नहीं दी गई है. अनुसूचित जाति (एससी) व्यवस्था के विपरीत, जहां कानून में धर्म के आधार पर स्पष्ट प्रतिबंध हैं, वहीं संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है. अक्सर इस चुप्पी को इस तरह माना जाता है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा पूरी तरह धर्म-निरपेक्ष है.
लेकिन कानून इतना सरल नहीं है.
केरल राज्य बनाम चंद्रमोहनन (एआईआर 2004 एससी 1672) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया था कि सिर्फ इसलिए एसटी का दर्जा धर्मांतरण के बाद भी अपने आप बना रहता है, क्योंकि एसटी से जुड़े कानून में एससी की तरह धर्म आधारित स्पष्ट प्रतिबंध नहीं हैं. अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति का सिर्फ किसी जनजाति से संबंध होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे उस जनजाति का सदस्य बने रहना भी ज़रूरी है.
अगर धर्मांतरण के बाद उसने या उसके पूर्वजों ने जनजाति रीति-रिवाज, परंपराएं और उत्तराधिकार, संपत्ति तथा विवाह से जुड़े पारंपरिक कानूनों का पालन करना बंद कर दिया है, तो संभव है कि उसे उस जनजाति का सदस्य न माना जाए. इसी सिद्धांत को इस वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने चिन्ताडा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में फिर दोहराया.
अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर धर्मांतरण या बाद के व्यवहार के कारण व्यक्ति का जनजाति जीवन-पद्धति से पूरी तरह संबंध टूट जाता है और समुदाय उसे स्वीकार करना बंद कर देता है, तो अनुसूचित जनजाति के दर्जे का आधार कमजोर हो जाता है. दूसरे शब्दों में, एसटी से जुड़े लाभ जीवित जनजाति पहचान से जुड़े रहने चाहिए. यही डीलिस्टिंग (सूची से हटाने) की मांग का संवैधानिक आधार है.
जनजाति जीवन नहीं, एसटी कोटा नहीं
धर्मांतरण कानूनी तौर पर इसलिए ज़रूरी नहीं है क्योंकि राज्य को निजी आस्था पर नज़र रखनी चाहिए, बल्कि इसलिए क्योंकि शेड्यूल्ड ट्राइब के फायदे आम वेलफेयर के हक नहीं हैं. ये ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर समुदायों के लिए संवैधानिक सुरक्षा हैं, जिनकी अलग संस्कृतियां, परंपराएं, पारंपरिक संस्थाएं और जीवन जीने के तरीके हैं. ये फायदे जनजाति पहचान की वजह से हैं. उन्हें उस पहचान के बने रहने से अलग नहीं किया जा सकता.
इसलिए जनजाति सुरक्षा मंच का मामला साफ है: एसटी के फायदे उन लोगों को मिलने चाहिए जो शेड्यूल्ड ट्राइब की ज़िंदगी का हिस्सा बने हुए हैं. अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से जनजाति सांस्कृतिक और सामाजिक ढांचे से बाहर निकलता है, जनजाति रीति-रिवाज़ों को मानना बंद कर देता है, पारंपरिक कानून मानना बंद कर देता है, और समुदाय अब उसे अपनी जीवित परंपरा के हिस्से के तौर पर मान्यता नहीं देता, तो एसटी के फायदों का दावा करना उन लोगों के साथ अन्याय होगा जो समुदाय में ही बने रहते हैं.
धर्मांतरण से किसी अलग धर्म में जाने का नतीजा जनजाति रीति-रिवाज़ों, पुरखों की प्रथाओं और सामुदायिक जीवन से पूरी तरह अलग होना होता है; वही व्यक्ति उसी पहचान के आधार पर संवैधानिक सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता जिसे छोड़ दिया गया है. कार्तिक ओरांव ने इस उलझन को दशकों पहले समझ लिया था. उनकी चिंता यह थी कि धर्मांतरण करने वाले जनजाति लोगों का एक छोटा सा हिस्सा, जिन्हें बेहतर शिक्षा और संस्थागत नेटवर्क की मदद मिली है, रिज़र्वेशन के फायदों का ज़्यादा हिस्सा ले रहा है, जबकि सबसे गरीब और सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद जनजाति परिवार पीछे रह गए हैं. जनजाति सुरक्षा मंच ने इस चिंता को फिर से उठाया है, यह तर्क देते हुए कि यह असंतुलन और बढ़ा है.
समस्या दोहरे फायदों के मुद्दे से और बढ़ जाती है.
धर्मांतरण करने वाला जनजाति व्यक्ति अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं का फ़ायदा उठाते हुए भी एसटी रिज़र्वेशन का दावा करना जारी रख सकता है. यह गरीब धर्मांतरित लोगों के कल्याण के ख़िलाफ़ कोई तर्क नहीं है. राज्य किसी भी ज़रूरतमंद ग्रुप के लिए अलग योजनाएं बना सकता है, लेकिन ऐसा कल्याण अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीमित संवैधानिक हिस्से से नहीं निकाला जा सकता. जनजाति सुरक्षा मंच का कहना आसान है: गरीब धर्मांतरित लोगों को न छोड़ें, लेकिन उन जनजाति लोगों के लिए बने कोटे से भी न लें जो जनजाति आस्था, संस्कृति, रीति-रिवाज़ और सामुदायिक जीवन को बचाए हुए हैं.
लंबे समय से उठ रही मांग
इस मांग का एक विधायी इतिहास भी है. 1967 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) विधेयक पर बनी संयुक्त संसदीय समिति ने इस सवाल पर विचार किया था कि जो लोग अपनी जनजाति आस्था छोड़कर धर्मांतरण के माध्यम से ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाते हैं, क्या उन्हें अनुसूचित जनजाति माना जाता रहना चाहिए. 1969 में समिति ने ऐसे लोगों को सूची से बाहर करने का समर्थन किया था. लेकिन इस मुद्दे का अंतिम समाधान नहीं हो सका और लोकसभा भंग होने के बाद यह विधेयक समाप्त हो गया.
अब वही अनसुलझा सवाल फिर से जोर-शोर से सामने आया है.
कई वर्षों से जनजाति सुरक्षा मंच इस मुद्दे पर जनसमर्थन जुटा रहा है. 2009-10 में संगठन ने एक बड़ा हस्ताक्षर अभियान चलाया था. उसके अनुसार, 26 राज्यों के 26,253 गांवों, 293 जिलों और 1,268 विकास खंडों से 27.67 लाख वयस्क जनजाति लोगों के हस्ताक्षर जुटाए गए थे. इन हस्ताक्षरों को जिला कलेक्टरों और राज्यपालों के माध्यम से राष्ट्रपति को भेजा गया था.
जनवरी 2010 में वरिष्ठ जनजाति नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल, जिसमें दिलीप सिंह भूरिया और जगदेवराम ओरांव शामिल थे, ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मुलाकात की और इस मुद्दे के जल्द समाधान की मांग वाला ज्ञापन सौंपा. तब से जनजाति सुरक्षा मंच जनजाति इलाकों में गांव संपर्क अभियान, रैलियां और जिला स्तरीय सम्मेलन आयोजित करता रहा है.
2020-21 में उसका अभियान 221 जिलों तक पहुंचा, जहां जिला स्तर के कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जनजाति लोगों ने भाग लिया. 2022-23 में संगठन का दावा है कि 21 राज्यों में कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 400 से अधिक जनजाति समुदायों ने हिस्सा लिया. 2023-24 में इस मांग के समर्थन में प्रधानमंत्री को 5.70 लाख पोस्टकार्ड भेजे गए.
मार्च 2023 में जनजाति सुरक्षा मंच ने दिल्ली में दो हफ्ते का जनसंपर्क अभियान चलाया. इस दौरान उसने अलग-अलग दलों के 450 सांसदों से संपर्क किया और उन्हें इस मुद्दे की जानकारी दी. 24 मई को लाल किले में हुआ कार्यक्रम इस अभियान की अब तक की सबसे बड़ी और ताजा सार्वजनिक अभिव्यक्ति था. यह इस लंबे समय से चली आ रही मांग की जोरदार अभिव्यक्ति थी कि जनजाति पहचान को केवल वंश या पूर्वजों तक सीमित नहीं किया जा सकता, जबकि उसकी परंपराएं, आस्था, रीति-रिवाज और सामुदायिक पहचान छोड़ दी जाए. इस कार्यक्रम के बाद जनजाति सुरक्षा मंच ने अपनी मांगें राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुंचाईं.
उसकी मुख्य मांग है कि जो लोग धर्मांतरण के बाद जनजाति आस्था, परंपराओं और संस्कृति को छोड़ देते हैं, उन्हें अनुसूचित जनजाति से जुड़े लाभ लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए. संगठन ने यह भी मांग की है कि इस मामले को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पास भेजा जाए और एक स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाई जाए, ताकि आम जनजाति लोगों को अंतहीन कानूनी लड़ाइयों में न फंसना पड़े. यही आखिरी बात सबसे महत्वपूर्ण है.
सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धांत तो तय कर दिया है, लेकिन उसे लागू करना अभी भी मुश्किल है. अदालतों का कहना है कि हर मामले का फैसला तथ्यों के आधार पर होना चाहिए—क्या दावा करने वाला व्यक्ति अभी भी जनजाति परंपराओं का पालन करता है, पारंपरिक कानूनों को मानता है, सामुदायिक जीवन में भाग लेता है और समुदाय द्वारा स्वीकार किया जाता है या नहीं. लेकिन ऐसे मामले अदालत में कौन ले जाएगा? उनका खर्च कौन उठाएगा? इन मामलों को निपटने में कितने साल लगेंगे? क्या कोई गरीब जनजाति परिवार वास्तव में अपनी पहचान साबित करने के लिए इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकता है?
भारत के जनजाति समुदायों के लिए न्याय
ऐसा अधिकार, जिसकी रक्षा केवल महंगे और हर मामले में अलग-अलग मुकदमों के जरिए ही हो सके, वास्तव में प्रभावी अधिकार नहीं होता. संवैधानिक सुरक्षा को प्रशासनिक स्तर पर लागू करना आसान बनाया जाना चाहिए.
इसके लिए चार कदम ज़रूरी हैं.
पहला, संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 में संशोधन, स्पष्टीकरण या पूरक प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें साफ कहा जाए कि जो व्यक्ति धर्मांतरण के बाद जनजाति आस्था, संस्कृति, परंपराएं और रीति-रिवाज छोड़ देता है और जिसे जनजाति समुदाय अपना सदस्य नहीं मानता, उसे संवैधानिक लाभों के लिए अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना जाएगा.
दूसरा, इस मामले को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) को भेजा जाना चाहिए. एनसीएसटी जनजाति हितों की रक्षा के लिए बना संवैधानिक निकाय है. उसे इस मुद्दे का अध्ययन करना चाहिए, जनजाति समुदायों से परामर्श करना चाहिए और व्यवहारिक मानदंड सुझाने चाहिए.
तीसरा, “जनजाति” शब्द को और स्पष्ट करने की जरूरत है. लोकुर समिति के मानदंड—आदिम विशेषताएं, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बाहरी संपर्क से दूरी और पिछड़ापन—कई दशक पहले बनाए गए थे. इनमें से कुछ बातें आज के भारत में पूरी तरह लागू नहीं होतीं. लेकिन विशिष्ट संस्कृति, पारंपरिक जीवनशैली और सामुदायिक मान्यता आज भी जनजाति पहचान का मुख्य आधार हैं और इन्हें फिर से स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए.
चौथा, सरकार को ऐसा आसान प्रशासनिक तंत्र बनाना चाहिए, जिससे जनजाति समुदायों को हर मामले के लिए अदालतों का दरवाजा न खटखटाना पड़े. कानून इतना स्पष्ट होना चाहिए कि अधिकारी बिना उत्पीड़न, राजनीतिक दुरुपयोग या अनावश्यक देरी के उसका निष्पक्ष इस्तेमाल कर सकें.
भारत के जनजाति समुदाय केवल प्रशासनिक श्रेणियां नहीं हैं. वे अपनी भाषाओं, पवित्र स्थलों, त्योहारों, पारंपरिक कानूनों, पर्यावरणीय ज्ञान और सामाजिक संस्थाओं वाले जीवंत सांस्कृतिक समुदाय हैं. संविधान ने उनकी विशेष परिस्थितियों को पहचानते हुए उन्हें विशेष सुरक्षा दी थी. इस सुरक्षा को केवल एक तकनीकी लाभ तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, जिसे जनजाति पहचान छोड़ने के बाद भी हासिल किया जा सके. पिछले 75 वर्षों से भारत इस सवाल को टालता रहा है. कार्तिक उरांव ने 1960 और 1970 के दशक में यह मुद्दा उठाया था. 1969 में संयुक्त संसदीय समिति ने भी इस पर विचार किया था. जनजाति सुरक्षा मंच ने हस्ताक्षर अभियान, ज्ञापन, संवैधानिक पदाधिकारियों से मुलाकात, सांसदों से संपर्क और बड़े जनजातीय आंदोलनों के जरिए इस मुद्दे को लगातार उठाया है. 24 मई को लाल किले पर हुआ जनजातीय सांस्कृतिक समागम दिखाता है कि अब इस सवाल को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
अनुसूचित जनजाति का दर्जा केवल वंश के आधार पर नहीं होना चाहिए. यह जीवित जनजाति पहचान से जुड़ा रहना चाहिए. आस्था का खोना संस्कृति का खोना है, और संस्कृति का खोना पहचान का खोना है. यही डीलिस्टिंग की मांग का आधार है. यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि भारत के जनजाति समुदायों के लिए न्याय की मांग है.
लेखक आदित्य कश्यप एडवोकेट हैं. उनका एक्स हैंडल @adityak.law है. ये लेखक के निजी विचार हैं.
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