पिछले हफ्ते हमने इस बात का जश्न मनाया कि नरेंद्र मोदी भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए हैं. 10 जून को उनका कार्यकाल पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल से आगे निकल गया. नेहरू जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब वे सीधे जनता द्वारा निर्वाचित नहीं थे. यह उपलब्धि खास तौर पर इसलिए सराहनीय है क्योंकि 1.4 अरब लोगों वाले, भाषा, संस्कृति, धर्म और भौगोलिक विविधता से भरे देश का शासन चलाना कोई आसान काम नहीं है.
भगवद गीता का श्लोक 3.21 उस जनविश्वास को दर्शाता है जो प्रधानमंत्री को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लगातार तीन राष्ट्रीय जनादेशों के रूप में मिला है.
यद् यद् आचरति श्रेष्ठस्
तत् तद् एवेतरो जनः.
स यत् प्रमाणं कुरुते
लोकस् तदनुवर्तते॥
“श्रेष्ठ व्यक्ति जो भी आचरण करता है, सामान्य लोग उसका अनुसरण करते हैं. वह जो मानक स्थापित करता है, दुनिया उसी का पालन करती है.”
बहुत साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर, जिनका अक्सर दिल्ली के लुटियंस इलाके (जिसे दिल्ली जिमखाना क्लब का इलाका भी कहा जाता है) में बैठने वाले अभिजात्य विपक्षी नेताओं द्वारा “चायवाला” कहकर मज़ाक उड़ाया जाता था, वे बिना किसी पारिवारिक राजनीतिक विरासत या राजनीतिक परिवार के सहारे देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद तक पहुंचे.
उन्होंने अपने काम से उदाहरण पेश किया. वे बहुत कम या बेहद साधारण सुविधाओं के साथ काम करते रहे, जिससे उनके राजनीतिक विरोधी अक्सर परेशान रहते थे. सत्ता में उनके 12 वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भारत की वैश्विक छवि और दुनिया में भारत तथा भारतीयों को लेकर बनी धारणा का मजबूत होना है.
आज जब वैश्विक जुड़ाव देशों को पहले से कहीं ज्यादा करीब ला रहा है, तब किसी देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा सिर्फ उसके आकार, सैन्य ताकत या जनसंख्या पर निर्भर नहीं रहती. बल्कि उसके ऐतिहासिक और बौद्धिक योगदान, साथ ही भविष्य के लिए उसके विजन से बनने वाली कहानी ही उसकी विदेश नीति की बुनियाद और आधार तैयार करती है.
सॉफ्ट पावर की कहानी
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विद्वान जोसेफ नाए ने अपनी किताब Bound to Lead: The Changing Nature of American Power में सबसे पहले सॉफ्ट पावर की परिभाषा दी थी.
नाए ने लिखा था, “सॉफ्ट पावर वह क्षमता है, जिसके जरिए आप दबाव या पैसे के बजाय आकर्षण के माध्यम से अपनी बात मनवा सकते हैं.” उनका कहना था कि यह किसी देश की संस्कृति, राजनीतिक आदर्शों और नीतियों की आकर्षण शक्ति से पैदा होती है.
इसके बाद सॉफ्ट पावर को तीन मुख्य आधारों में बांटा गया. पहला, संस्कृति, यानी कला, जीवनशैली और ऐसे मूल्य जो दूसरे देशों को आकर्षित करें. दूसरा, राजनीतिक मूल्य, यानी किसी देश में और उसके बाहर लोकतंत्र, निष्पक्षता और मानवाधिकारों का पालन किस तरह किया जाता है और तीसरा, विदेश नीति, यानी दुनिया में किसी देश की नीतियों की वैधता, नैतिक अधिकार और सहयोगी रवैये को किस नजर से देखा जाता है.
नाए ने यह भी कहा था कि “स्मार्ट पावर वह क्षमता है, जिसमें हार्ड पावर और सॉफ्ट पावर दोनों की रणनीतियों को मिलाकर सफल नीतियां बनाई जाती हैं.”
आज मैनेजमेंट स्कूल प्रभावी कहानी कहने (स्टोरीटेलिंग) की कला सिखा रहे हैं. तो फिर सार्वजनिक नीति (पब्लिक पॉलिसी) के स्कूल ऐसा क्यों न करें? और प्रधानमंत्री मोदी के दौर में भारत ने अपनी ताकत की एक नई कहानी गढ़ने की दिशा में काम किया है.
भारत की बौद्धिक विरासत और उसका ऐतिहासिक विकृतिकरण
दुनिया के विद्वानों और आम धारणा में भारत को अक्सर केवल आध्यात्मिकता, रहस्यवाद और अनोखे दर्शन के नजरिए से पेश किया गया है.
पश्चिमी मीडिया ने “नंगे फकीर”, गाय की पूजा करने वाले लोगों और हठयोग के जरिए तपस्या करने वाले साधुओं जैसी छवियों को खूब बढ़ावा दिया. ये सब लोकप्रिय संस्कृति में बने पुराने और घिसे-पिटे चित्रणों से निकली बातें थीं.
इस संकीर्ण नज़रिए में गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, धातुकर्म और तर्कशास्त्र में भारत के विशाल योगदान को काफी हद तक नजरअंदाज कर दिया गया. इससे अनजाने में यह धारणा बन गई कि भारत ने दुनिया को आध्यात्मिक ज्ञान दिया, लेकिन वैज्ञानिक आधुनिकता पश्चिम ने विकसित की. यह धारणा न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी भारत के लिए फायदेमंद नहीं है.
अगर किसी देश को सिर्फ प्राचीन संस्कृति का भंडार माना जाए, आधुनिक इनोवेशन का स्रोत नहीं, तो वह तकनीक के भविष्य को तय करने वाली चर्चाओं से बाहर हो सकता है. इसमें एआई, शोध और वैश्विक शासन जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं.
जहां पश्चिमी दुनिया को हमेशा गूगल, इंटरनेट और एआई जैसे आविष्कारों का श्रेय मिलता रहा है, वहीं पश्चिम के तकनीकी और चिकित्सा शोध को आगे बढ़ाने में भारतीय दिमागों की बड़ी भूमिका रही है. भारतीय मूल के प्रवासियों से जुड़े मौजूदा एच-1बी वीजा विवाद को देखकर भी यह बात साफ दिखाई देती है.
प्राचीन ज्ञान जिसने आधुनिक इनोवेशन की नींव रखी
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी बौद्धिक परंपरा की निरंतरता में है. फिर भी, दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक होने के बावजूद, गणित, विज्ञान और मानविकी में अपने वैश्विक योगदान के लिए भारत को वह पहचान नहीं मिल पाई जिसकी वह हकदार है. दुनिया यह भूल गई कि भारत ने ही दुनिया को शून्य (Zero) दिया था, दोनों रूपों में—एक प्लेसहोल्डर के रूप में और एक संख्या के रूप में. इसी ने आज के गणित और क्वांटम कंप्यूटिंग की नींव रखी.
ब्रिटानिका के अनुसार, ईसा पूर्व तीसरी या चौथी शताब्दी का बख्शाली पांडुलिपि शून्य के प्लेसहोल्डर के रूप में सबसे पुराने दर्ज उपयोग को दिखाती है. 628 ईस्वी में ब्रह्मगुप्त ने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं के साथ उसके गणितीय नियमों को पहली बार परिभाषित किया था. आधुनिक कंप्यूटिंग, डिजिटल तकनीकों और एआई की नींव बनाने वाले कई सिद्धांतों की बौद्धिक जड़ें भारतीय विचारों तक पहुंचती हैं.
विज्ञान की सॉफ्ट पावर में कमी
अंतरराष्ट्रीय सॉफ्ट पावर रैंकिंग अक्सर एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाती हैं.
संस्कृति, विरासत और परंपराओं से जुड़े क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन काफी अच्छा रहता है, लेकिन वैज्ञानिक प्रभाव, तकनीकी नेतृत्व और नवाचार के मामले में उसकी रैंकिंग अपेक्षाकृत कम रहती है. लंदन स्थित कंसल्टेंसी Brand Finance के Global Soft Power Index 2025 में, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों को रैंक किया गया, भारत कुल मिलाकर 30वें स्थान पर रहा. हालांकि, संस्कृति और विरासत के मामले में भारत 12वें स्थान पर था, जिसमें कला और मनोरंजन के क्षेत्र में 6वां स्थान शामिल है. लेकिन “विज्ञान में उन्नत” श्रेणी में भारत 18वें और “तकनीक एवं नवाचार में उन्नत” श्रेणी में 24वें स्थान पर रहा. इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारत की क्षमताओं को अब भी उन कथाओं के जरिए देखा जाता है जो औपनिवेशिक दौर में बनाई गई थीं और जो आज भी वैश्विक सोच को प्रभावित करती हैं.
डिजिटल गवर्नेंस, दवा निर्माण, आईटी और वैज्ञानिक अनुसंधान में भारत की उल्लेखनीय प्रगति को अक्सर उतनी पहचान नहीं मिलती जितनी योग, भारतीय भोजन और भारतीय संस्कृति की सबसे प्रमुख पहचान माने जाने वाले बॉलीवुड को मिलती है. हालांकि, भारत ने यह प्रभावी ढंग से साबित किया है कि उसके पास आज भी विश्वस्तरीय वैज्ञानिक क्षमता और तकनीकी दक्षता मौजूद है. इसका एक उदाहरण कोवैक्सिन है, जो भारत की स्वदेशी कोविड-19 वैक्सीन है और जिसे भारत बायोटेक ने विकसित किया था. इस साल Frontiers in Immunology में छपी एक स्टडी के अनुसार, यह सबसे प्रभावी वैक्सीनों में से एक रही. लक्षण वाले संक्रमण के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता 77.8 प्रतिशत और गंभीर संक्रमण के खिलाफ 93.4 प्रतिशत रही. इस वैक्सीन ने कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कड़ी चुनौती दी, क्योंकि वे भारत को एक देश नहीं बल्कि केवल एक बाजार के रूप में देख रही थीं.
चंद्रयान-3, आदित्य-L1, प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और आने वाला गगनयान मिशन देश के अनुसंधान तंत्र और इंजीनियरिंग क्षमता की गहराई को दिखाते हैं. हाल ही में एक आईआईटी परिसर के दौरे के दौरान मुझे यह देखकर प्रभावित हुआ कि हमारे सबसे प्रतिभाशाली छात्रों ने ऐसा थर्मल सुरक्षा उपकरण विकसित किया है जो ध्रुवीय क्षेत्रों की अत्यधिक ठंड के लिए बनाए जाने वाले प्रसिद्ध ब्रांड Canada Goose के उत्पादों को भी टक्कर दे सकता है. ये उपलब्धियां कोई अकेली सफलताएं नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से किए गए संस्थागत निवेश और वैज्ञानिक परिपक्वता का प्रमाण हैं. ये इस बात को भी मजबूत करती हैं कि नवाचार को केवल पारंपरिक उत्तर अटलांटिक देशों के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. जैसे-जैसे अधिक देश वैज्ञानिक योगदान के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं, तकनीकी नेतृत्व की परिभाषा को भी बदलने और व्यापक बनाने की जरूरत है.
क्या वैश्विक प्रतिष्ठा तय करने वाले पैमाने पक्षपातपूर्ण हैं?
क्या अब समय आ गया है कि इन रैंकिंग और सूचकांकों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जाएं?
सॉफ्ट पावर, इनोवेशन या सुशासन से जुड़ी रैंकिंग को अक्सर पूरी तरह निष्पक्ष आकलन के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन कई बार ये व्यक्तिपरक आंकड़ों, खामियों वाले सर्वेक्षणों और पश्चिमी शैक्षणिक तथा नीति तंत्र में तैयार किए गए मानकों पर आधारित होती हैं.
नतीजतन, ये सूचकांक अक्सर विकास के स्थानीय और स्वदेशी मॉडलों को सही तरीके से नहीं समझ पाते. उदाहरण के लिए भारत ने यूपीआई से लेकर डिजीलॉकर तक विशाल डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा तैयार किया है, लेकिन वैश्विक नवाचार रैंकिंग आज भी पेटेंट और अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर होने वाले खर्च को ज्यादा महत्व देती हैं.
भारत का विशाल आकार, उसका डिजिटल सार्वजनिक ढांचा, उसकी लोकतांत्रिक जटिलता और कई स्वदेशी नवाचारों को अक्सर अलग नज़रिए और अलग मानकों से परखा जाता है. ये रैंकिंग निवेशकों के भरोसे, कूटनीतिक संबंधों और अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं.
इसलिए भारत इन्हें पूरी तरह निष्पक्ष या अंतिम मानक मानकर नहीं चल सकता.
अब जरूरत इस बात की है कि ऐसी अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण कार्यप्रणालियों की मांग की जाए, जो विकास और नवाचार के अलग-अलग रास्तों को भी मान्यता दें. यह अंतर और भी स्पष्ट हो जाता है जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी संस्थाएं भारत की आर्थिक मजबूती को स्वीकार करती हैं.
स्वास्थ्य सेवा: सॉफ्ट पावर का नया क्षेत्र
स्वास्थ्य सेवा सॉफ्ट पावर का एक मजबूत माध्यम बनकर उभरी है, जो वैज्ञानिक प्रगति को कूटनीतिक ताकत में बदल सकती है. उदाहरण के तौर पर, सिकल सेल एनीमिया एक ऐसी बीमारी है जिसका संबंध मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों से जुड़ा हुआ है और यह भारत तथा अफ्रीका दोनों में व्यापक रूप से पाई जाती है. सस्ती चिकित्सा और स्वदेशी शोध के क्षेत्र में भारत का काम समावेशी विकास और मानवीय नेतृत्व की वैश्विक कहानी को मजबूत कर सकता है.
भारत एक ऐसा देश है जिसके पास सस्ती दवाओं और बड़े स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का व्यापक अनुभव है. इसी वजह से भारत अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देशों के साथ ज्ञान, जांच सुविधाएं और उपचार मॉडल साझा करने की अच्छी स्थिति में है, खासकर उन देशों की तुलना में जिन्हें उष्णकटिबंधीय बीमारियों से निपटने का कम अनुभव है.
ऐसा सहयोग भारत की छवि को केवल आर्थिक या रणनीतिक शक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में भी मजबूत कर सकता है. यह भारत की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की सभ्यतागत सोच को व्यवहार में बदलने का उदाहरण होगा.
इससे यह भी साबित होगा कि करुणा, नवाचार और क्षमता—ये तीनों मिलकर आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रभाव का एक मजबूत और टिकाऊ आधार बनाते हैं.
लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु.
“सभी प्राणी, सभी लोकों में, सुखी और स्वतंत्र रहें.”
यह प्राचीन संस्कृत मंत्र आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भारत के प्रभाव का उदाहरण प्रस्तुत करता है.
भारत की सभ्यतागत सोच का आकर्षण इस विश्वास से और मजबूत होता है कि उसके मूल्यों के पीछे तकनीकी और नवाचार की वास्तविक क्षमता भी मौजूद है. जब सॉफ्ट पावर को रणनीतिक क्षमता का समर्थन मिलता है, तब वह केवल एक सभ्यतागत आकांक्षा नहीं रहती, बल्कि प्रभाव को कई गुना बढ़ाने वाली शक्ति बन जाती है.
मीनाक्षी लेखी बीजेपी लीडर, वकील और सोशल एक्टिविस्ट हैं. उनका एक्स हैंडल @M_Lekhi है. विचार व्यक्तिगत हैं.
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