scorecardresearch
Tuesday, 16 June, 2026
होमडिफेंसलेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ आर्मर्ड कोर से आने वाले 7वें सेना प्रमुख होंगे. जानिए बाकी कौन थे?

लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ आर्मर्ड कोर से आने वाले 7वें सेना प्रमुख होंगे. जानिए बाकी कौन थे?

अब तक बने 30 सेना प्रमुखों (COAS) में से छह आर्मर्ड कोर से, पांच आर्टिलरी कोर से और एक इंजीनियर्स से रहे हैं. बाकी सभी इन्फैंट्री से आए हैं.

Text Size:

नई दिल्ली: 30 जून की दोपहर भारतीय सेना को उसका 31वां सेना प्रमुख (COAS) मिलेगा, जब लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ यह जिम्मेदारी संभालेंगे. वह आर्मर्ड कोर से आने वाले 7वें अधिकारी होंगे जो सेना के सर्वोच्च पद तक पहुंचे हैं. इनमें से दो अधिकारी ऐसे थे जो यह पद इसलिए संभाल सके क्योंकि यह पद अचानक खाली हो गया था.

दिलचस्प बात यह है कि वह 1997 के बाद इस शीर्ष पद तक पहुंचने वाले पहले आर्मर्ड कोर अधिकारी होंगे. इस बीच आर्मर्ड कोर के एक अन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी को उनके जूनियर और बाद में देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बने बिपिन रावत के पक्ष में नज़रअंदाज़ कर दिया गया था.

कुल मिलाकर सेना के पांच प्रमुख आर्टिलरी कोर से और एक इंजीनियर्स से रहे हैं. बाकी सभी इन्फैंट्री से आए हैं.

दिप्रिंट आर्मर्ड कोर से आए छह सेना प्रमुखों के करियर पर एक नज़र डाल रहा है.

जनरल महाराज श्री राजेंद्र सिंहजी जाडेजा

हालांकि, जनरल के.एम. करियप्पा 15 जनवरी 1949 से 14 जनवरी 1953 तक सेना का नेतृत्व करने वाले पहले भारतीय अधिकारी थे, लेकिन उनके पास एक साथ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ और कमांडर-इन-चीफ दोनों पद थे.

2nd लांसर्स के जनरल जाडेजा के पास भी यह दोहरी जिम्मेदारी थी. बाद में 1 अप्रैल 1955 को पद का नाम बदलकर सिर्फ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कर दिया गया. वह सेवानिवृत्ति से पहले 43 दिनों तक इस नए पद पर रहे.

जनरल जयंतो नाथ चौधुरी

16 लाइट कैवेलरी के जनरल चौधुरी भारतीय सेना के 6वें सेना प्रमुख थे. उन्होंने 20 नवंबर 1962 से 7 जून 1966 तक इस पद पर सेवा दी.

हालांकि वह 1962 के युद्ध में भारत की हार के बाद अपने पूर्ववर्ती जनरल प्रण नाथ थापर के इस्तीफे के कारण सेना प्रमुख बने थे, लेकिन उनका कार्यकाल सेना के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण दौरों में से एक माना जाता है.

उनकी उपलब्धियों में द्वितीय विश्व युद्ध, रियासतों का भारत में विलय, सेना का आधुनिकीकरण और 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध शामिल हैं.

1st आर्मर्ड डिवीजन के कमांडर के रूप में उन्होंने ऑपरेशन पोलो में निर्णायक भूमिका निभाई. इसी ऑपरेशन के जरिए हैदराबाद रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ था. उन्होंने हैदराबाद स्टेट फोर्सेज के कमांडर मेजर जनरल सैयद अहमद एल एडरूस का आत्मसमर्पण भी स्वयं स्वीकार किया था.

उन्हें 1948 से 1949 के बीच हैदराबाद का सैन्य गवर्नर भी नियुक्त किया गया था.

1947-48 के कश्मीर युद्ध के दौरान वह सेना मुख्यालय में मिलिट्री ऑपरेशंस एंड इंटेलिजेंस के निदेशक थे और पाकिस्तान के हमले के जवाब में सैन्य कार्रवाई को संगठित करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

सेना प्रमुख के रूप में उन्होंने सेना के बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण और पुनर्गठन का नेतृत्व किया. इस दौरान प्रशिक्षण पर नया जोर दिया गया और जवानों का मनोबल बढ़ाने पर ध्यान दिया गया.

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी वही सेना प्रमुख थे. उस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान सेना की योजनाओं को विफल कर दिया था. इसी युद्ध में टैंकों की दो बड़ी लड़ाइयां—असल उत्तर की लड़ाई और फिल्लौरा की लड़ाई—लड़ी गई थीं.

जनरल अरुण श्रीधर वैद्य

डेक्कन हॉर्स (9 हॉर्स) के जनरल अरुण श्रीधर वैद्य 1 अगस्त 1983 से 31 जनवरी 1986 तक भारतीय सेना के 12वें सेना प्रमुख (COAS) रहे. वह भारतीय सेना के सबसे अधिक सम्मानित अधिकारियों में से एक थे और अब तक के इकलौते सेना प्रमुख हैं जिन्हें दो बार महावीर चक्र से सम्मानित किया गया.

उन्हें पहला महावीर चक्र 1965 के युद्ध में उनकी भूमिका के लिए मिला था. उस समय उनके नेतृत्व में डेक्कन हॉर्स ने पाकिस्तान सेना की पहली आर्मर्ड डिवीजन को भारी नुकसान पहुंचाया था. उनकी रेजिमेंट को 22 वीरता पुरस्कार मिले थे और कमांडेंट के रूप में लेफ्टिनेंट कर्नल वैद्य को महावीर चक्र दिया गया था.

उन्हें दूसरा महावीर चक्र 1971 के युद्ध में उनकी भूमिका के लिए मिला. उस युद्ध में उन्होंने अपनी ब्रिगेड का नेतृत्व चक्रा और देहिरा की लड़ाइयों के साथ-साथ बसंतर की लड़ाई में भी किया था.

31 जुलाई 1983 को वैद्य भारतीय सेना के 13वें सेना प्रमुख बने. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने जनरल के.वी. कृष्णा राव के बाद सेना प्रमुख बनने की दौड़ में सबसे वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल एस.के. सिन्हा को पीछे छोड़ दिया था.

बाद में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि वैद्य को उनके सैन्य अभियानों के अनुभव के कारण चुना गया था. इस फैसले के बाद लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा ने सेना की नौकरी से इस्तीफा दे दिया था.

सेना प्रमुख के रूप में जनरल वैद्य ने ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना बनाई और उसकी निगरानी की. जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर से हथियारबंद उग्रवादियों को हटाने के लिए यह सैन्य अभियान चलाया गया था.

31 जनवरी 1986 को सेवानिवृत्त होने के बाद वह पुणे चले गए और वहीं बस गए, लेकिन 10 अगस्त 1986 को बाज़ार से घर लौटते समय उनकी कार पर हमला हुआ और उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी गई.

खालिस्तान कमांडो फोर्स ने इस हत्या की जिम्मेदारी ली थी. संगठन ने कहा था कि यह ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला था.

जनरल विश्वनाथ शर्मा

16 लाइट कैवेलरी के जनरल विश्वनाथ शर्मा भारतीय सेना के 14वें सेना प्रमुख (COAS) थे. दिलचस्प बात यह है कि वह सेना का नेतृत्व करने वाले पहले प्रेसिडेंट्स कमीशंड ऑफिसर थे. उन्हें जून 1950 में कमीशन मिला था.

उन्होंने जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी के बाद सेना प्रमुख का पद संभाला था. सुंदरजी ने सेना में कई बड़े सुधार किए थे, जिनमें मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री का गठन भी शामिल था.

जनरल शर्मा एक प्रतिष्ठित सैन्य परिवार से आते थे. उनके भाई मेजर सोमनाथ शर्मा भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता थे और उनके पिता भी सेवानिवृत्त मेजर जनरल थे. उनके दूसरे भाई सुरिंद्र नाथ शर्मा लेफ्टिनेंट जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए थे, जबकि उनकी बहन कमला तेवारी आर्मी मेडिकल कोर में मेजर थीं.

उनका कार्यकाल मुख्य रूप से जनरल सुंदरजी द्वारा शुरू किए गए सेना के पुनर्गठन को आगे बढ़ाने पर केंद्रित रहा.

हालांकि, उनके कार्यकाल की सबसे कठिन चुनौती श्रीलंका में भारतीय शांति सेना (IPKF) का अभियान था.

उन्होंने पंजाब और पूर्वोत्तर में सेना के उग्रवाद-विरोधी अभियानों की भी निगरानी की.

जनरल बिपिन चंद्र जोशी

64वीं कैवेलरी के जनरल बिपिन चंद्र जोशी 1 जुलाई 1993 से 19 नवंबर 1994 तक भारतीय सेना के 16वें सेना प्रमुख रहे. वह अब तक के इकलौते सेना प्रमुख हैं जिनका निधन पद पर रहते हुए हुआ था.

उन्होंने भारतीय सेना को कश्मीर में आतंकवाद-रोधी भूमिका में बदलने का नेतृत्व किया. सेना प्रमुख बनने से पहले उन्होंने राष्ट्रीय राइफल्स (RR) की स्थापना की थी, जिसे आतंकवाद-रोधी अभियानों के लिए एक विशेष बल के रूप में तैयार किया गया था.

अपनी तय सेवानिवृत्ति से एक साल पहले ही उनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया था.

जनरल शंकर रॉय चौधरी

जनरल शंकर रॉय चौधरी ने अपने पूर्ववर्ती जनरल जोशी के अचानक निधन के बाद 17वें सेना प्रमुख (COAS) के रूप में पद संभाला.

20वीं लांसर्स के अधिकारी रॉय चौधरी ने 20 नवंबर 1994 को सेना प्रमुख का पद संभाला और 30 सितंबर 1997 को सेवानिवृत्ति तक इस पद पर रहे.

सेना प्रमुख बनने से पहले उन्होंने 1991-92 में जम्मू-कश्मीर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 16 कोर की कमान संभाली थी. उस समय राज्य में उग्रवाद तेजी से बढ़ रहा था.

सेना प्रमुख के रूप में उन्होंने कश्मीर में आतंकवाद-रोधी अभियानों की निगरानी की. यह वह समय था जब सेना अपने सबसे कठिन दौरों में से एक का सामना कर रही थी.

जहां जनरल जोशी ने राष्ट्रीय राइफल्स (RR) की स्थापना की थी, वहीं जनरल रॉयचौधरी ने इस संगठन का विस्तार किया और इसे पूरी तरह मजबूत तथा परिपक्व बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

share & View comments