नई दिल्ली: जब 19 साल के प्रवेश पिछले साल हरियाणा के दादरी से दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजधानी कॉलेज में बी.एससी इलेक्ट्रॉनिक्स की पढ़ाई करने दिल्ली आए, तब उनके पास रहने की जगह भी नहीं थी. उन्हें सबसे कम उम्मीद आम आदमी पार्टी के नए छात्र संगठन से मदद मिलने की थी.
दिल्ली में नए होने और कॉलेज एडमिशन, रहने की जगह और अनजान कैंपस को समझने की परेशानी के बीच, प्रवेश और उनके दोस्त साहिल फोगाट, जो रेवाड़ी से बी.एससी केमिस्ट्री के छात्र हैं, खुद ही सब समझने की कोशिश कर रहे थे.
तभी कुछ सीनियर छात्र उनकी मदद के लिए आगे आए.
ASAP यानी एसोसिएशन ऑफ स्टूडेंट्स फॉर अल्टरनेटिव पॉलिटिक्स — AAP का नया छात्र संगठन के सदस्यों ने उन्हें फ्लैट ढूंढने में मदद की, ब्रोकरों से मिलवाया, छात्र ग्रुप्स में जोड़ा और कॉलेज की व्यवस्था कैसे काम करती है, यह समझाया.
साहिल ने कहा, “पहले साल के छात्र को ज्यादा कुछ नहीं चाहिए होता. कभी-कभी बस एक ऐसा सीनियर चाहिए होता है जो मदद कर दे.”
प्रवेश और साहिल ने कहा कि इस अनुभव ने छात्र राजनीति को देखने का उनका नज़रिया बदल दिया. इससे पहले तक छात्र राजनीति उन्हें महंगी SUV गाड़ियों, ज्यादा पोस्टरबाजी और आक्रामक प्रचार तक ही सीमित लगती थी.
Gen Z के बहुत से स्टूडेंट्स अब खुद को अपॉलिटिकल कहते हैं. हम एक ऐसा ऑर्गनाइज़ेशन बनाना चाहते थे जिससे वे अब भी जुड़ सकें
– ASAP लीडर अयान राय
दिल्ली भर में ASAP खुद को कैंपस राजनीति की पुरानी और अक्सर आक्रामक संस्कृति के एक नए विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, जिस पर लंबे समय से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) का दबदबा रहा है. संगठन खुद को मुद्दों पर आधारित राजनीति से जोड़ता है, जैसे फीस बढ़ोतरी, मेट्रो रियायत, महिलाओं की सुरक्षा और प्रशासनिक समस्याएं — न कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनावों से जुड़ी दिखावटी और बड़े प्रचार वाली राजनीति से.
लेकिन ASAP ऐसे समय में सामने आया है जब खुद AAP भी मुश्किल दौर से गुज़र रही है. मई 2025 में लॉन्च हुआ ASAP, दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP की हार के कुछ महीनों बाद शुरू किया गया था. इसे पार्टी की युवाओं और कैंपस में अपनी पकड़ फिर से बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. AAP का पुराना छात्र संगठन, छात्र युवा संघर्ष समिति (सीवाईएसएस), लगातार चुनावी हार और लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद धीरे-धीरे कैंपस से गायब हो गया था. जब अरविंद केजरीवाल आबकारी नीति मामले में जेल गए और पार्टी को चुनावी हार और अंदरूनी टूट का सामना करना पड़ा, तब डीयू में AAP की पहले से ही कमज़ोर छात्र संगठन की मौजूदगी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी. संगठन के भीतर ASAP को AAP की कैंपस राजनीति रणनीति का पुनर्जीवन और नई शुरुआत दोनों माना जाता है.
अप्रैल में ASAP तब चर्चा में आया जब उसके सदस्यों ने गार्गी कॉलेज की घटना की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर उपराज्यपाल सचिवालय तक मार्च निकाला. एबीवीपी के सदस्यों और डूसू अध्यक्ष आर्यन मान ने जबरन कैंपस में प्रवेश किया था. इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल गए और महिला कॉलेजों की सुरक्षा को लेकर फिर से चिंता बढ़ गई.

कई छात्रों के लिए यह पहली बार था जब उन्होंने ASAP का नाम सुना. संगठन के सदस्य एलजी ऑफिस और कॉलेजों के बाहर कैंपस हिंसा और जबरन प्रवेश के खिलाफ तख्तियां लेकर खड़े हुए. इस तरह उन्होंने सेमेस्टर के सबसे ज्यादा चर्चा वाले डीयू विवादों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.
लॉन्च होने के एक साल बाद संगठन ने ज़मीनी स्तर पर अपनी मौजूदगी बढ़ाई है. हालांकि, वह अभी भी दिल्ली यूनिवर्सिटी की राजनीति में बड़ी ताकत बनने से काफी दूर है. सीवाईएसएस की तरह, जो मजबूत आधार बनाने में संघर्ष करता रहा, ASAP भी एबीवीपी और कांग्रेस की एनएसयूआई से भरे छात्र राजनीतिक माहौल में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है.
पैर जमाने की कोशिश
प्रवेश के लिए डीयू उनकी लाइफ की सबसे बड़ी चीज़ थी. हरियाणा के एक छोटे शहर से आने वाले प्रवेश को दिल्ली बहुत भारी और मुश्किल लगी.
उन्होंने कहा, “मैं उत्साहित था, लेकिन बहुत ज्यादा उलझन में भी था.”
रोज का सफर घंटों लंबा होता था और कॉलेज की प्रक्रियाएं समझना भी मुश्किल लगता था.
इसी दौरान ASAP के सदस्यों ने प्रवेश और साहिल को दिल्ली में बसने में मदद की. सीनियर छात्रों ने उन्हें एडमिशन की प्रक्रिया समझाई, दूसरे छात्रों से मिलवाया और कैंपस के पास सस्ता रहने का इंतज़ाम ढूंढने में मदद की. यह शुरुआती मदद एक तरह से संगठन से जुड़ने का जरिया भी बन गई.
साहिल ने कहा, “इससे हमें प्रेरणा मिली. हमने सोचा कि अगर यहां आने पर किसी ने हमारी मदद की, तो हमें भी दूसरों के लिए वही करना चाहिए.”
बाद में दोनों अपने कॉलेज राजधानी कॉलेज के जरिए ASAP में सक्रिय हो गए, लेकिन दोनों राजनीति को लंबे समय का करियर नहीं मानते.
प्रवेश ने कहा, “हम नेता नहीं बनना चाहते. हम बस अभी अपने आसपास का माहौल बेहतर करना चाहते हैं.”
अब उनका ज्यादातर काम शांत तरीके से होता है. इसमें ज्यादा शोर-शराबा नहीं होता. इसका फोकस लोगों से व्यक्तिगत जुड़ाव बनाने पर है. वे अलग-अलग कैंपस में जाते हैं, छात्रों से मिलते हैं, कैंटीन में बैठते हैं, शिकायतें सुनते हैं और उन्हें सीनियर सदस्यों तक पहुंचाते हैं. ज्यादातर दिनों में उनका काम भाषण देने से ज्यादा अपनी मौजूदगी बनाए रखने का होता है — लोगों को पहचानना, बातचीत करना और यह सुनिश्चित करना कि पहले साल के छात्रों को पता हो कि परेशानी आने पर किसे फोन करना है.
राजधानी कॉलेज में, जहां हाल के वर्षों में एबीवीपी का दबदबा रहा है और डूसू चुनावों में उसकी पकड़ मजबूत हुई है, वहीं एक हजार से ज्यादा सदस्यों के बावजूद ASAP की मौजूदगी अभी भी छोटी है और वह धीरे-धीरे अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है.
कॉलेज स्तर की छात्र राजनीति पर अनौपचारिक स्थानीय गुटों और चुनावी समूहों का भी असर होता है. राजधानी कॉलेज में छात्र टीएम एनिमल और टीम वीर जैसे समूहों का ज़िक्र करते हैं — ये कॉलेज लेवल के ग्रुप्स हैं जो चुनावों के दौरान बड़े छात्र संगठनों के साथ जुड़ जाते हैं. छात्रों के मुताबिक टीम वीर का संबंध ASAP से है, जबकि टीम एनिमल अलग-अलग समय पर एनएसयूआई समर्थक छात्रों के साथ जुड़ा रहा है. एबीवीपी की अपनी अलग मौजूदगी है.
दोनों छात्र कैंपस चुनावों में बढ़ती “पैसे की ताकत” और “बाहुबल” की राजनीति की भी आलोचना करते हैं, जो अक्सर सिर्फ चुनावों तक सीमित रहती है.
प्रवेश ने कहा, “कुछ लोग सिर्फ चुनाव के समय आते हैं और अचानक पार्टियां देने लगते हैं, बड़े-बड़े कैंपेन चलाते हैं. लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद कोई संपर्क नहीं रहता.”
यह आलोचना ऐसे समय में सामने आई है जब एबीवीपी डूसू राजनीति में सबसे मजबूत ताकत बनकर उभरी है और पिछले एक दशक में लगातार छात्र संघ चुनाव जीतती रही है. इससे एनएसयूआई का पुराना मजबूत आधार भी काफी कमजोर हुआ है. पिछले दस वर्षों में कांग्रेस के छात्र संगठन ने डूसू अध्यक्ष पद सिर्फ दो बार जीता है — 2017 और 2024 में.
इसके बजाय, दोनों का कहना है कि लगातार व्यक्तिगत जुड़ाव ज्यादा मायने रखता है.
प्रवेश ने कहा, “अगर कोई पूरे साल छात्रों से बात करे और उनकी व्यक्तिगत मदद करे, तो छात्र उसे याद रखते हैं.”
इन दोनों नए छात्रों के लिए राजनीति इसलिए मायने रखने लगी क्योंकि इससे रोजमर्रा की छात्र समस्याओं को हल करने का रास्ता मिला, न कि विचारधारा या चुनावों की वजह से.
प्रवेश ने कहा, “जब हम पहली बार यहां आए थे, तब हमें भी लगता था कि राजनीति गंदी और बेकार है. लेकिन फिर हमने देखा कि छात्र फीस, रहने की जगह, सफर और क्लासों जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. तब हमें समझ आया कि अगर छात्र खुद अपनी आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो कोई और नहीं उठाएगा.”
Gen Z के लिए नई पहचान
ASAP के कई छात्र नेताओं के लिए यह संगठन एक तरफ पुरानी राजनीति की निरंतरता है, तो दूसरी तरफ एक नई शुरुआत भी. छात्र नेता अयान राय समेत कई सदस्य पहले सीवाईएसएस से जुड़े हुए थे.
राय ने कहा कि ASAP शुरू करने का फैसला तब लिया गया जब पार्टी को एहसास हुआ कि पिछले कुछ वर्षों में छात्र राजनीति और छात्र दोनों काफी बदल चुके हैं.
उन्होंने कहा, “सीवाईएसएस की विचारधारा भगत सिंह और आंबेडकर के इर्द-गिर्द थी, और हम उसी सोच के जरिए छात्रों की मदद करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अब हम उस स्तर पर जुड़ नहीं पा रहे थे.”
सीवाईएसएस ने 2015 और फिर 2018 में डूसू चुनाव लड़ा था. दूसरी बार उसने वामपंथी संगठन AISA के साथ गठबंधन किया था, लेकिन कोई बड़ा पद नहीं जीत पाया. इसके बाद कैंपस में उसकी मौजूदगी धीरे-धीरे कम होती गई.
राय के मुताबिक सीयूईटी आने और कैंपस के बदलते माहौल के कारण छात्र राजनीति का एक नया तरीका जरूरी हो गया था, जो आज दिल्ली यूनिवर्सिटी में आने वाले जेन ज़ी छात्रों से जुड़ सके. करीब 15 साल पहले का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन, जिसने युवाओं को आकर्षित किया था, अब पुराना पड़ चुका है. पार्टी को जे़न ज़ी और ज़ेन एल्फा को जोड़ने के लिए नई भाषा और नया तरीका चाहिए था.
राय ने कहा, “केजरीवाल का विचार था कि ऐसा संगठन बनाया जाए जिससे जे़न ज़ी छात्र खुद को जोड़ सकें. अब कॉलेजों में आने वाली भीड़ और हर चुनाव के साथ होने वाली राजनीति काफी बदल चुकी है.”

उन्होंने कहा कि आज डीयू में आने वाले कई छात्र पारंपरिक कैंपस राजनीति से भी दूरी बना रहे हैं. डूसू चुनावों से जुड़ी हिंसा, दिखावा और बेहद पक्षपाती माहौल से वे परेशान हैं.
राय ने कहा, “आज कई ज़ेन ज़ी छात्र खुद को गैर-राजनीतिक बताते हैं. हम ऐसा संगठन बनाना चाहते थे जिससे वे फिर भी जुड़ सकें.”
पिछले एक साल में ASAP ने चुनाव-केंद्रित राजनीति की जगह मुद्दों पर आधारित अभियानों के जरिए छात्रों से जुड़ने की कोशिश की है. अब तक उसका सबसे बड़ा अभियान छात्रों के लिए मेट्रो किराए में 50 प्रतिशत छूट की मांग रहा है.
संगठन ने यूनिवर्सिटी फीस बढ़ने के मुद्दे पर भी काफी ध्यान दिया है. राय ने कहा कि ASAP सदस्यों ने अलग-अलग कॉलेजों में सर्वे किया ताकि यह समझा जा सके कि पिछले तीन साल में डीयू की कुछ फीस में करीब 91 प्रतिशत बढ़ोतरी को लेकर छात्रों की क्या राय है.
उन्होंने कहा, “हम 10-20 कॉलेजों में गए और छात्रों से पूछा कि क्या यह फीस बढ़ोतरी सही है. महंगाई इतनी नहीं बढ़ी है और न ही उस स्तर का विकास दिखाई दे रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर खराब है, प्रशासनिक समस्याएं हर जगह हैं, पेपर देर से होते हैं, गलत रिजल्ट आते हैं. ऐसे में छात्र पूछ रहे हैं कि आखिर वे पैसे किस चीज के लिए दे रहे हैं.”
ASAP की कोर सदस्य ईशना गुप्ता का कहना है कि कई युवा छात्र DUSU राजनीति की आक्रामक और दिखावे वाली संस्कृति से निराश हो चुके हैं. “ज़ेन ज़ी बहुत समझदार है. वे इस तरह की राजनीति को खारिज कर रहे हैं.”
साथ ही उनका कहना है कि राजनीतिक भागीदारी सिर्फ चुनाव और भाषणों तक सीमित नहीं रह सकती.
उन्होंने कहा, “अगर आप स्प्रेडशीट बनाने में अच्छे हैं, तो उसी के साथ आइए. अगर आप मीम बनाने में अच्छे हैं, तो उसी के साथ आइए. ASAP बिल्कुल ऐसा ही मंच है.”
AAP का समर्थन
जब अरविंद केजरीवाल ने 20 मई 2025 को ASAP लॉन्च किया, तब उन्होंने इसे कैंपस में एक “वैकल्पिक” राजनीतिक संस्कृति बनाने की कोशिश बताया. उनका कहना था कि यह छात्र राजनीति में दिखने वाली पैसे और व्यक्तित्व आधारित राजनीति से अलग रास्ता होगा.
लॉन्च के दौरान केजरीवाल ने कहा था, “ASAP के जरिए हम भारत के कॉलेजों में ऐसा माहौल बनाएंगे जो लोगों को वैकल्पिक और मुख्यधारा की राजनीति के फर्क पर सोचने के लिए मजबूर करेगा… एक नई पीढ़ी उभरेगी, जो देश के लिए काम करेगी और राजनीति की परिभाषा बदल देगी. आज राजनीति को गंदा शब्द माना जाता है — हम इसे बदलेंगे.”
संगठन को AAP के वरिष्ठ नेताओं का मजबूत समर्थन मिलता दिखाई देता है. पार्टी के कई नेता इसे पिछले साल दिल्ली में चुनावी हार के बाद युवाओं तक दोबारा पहुंच बनाने के लिए अहम मानते हैं. ASAP के छात्र नेताओं का कहना है कि वरिष्ठ AAP नेता सिर्फ समर्थक नहीं, बल्कि संगठन के मुख्य ढांचे के सीधे मार्गदर्शक भी हैं.
सदस्यों के अनुसार ASAP की योजना बनाने में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सक्रिय भूमिका रही, जिनमें दिल्ली के पूर्व मंत्री और AAP दिल्ली इकाई के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज और AAP विधायक संजीव झा शामिल थे. संजीव झा ने AAP के पुराने छात्र संगठन को खड़ा करने में भी अहम भूमिका निभाई थी.
पूर्व AAP विधायक सोमनाथ भारती के अनुसार छात्र संगठन को दोबारा शुरू करना सिर्फ पार्टी के लिए ही नहीं, बल्कि इसलिए भी जरूरी था क्योंकि कैंपस की राजनीतिक संस्कृति तेजी से बदल रही थी.
उन्होंने कहा, “AAP ने दिल्ली के स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा को प्राथमिकता दी है, क्योंकि जब तक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक राजनीतिक और सामाजिक बदलाव संभव नहीं है. इसी वजह से ASAP बहुत महत्वपूर्ण है.”
भारती का कहना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक बदलाव के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है. उनके मुताबिक यही ASAP का बड़ा उद्देश्य भी है.
AAP के नेता बार-बार इस छात्र संगठन को पारंपरिक चुनावी संगठन की तरह नहीं, बल्कि शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं पर आधारित पार्टी की राजनीति के विस्तार के रूप में पेश करते हैं. उनके अनुसार ASAP का काम कैंपस में भी उसी राजनीति को आगे बढ़ाना है — यानी शिक्षा, छात्र कल्याण और प्रशासनिक समस्याओं पर ध्यान देना, सिर्फ विचारधारा की राजनीति तक सीमित न रहना.
भारती ने कहा, “AAP की विचारधारा हमेशा मुद्दों की राजनीति करने की रही है. ASAP भी उसी रास्ते पर चलेगा.”
कैंपस से आगे
हालांकि, ASAP की बातचीत का मुख्य केंद्र छात्र मुद्दे हैं, लेकिन संगठन सोशल मीडिया के जरिए बड़े स्तर पर लोगों तक पहुंचने की भी कोशिश कर रहा है. “If not you, then who? If not now, then when?” बायो वाले ASAP के इंस्टाग्राम अकाउंट पर 3,000 से ज्यादा फॉलोअर्स हैं. यहां संगठन नियमित रूप से कैंपस मुद्दों, विरोध प्रदर्शनों और मौजूदा राजनीतिक घटनाओं से जुड़ी पोस्ट डालता है, ताकि चुनावी समय से बाहर भी छात्रों से जुड़ाव बना रहे.
इस कंटेंट में विरोध प्रदर्शन के वीडियो, ASAP के कार्यक्रमों की कवरेज और छात्रों को प्रभावित करने वाले विवादों और प्रशासनिक समस्याओं को समझाने वाले छोटे वीडियो शामिल होते हैं. संगठन की कई रील्स — खासकर वे जिनमें सदस्य खुद कैमरे पर मुद्दे समझाते हैं — लाखों व्यूज तक पहुंच चुकी हैं. कुछ वीडियो को पांच लाख से ज्यादा बार देखा गया.
55,000 से ज्यादा व्यूज पाने वाली एक रील में ASAP नेता अयान राय गार्गी कॉलेज की घटना के बारे में बताते नज़र आते हैं. वीडियो में टकराव के दृश्य, एआई से बनी तस्वीरें और एबीवीपी के महिला सशक्तिकरण के दावों की आलोचना करने वाले टेक्स्ट दिखाए गए थे. इस रील में इस घटना को महिला कॉलेजों में सुरक्षा और डर के माहौल से जुड़े बड़े मुद्दे के रूप में दिखाया गया. कमेंट सेक्शन में कई लोगों ने छात्रों से ज्यादा राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की अपील की.
एक दूसरी रील छात्र आंदोलन को भावनात्मक और प्रेरणादायक तरीके से दिखाने की कोशिश करती है. Fleetwood Mac के लोकप्रिय गाने Silver Springs के साथ बनाए गए इस वीडियो में विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी और कैंपस के दृश्य दिखाए गए हैं. वीडियो में लिखा था: “20 की उम्र में लोग आपको कहेंगे कि विरोध प्रदर्शन मायने नहीं रखते और राजनीति से दूर रहो. उनकी मत सुनो. सामने आओ. अपनी राजनीति चुनो.”

दूसरे वीडियो रोजमर्रा की छात्र परेशानियों पर केंद्रित हैं — जैसे सफर का खर्च, फीस बढ़ोतरी, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक देरी. इनमें से कई वीडियो कॉलेज गेट के बाहर शूट किए गए हैं, जहां ASAP सदस्य और छात्र सीधे कैमरे से बात करते हुए छोटे और तेज “इश्यू एक्सप्लेनर” वीडियो बनाते हैं. कुछ वीडियो संगठन की रोज की गतिविधियां भी दिखाते हैं — जैसे विरोध मार्च, क्लासरूम कैंपेन और छात्र बैठकें.
राय के अनुसार छात्र राजनीति सिर्फ क्लासरूम और कैंपस तक सीमित नहीं रह सकती. पिछले एक साल में ASAP के सदस्य प्रदूषण, एनईपी, परीक्षा में गड़बड़ी और अलग-अलग यूनिवर्सिटियों में हुई कैंपस हिंसा जैसे मुद्दों पर हुए प्रदर्शनों में भी शामिल हुए हैं.
उन्होंने कहा, “कैंपस राजनीति और मुख्यधारा की राजनीति अलग हैं, लेकिन छात्रों को यह भी पता होना चाहिए कि उनके आसपास क्या हो रहा है. हम चाहते हैं कि छात्र राजनीतिक रूप से जागरूक हों, राजनीति से कटे हुए नहीं.”
राय ने कहा कि ASAP की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उन छात्रों को जोड़ना है जो राजनीति को बेकार, नकारात्मक या पूरी तरह दूर रहने वाली चीज़ मानते हैं. कई युवा खुद को “गैर-राजनीतिक” बताते हैं. ASAP नेता इसे मुख्यधारा की राजनीति से निराशा का नतीजा भी मानते हैं और एक ऐसा खालीपन भी जिसे वे भरने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “अगर लोग कहें कि वे गैर-राजनीतिक हैं और सरकार क्या कर रही है इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता, तो भ्रष्टाचार कभी खत्म नहीं हो सकता. राजनीतिक जागरूकता ही आपका भविष्य तय करती है.”
भीड़भाड़ वाली छात्र राजनीति
हालांकि, ASAP के सदस्य कहते हैं कि रोजमर्रा के छात्र मुद्दों पर उनका फोकस उन्हें दूसरे छात्र संगठनों से अलग बनाता है, लेकिन कैंपस में यह पहचान बनने में अभी समय लग रहा है. दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति लंबे समय से एबीवीपी, एनएसयूआई और वामपंथी संगठनों जैसे एसएफआई और AISA के इर्द-गिर्द ही देखी जाती रही है.
ASAP ने पिछले साल डूसू चुनाव नहीं लड़ा था. राय मानते हैं कि इससे संगठन की पहचान बनने की रफ्तार धीमी हुई.
राय ने कहा, “लोग अब नाम पहचानने लगे हैं, लेकिन इसमें समय लगेगा. एबीवीपी और एसयूआई दशकों से मौजूद हैं. ASAP नया संगठन है. छात्रों को यह समझाने में कि हम किसके लिए खड़े हैं, कम से कम दो से तीन साल लगेंगे.”
इसके बावजूद, राय का दावा है कि पहले ही साल में ASAP की सदस्य संख्या हजार से पार हो गई है. इसमें ऐसे छात्र भी शामिल हैं जो पहले दूसरे छात्र संगठनों से जुड़े हुए थे.
हालांकि, दूसरे छात्र संगठनों के सदस्य कहते हैं कि कैंपस में ASAP की असली मौजूदगी अभी काफी सीमित है. उनके मुताबिक एबीवीपी, एनएसयूआई और एसएफआई-एआईएसए जैसे वामपंथी संगठन अभी भी दिल्ली यूनिवर्सिटी की बड़ी राजनीतिक संस्कृति को तय करते हैं, जबकि ASAP अभी तक एक साफ और मजबूत संगठनात्मक आधार भी नहीं बना पाया है.
स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के एक सदस्य ने कहा कि ऐसे संगठन का उभरना, जो खुद को साफ वैचारिक रूप से पेश नहीं करता, ऐसे समय में चिंताजनक है जब दक्षिणपंथी राजनीति पहले से कैंपस में मजबूत पकड़ बनाए हुए है.
एसएफआई सदस्य ने कहा, “किसी साफ राजनीतिक विचारधारा के बिना कैंपस को गैर-राजनीतिक बनाने की कोशिश छात्रों को गुमराह कर सकती है. उनकी मौजूदगी अभी बहुत कम है और वे अभी तक डीयू की बड़ी राजनीति में जगह नहीं बना पाए हैं. हमें देखना होगा कि आने वाले DUSU चुनावों में वे कैसे काम करते हैं और क्या वे भी आगे चलकर पैसे और बाहुबल की राजनीति का सहारा लेते हैं.”
एनएसयूआई के रौनक खत्री ने ASAP को “गंभीर छात्र संगठन नहीं” बताया और कहा कि पहले साल में उसका कोई बड़ा असर नहीं दिखा है.
पूर्व डूसू अध्यक्ष ने कहा, “जब छात्र राजनीति की जगह पहले से ही भरी हुई है और संगठनों को एबीवीपी के खिलाफ एकजुट होना चाहिए, तब हम सब अलग-अलग काम कर रहे हैं. अगर हर कोई अलग-अलग लड़ता रहेगा, तो कुछ भी बड़ा नहीं होगा.”
ASAP ने शुरुआत में पिछले साल डूसू चुनाव लड़ने में रुचि दिखाई थी, लेकिन बाद में चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया. कई विरोधी संगठन इसे ASAP की कमजोर जमीनी तैयारी का सबूत मानते हैं.
एबीवीपी की एक सदस्य ने कहा कि ASAP शुरू करने का मुख्य उद्देश्य दिल्ली विधानसभा चुनाव हारने के बाद AAP की दिल्ली में मौजूदगी बनाए रखना था.
उन्होंने कहा, “अगर आप सिर्फ चुनाव के समय छात्र राजनीति में आते हैं, तो वह छात्र आंदोलन नहीं होता. वे असल में AAP की राजनीतिक युवा शाखा हैं और कैंपस के असली छात्र मुद्दों से उनका बहुत कम संबंध है.”
मुख्यधारा की राजनीति की ओर
ASAP के कुछ सदस्यों के लिए छात्र संगठन का काम अब मुख्यधारा की राजनीति में जाने का रास्ता बनने लगा है और यह सिर्फ कैंपस मुद्दों तक सीमित नहीं है. जमरूदपुर गांव की भीड़भाड़ वाली गलियों में एक बुजुर्ग व्यक्ति एक छोटे से दफ्तर में झांककर मदद मांगते हैं. उनके पोते का स्कूल एडमिशन अटका हुआ है क्योंकि बच्चे का अभी तक आधार कार्ड नहीं बना है. अंदर बैठे दो युवा वॉलंटियर उनका फोन नंबर ध्यान से लिखते हैं और बताते हैं कि अगले हफ्ते वे आधार कैंप लगाने वाले हैं. वे भरोसा दिलाते हैं कि सारी जानकारी तय होने के बाद उन्हें फोन किया जाएगा.
25 साल की ASAP सदस्य ईशना गुप्ता के लिए यही जमीनी स्तर की अच्छी राजनीति है. गुप्ता ने पिछले साल ग्रेटर कैलाश से एमसीडी का उपचुनाव लड़ा था. वह जिस दफ्तर से काम करती हैं, वही आम आदमी पार्टी सेवा केंद्र के रूप में भी इस्तेमाल होता है. यहां लोग दस्तावेज, एडमिशन, आवेदन और सरकारी सेवाओं से जुड़ी मदद लेने नियमित रूप से आते हैं.
गुप्ता ने कहा कि हर दिन करीब 10 से 15 लोग अलग-अलग समस्याएं लेकर आते हैं. इनमें से कई लोग निजी साइबर कैफे में साधारण कागजी काम के लिए मांगे जाने वाले ज्यादा पैसे नहीं दे सकते. उन्होंने कहा कि हफ्ते में पांच दिन दफ्तर में बैठने से लोगों को सीधे काम होता हुआ दिखाई देता है.

पिछले साल एमसीडी पार्षद चुनाव गुप्ता की मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में पहली एंट्री थी और छात्र आंदोलन से पार्टी राजनीति की ओर एक बड़ा बदलाव भी. दिल्ली में छात्र राजनीति लंबे समय से भविष्य के नेताओं की तैयारी का मंच रही है. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी पहले एबीवीपी और डूसू से जुड़ी थीं और बाद में नगर निगम और फिर राज्य राजनीति में गईं.
लेकिन ईशना गुप्ता के लिए राजनीति का असली मतलब अब भी सामाजिक काम ही है. सक्रिय राजनीति में आने से पहले वह दिल्ली की वंचित बस्तियों में लैंगिक समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर काम करती थीं. उनका कहना है कि इसी काम के दौरान उन्हें समझ आया कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी सरकार और राजनीतिक फैसलों से कितनी गहराई से प्रभावित होती है. यही अनुभव उन्हें राजनीति की ओर ले गया.
उन्होंने कहा, “राजनीति कभी मेरा प्लान नहीं थी. लेकिन जितना ज्यादा मैंने लोगों के साथ काम किया, खासकर झुग्गी बस्तियों में, उतना ज्यादा मुझे महसूस हुआ कि कम से कम 90 प्रतिशत आबादी सीधे सरकार पर निर्भर है. राजनीति करने की इच्छा से ज्यादा, राजनीति करने की जरूरत मेरे सामने आ गई.”
ASAP ने कैंपस में छात्र राजनीति की परिभाषा को भी व्यापक बनाने की कोशिश की है. गुप्ता ने इंटर्नशिप सहायता, महिलाओं के लिए सेल्फ-डिफेंस वर्कशॉप, दिव्यांगजनों की पहुंच और झुग्गी बस्तियों व शहरी गांवों में सामाजिक काम जैसे अभियानों का जिक्र किया.
उन्होंने कहा, “चुनाव लड़ना छात्र राजनीति का एक हिस्सा है, लेकिन पूरी छात्र राजनीति सिर्फ वही नहीं है.”
फिलहाल ASAP दिल्ली की मजबूत और पुराने ढांचे वाली कैंपस राजनीति में एक नया संगठन है, जहां एबीवीपी और एनएसयूआई अब भी पहचान और चुनावी ताकत के मामले में आगे हैं. लेकिन गुप्ता और जमरूदपुर के छोटे से दफ्तर में काम करने वाले युवा वॉलंटियर्स के लिए राजनीति छोटी-छोटी मदद से शुरू होती है — जैसे किसी का फॉर्म भरवाना, एडमिशन दिलाना या सरकारी सेवा तक पहुंच बनवाना.
गुप्ता ने कहा, “मुझे लगता है कि जीत या हार से अलग, असली राजनीति यही है.”
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