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Wednesday, 15 July, 2026
होमएजुकेशनस्कूल, कॉलेज में POCSO, कंसेंट, बाल विवाह पर NEP-अलाइन्ड टीनएजर्स एजुकेशन हो शुरू: सरकारी पैनल

स्कूल, कॉलेज में POCSO, कंसेंट, बाल विवाह पर NEP-अलाइन्ड टीनएजर्स एजुकेशन हो शुरू: सरकारी पैनल

पिछले साल जून में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी समिति ने सिफारिश की है कि यह पढ़ाई छठी क्लास से चरणबद्ध तरीके से शुरू की जाए.

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नई दिल्ली: उम्र के हिसाब से बच्चों को सहमति (कंसेंट) और साइबर सुरक्षा जैसे विषय पढ़ाना, माता-पिता के लिए नियमित बातचीत और वर्कशॉप कराना, बच्चों को POCSO कानून और बाल विवाह रोकने वाले कानून की जानकारी देना—ये कुछ अहम सुझाव सरकार की ओर से बनाई गई एक विशेषज्ञ समिति ने दिए हैं. समिति ने कहा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत स्कूलों और कॉलेजों में किशोर शिक्षा (Adolescent Education) शुरू की जानी चाहिए.

पिछले साल जून में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी इस समिति ने यह भी कहा कि POCSO जागरूकता कार्यक्रमों को किशोर शिक्षा के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए. समिति ने सिफारिश की है कि यह पढ़ाई छठी क्लास से धीरे-धीरे शुरू की जाए. समिति के मुताबिक, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) यह कोर्स तैयार कर सकती है. साथ ही शिक्षकों को बच्चों की उम्र के हिसाब से इसे पढ़ाने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.

मई 2025 में जस्टिस अभय एस. ओका की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने केंद्र सरकार को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का आदेश दिया था. समिति को यह देखने के लिए कहा गया था कि आपसी सहमति से रिश्ते रखने वाले किशोरों की निजता के अधिकार से जुड़े मामलों में, खासकर POCSO कानून के तहत, क्या बदलाव की ज़रूरत है. कोर्ट ने केंद्र से यह भी कहा था कि POCSO कानून के बारे में जागरूकता बढ़ाने और किशोरों को इसकी जानकारी देने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा नीति पर विचार किया जाए. POCSO ऐसा कानून है, जो नाबालिग बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया है. इस कानून में नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने यौन संबंधों के लिए कोई अलग छूट नहीं है.

यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग तरह के मामले की सुनवाई के दौरान दिया था. इस मामले में पीड़िता नहीं चाहती थी कि POCSO कानून के तहत आरोपी को सज़ा मिले. महिला 14 साल की उम्र में अपनी मर्जी से घर छोड़कर 25 साल के आरोपी के साथ रहने चली गई थी. बालिग होने के बाद उसने उसी व्यक्ति से शादी कर ली और एक बच्चे को जन्म दिया. महिला का कहना था कि नाबालिग रहते हुए उसके और उस वयस्क व्यक्ति के बीच बने शारीरिक संबंध को वह अपराध नहीं मानती.

2023 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था और POCSO की विशेष अदालत की ओर से सुनाई गई 20 साल की सज़ा रद्द कर दी थी. राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. अगस्त 2024 में जस्टिस ओका की अगुवाई वाली पीठ ने हाई कोर्ट का फैसला पलटते हुए आरोपी को दोषी माना, लेकिन मई 2025 में इसी पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आरोपी को जेल की सजा से राहत दे दी.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से किशोर शिक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करने को कहा था. साथ ही यह भी कहा था कि इस पर विचार करने वाली समिति वरिष्ठ महिला वकील माधवी दीवान और लिज मैथ्यू के सुझावों को भी ध्यान में रखे. दोनों वकीलों ने इस मामले की सुनवाई के दौरान अदालत की मदद की थी. उनका कहना था कि किशोरों के आपसी सहमति वाले रिश्तों को अपराध मानना कई मामलों में पीड़िता और उसके परिवार के हित में नहीं होता.

सोमवार को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने समिति की रिपोर्ट देखी और इस विषय पर माधवी दीवान और लिज मैथ्यू की दलीलें सुनीं. अदालत ने अभी इस पर कोई राय नहीं दी और मामले की अगली सुनवाई किसी दूसरी तारीख के लिए टाल दी.

26 सदस्यीय समिति ने पिछले साल दिसंबर में अपनी सिफारिशें अंतिम करने से पहले इस विषय पर विस्तार से चर्चा की थी. नए पाठ्यक्रम के अलावा समिति ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के POCSO ट्रैकिंग पोर्टल को और मजबूत बनाने, ट्रेनिंग के लिए वर्कशॉप कराने और POCSO मामलों के लिए एक तय प्रक्रिया (एसओपी) बनाने का भी सुझाव दिया है. इसमें सभी संबंधित लोगों की जिम्मेदारियां तय करने की बात भी कही गई है.

समिति ने कहा कि अभी जो किशोर शिक्षा कार्यक्रम चल रहे हैं, उनमें सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया जाता है. नए कोर्स में NEP के मुख्य सिद्धांतों—समग्र विकास, सोचने-समझने की क्षमता और 21वीं सदी के जीवन कौशल को शामिल किया जाना चाहिए.

समिति ने कहा कि पढ़ाई चरणबद्ध तरीके से शुरू होनी चाहिए. उसके मुताबिक, शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को सुरक्षा, शरीर के अंग, साफ-सफाई और सेफ और अनसेफ टच जैसी बुनियादी बातें सिखाई जा सकती हैं. इसके बाद छठी से बाहरवीं क्लास के बीच अलग-अलग स्तर पर लैंगिक समानता, स्वास्थ्य और स्वच्छता, साइबर सुरक्षा, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य तथा उम्र के अनुसार यौन शिक्षा पढ़ाई जाए. उदाहरण के लिए, समिति का कहना है कि छोटी कक्षाओं के बच्चों को ‘सहमति’ (कंसेंट) का विषय न पढ़ाया जाए, बल्कि बड़ी कक्षाओं में इसे संवेदनशील तरीके से कानूनी और स्वास्थ्य के नजरिए से समझाया जाए.

कोर्स के अलावा समिति ने माता-पिता के लिए नियमित वर्कशॉप कराने की भी सिफारिश की है, ताकि उन्हें किशोर शिक्षा और POCSO कानून के महत्व के बारे में जागरूक किया जा सके. समिति के मुताबिक, ऐसी चर्चा स्कूलों में होने वाली अभिभावक-शिक्षक बैठकों (PTM) के दौरान कराई जानी चाहिए.

रिपोर्ट में कहा गया है, “किशोर शिक्षा का पाठ्यक्रम मुख्य रूप से प्रशिक्षित शिक्षक ही पढ़ाएं. बच्चों की सुरक्षा के क्षेत्र में काम करने का अच्छा अनुभव रखने वाले गैर-सरकारी संगठन शिक्षकों को ट्रेनिंग देने में मदद कर सकते हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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