नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) को ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले एक जोड़े को ‘नो-ऑब्जेक्टशन सर्टिफिकेट’ (एनओसी) जारी करने का निर्देश दिया है. इससे उनके गोद लिए बच्चे के लिए यात्रा से जुड़े दस्तावेज़ तैयार हो सकेंगे. यह आदेश ‘ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ इंडिया’ (ओसीआई) जोड़ों को दूसरे देशों में गोद लेने की प्रक्रिया में आने वाली सरकारी अड़चनों को दूर करने में मदद करेगा.
हाई कोर्ट का यह आदेश ‘हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट’ (HAMA) के तहत दूसरे देशों में गोद लेने की प्रक्रिया में कानूनी स्पष्टता लाता है. ऐसी प्रक्रियाएं तब रुकी हुई थीं जब CARA ने गोद लेने वाले जोड़ों को एनओसी देने से इनकार कर दिया था. इस ज़रूरी दस्तावेज़ के बिना, जोड़े गोद लेने की औपचारिकताएं पूरी नहीं कर पा रहे थे, जिससे उन्हें अपने गोद लिए बच्चे से दूर रहना पड़ रहा था.
CARA और ओसीआई के तहत गोद लेने वाले माता-पिता के बीच विवाद इस बात पर था कि HAMA के तहत गोद लेने के मामले में कौन सा नियम लागू होता है, जहां CARA का कहना है कि नियम 68 लागू होता है, वहीं जोड़े का कहना है कि नियम 69 लागू होता है.
नियम 68 के तहत, गोद लेने वाले जोड़ों को उस देश में सेंट्रल अथॉरिटी या अधिकृत विदेशी गोद लेने वाली एजेंसी (AFAA) से आवेदन के लिए स्पॉन्सरशिप लेनी होती है, जहां वे रहते हैं. नियम 69 के तहत, CARA की मंज़ूरी या NOC मिलने पर ऐसे माता-पिता बच्चे के लिए ज़रूरी वीज़ा और इमिग्रेशन मंज़ूरी के लिए उस देश में आवेदन कर सकते हैं, जहां वे गोद लेने के समय रह रहे होते हैं.
हालांकि, जस्टिस सचिन दत्ता का हाई कोर्ट आदेश ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले एक जोड़े की उस अपील पर आया था जिसमें उन्होंने CARA से NOC जारी करने का निर्देश देने की मांग की थी, लेकिन उम्मीद है कि यह आदेश सरकारी अड़चनों में फंसे ऐसे ही अन्य मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील धनुर धर ने दिप्रिंट से बात करते हुए हाई कोर्ट के आदेश का महत्व समझाया. उन्होंने कहा कि भले ही केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बार-बार बताया है कि HAMA के तहत गोद लेने की प्रक्रिया स्वतंत्र है और इसके लिए किसी विदेशी एजेंसी की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं है, लेकिन CARA के नियम इस बात को नहीं दर्शाते हैं.
धर ने कहा, “नियम 68, जिस पर CARA HAMA के तहत दूसरे देशों में गोद लेने के मामलों में ज़ोर देता है, उसके लिए विदेशी सेंट्रल अथॉरिटी से स्पॉन्सरशिप की ज़रूरत होती है. कई विदेशी देश HAMA के तहत गोद लेने की प्रक्रिया को मान्यता नहीं देते हैं या उसे स्वीकार नहीं करते हैं और CARA की NOC पर ज़ोर देते हैं, लेकिन नियमों का पालन करना असंभव हो जाता है क्योंकि CARA इस आधार पर एनओसी देने से इनकार करता रहता है कि गोद लेने वाले माता-पिता ने नियम 68 के तहत प्रक्रिया का पालन नहीं किया है, जबकि HAMA के तहत गोद लेने में यह अनिवार्य नहीं है.”
उन्होंने कहा कि रेगुलेशन 68 तभी लागू होगा जब कोई जोड़ा ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ के तहत किसी बच्चे को गोद लेता है, जिसमें पूरी तरह से अलग प्रक्रिया अपनाई जाती है.
उन्होंने कहा, “नतीजतन, परिवारों को अलग-अलग रहने के लिए मजबूर होना पड़ा; एक माता-पिता बच्चे के साथ भारत में रहते थे, जबकि दूसरा विदेश में काम करता था और सालों तक देशों के बीच आना-जाना करता था.”
जस्टिस दत्ता का 1 जुलाई का आदेश धर के क्लाइंट्स द्वारा 2025 में दायर एक याचिका पर आया था. उन्होंने हाई कोर्ट का रुख इसलिए किया था क्योंकि CARA ने रेगुलेशन 68 का हवाला देते हुए उन्हें NOC जारी करने से इनकार कर दिया था.
20 जून 2023 को जन्मे बच्चे को याचिकाकर्ताओं ने 27 जून 2023 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार गोद लिया था. याचिकाकर्ता ऑस्ट्रेलियाई नागरिक हैं और OCI के तौर पर रजिस्टर्ड हैं.
5 मार्च 2024 को HAMA के तहत गोद लेने का एक एग्रीमेंट (डीड) किया गया. 6 नवंबर 2024 को याचिकाकर्ता के नाम पर जन्म प्रमाण पत्र जारी किया गया, जिसमें जोड़े को गोद लेने वाले माता-पिता के तौर पर दर्ज किया गया.
12 मार्च 2025 को, माता-पिता ने NOC पाने के लिए CARA के पोर्टल ‘CARINGS’ के ज़रिए आवेदन किया. रेगुलेशन 68 का पालन न करने की वजह से 19 जून 2025 को इसे खारिज कर दिया गया.
बहस के दौरान, सीनियर वकील अरुंधति काटजू ने कोर्ट को बताया कि रेगुलेशन 68 का पालन करना असंभव था क्योंकि ऑस्ट्रेलियाई कानून HAMA के तहत किए गए गोद लेने की प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करता है. उन्होंने पिछले साल बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि HAMA के तहत करीबी रिश्तेदारों के बीच गोद लेने या ‘एक्सपैट्रिएट अडॉप्शन’ (प्रवासी द्वारा गोद लेने) के मामलों में रेगुलेशन 69 का पालन किया जाना चाहिए.
इसके बाद उन्होंने उस पत्र का ज़िक्र किया जो जोड़े को भेजा गया था और जिसमें उनके गोद लेने की प्रक्रिया को ‘एक्सपैट्रिएट’ कैटेगरी में रखा गया था.
यह देखते हुए कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार के ईमेल में जोड़े से यह सुनिश्चित करने को कहा गया था कि गोद लिया गया बच्चा ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश करने और रहने के लिए सभी इमिग्रेशन शर्तों को पूरा करता हो, जस्टिस दत्ता की बेंच ने कहा कि इस मकसद के लिए CARA की NOC ज़रूरी थी.
इसके बाद उन्होंने CARA को सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया और इस तर्क को खारिज कर दिया कि संबंधित देश (इस मामले में ऑस्ट्रेलिया) से स्पॉन्सरिंग लेटर के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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