भारत में भले ही आदर्श लोकतंत्र कभी नहीं रहा लेकिन अभी चीजें इस हद तक रसातल को पहुंच गई हैं कि भारत को न्यूनतम अर्थों में भी लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता.प्रतिस्पर्धी अधिनायकवाद बेहतर नाम है.
भारतीय राजनीति इतनी आकर्षक नहीं होती अगर इसकी राहें टेढ़ी-मेढ़ी न होतीं, इसकी खासियत यही है कि साफ-सपाट सी दिखने वाली किसी बात का भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं होता, किसी भी स्थिति को लेकर दावे के साथ नहीं कहा जा सकता-बेशक इसका कारण यही होगा.
ईडी अधिकारियों पर हमले के बाद संदेशखाली से शेख शाहजहां के भागने से टीएमसी बनाम बीजेपी युद्ध छिड़ गया. अब लगभग दो महीने बाद उनकी गिरफ्तारी ने हिरासत की लड़ाई शुरू कर दी है.
अगले कुछ महीनों में चुनाव अभियान यह दिखाएगा कि गिरफ्तारी के तुरंत बाद जिस व्यक्ति की बॉडी लैंग्वेज से घमंड और अति-आत्मविश्वास की बू आ रही थी, वह टीएमसी के लिए फायदेमंद रहा या नुकसानदायक.
मेरा मानना था कि गुप्त मतदान से छुटकारा मिलने से राज्यसभा चुनावों में खरीद-फरोख्त का खतरा समाप्त हो गया. लेकिन इस सप्ताह के सर्वेक्षणों से पता चलता है कि हमने अपने कुछ विधायकों की नैतिकता पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा किया.
अपने दोनों शासन काल में नरेंद्र मोदी मनमानी करने की जगह, बेहद संभलकर चल रहे हैं और अक्सर आम सहमति के बनने के इंतजार में वे अपने बड़े फैसलों को स्थगित कर देते हैं.
किसान को एमएसपी की गारंटी देने के ठोस तरीके पर आंदोलन की समझ परिपक्व हो चुकी है, देखना है कि सरकारी नौकरशाह, दरबारी मीडिया और किताबी अर्थशास्त्री उस मुकाम तक कब पहुंचते हैं.
किसानों की मांग की फेहरिश्त में स्वामीनाथन आयोग के फार्मूले के हिसाब से एमएसपी की कानूनी गारंटी करने की मांग शीर्ष पर है. कांग्रेस ने अभी जमीनी स्तर पर चल रहे एक ताकतवर संघर्ष के साथ अपने को जोड़ लिया है.