राजनीतिक दृष्टि से नरेंद्र मोदी अकेले हैं. वह निर्णय लेते हैं कि वह क्या करना चाहते हैं और किसे उच्च पद पर नियुक्त करना चाहते हैं. और वो कब क्या बोलेंगे इसका अंदाज़ा कोई नहीं लगा सकता.
रणनीतिक स्वायत्तता और डाटा की गोपनीयता जैसे कई मसलों पर भारत और ‘फाइव आइज़’ नामक गठबंधन के बीच असहमति हो सकती है, लेकिन सहमति के मुद्दों पर ज़ोर देकर वे साझा चुनौतियों से निबट सकते हैं.
प्रमुख दलों से कम से कम इतनी तो अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर एक दृष्टिकोण, एक रणनीति का खाका पेश करेंगे और सेना को बदलने की एक रक्षा नीति प्रस्तुत करेंगे.
पश्चिम बंगाल में मैंने कभी भी कम्युनिस्टों को लाल कपड़े पहनकर मतदान केंद्र पर जाते नहीं देखा, न ही टीएमसी को हरे कपड़े पहने और शायद भाजपा के किसी विरले नेता को भगवा पहनकर आते हुए देखा, लेकिन गुजरात से बिल्कुल अलग नज़ारा था, जहां मोदी और अमित शाह भगवा पहनकर वोट डालने पहुंचे थे.
सोनिया गांधी ने अमीरों को धमकी दिए बिना गरीबों की मदद करने का वादा किया. राहुल गांधी ने उस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया और समय में पीछे चले गए हैं: अपनी दादी इंदिरा गांधी की बयानबाजी की ओर.
दूसरे चरण की तरह, 2024 के लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए की समस्या यह है कि उसके पास बचा के रखने के लिए बहुत सारी सीटें - कुल 93 सीटों में से 80 सीटें - हैं