प्रधानमंत्री मोदी को मंत्रियों को यह संकेत देना चाहिए कि चाटुकारिता या ‘मोदी भक्ति’ काम का विकल्प नहीं है क्योंकि यह ब्रांड मोदी को नुकसान पहुंचा रहा है.
सैन्य मामले में भारत और चीन के बीच अंतर मुख्यतः इलेक्ट्रोनिक तथा साइबर युद्ध के क्षेत्र में, और विमानों तथा जमीन से दागे जाने वाले पीजीएम की क्षमता और संख्या के मामले में है.
तमाम लोकतांत्रिक देशों में ‘डीप स्टेट’ आज साजिश के आरोपों को जन्म दे रहा है. इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई और अब भारत भी इसमें तेजी से आगे बढ़ रहा है. कई यूरोपीय देश भी इस कारवां में शामिल हो रहे हैं.
जब आप किसी की कही गई बात से सहमत होते हैं तो उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करना आसान होता है. लेकिन जब आप असहमत होते हैं तब भी उसके लिए लड़ना ज़्यादा ज़रूरी होता है.
भारत जैसे देशों के लिए, यह बहुत बड़ा जोखिम है. हाइड्रोकार्बन के बाद की वैश्विक अर्थव्यवस्था में भाग लेने के लिए, देश को कांगो के खनिजों तक सुरक्षित और निष्पक्ष पहुंच की आवश्यकता है.
केजरीवाल और ‘आप’ समाप्त नहीं, तो ध्वस्त तो हो ही चुके हैं. वैसे, हारने के बाद भी उनके पास अभी पंजाब जैसा बड़ा राज्य है, दिल्ली का नगर निगम है और 43 प्रतिशत वोट हैं.
चीन के समान मॉडल को अपनाते हुए, भारत को अपने सशस्त्र बलों में परिवर्तन करना चाहिए ताकि वह 2035 तक बीजिंग को चुनौती देने की स्थिति में आ सके तथा 2047 तक सैन्य शक्ति में उसकी बराबरी कर सके.
वर्तमान बांग्लादेश को हेमलेट की तरह ही उस सवाल का सामना करना होगा जो उसे परेशान करता था. 1971 में 75 मिलियन सपनों से जन्मा बांग्लादेश बनना है या नहीं? या उसका व्यंग्य?