भारत के आधुनिक इतिहास के सबसे चमकदार व्यक्तियों में से एक जयपाल सिंह मुंडा को जिस फ्रेम में समझने की कोशिश होती है, वही गलत है. उन्हें समझने के लिए आदिवासियत को समझना होगा.
सबरीमाला में महिलाओं ने उन धर्मांध, पितृसत्तावादी संगठनों को उन्नीस साबित कर डाला है, जो सुप्रीमकोर्ट के आदेश के बावजूद उनके भगवान अयप्पा के मंदिर में प्रवेश की राह में आ रहे थे.
बांग्लादेश में एक मज़बूत राजनीतिक ताक़त की मौजूदगी भारत के लिए बढ़िया है, ख़ास कर जब उसकी कमान नई दिल्ली से सहयोग करने वाली एक व्यक्ति के हाथों में हो.
बिहार के मुख्यमंत्री के भाषणों में ही नहीं, बिहार में भी ‘सुशासन’ गायब है. वहां मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं. अब वे सुशासन का नाम लेने से बचते हैं.
बीजेपी सहमति से ही तलाक का कानून पारित करा सकती थी, लेकिन अपने अहंकार से उसने ये रास्ता नहीं चुना. मुस्लिम महिलाओं के लिए न्याय का कानून नहीं बन पाएगा.
बड़ा सवाल यह है कि नितिन नबीन RSS के साथ कितनी सक्रियता से जुड़ेंगे. संघ को उनका नाम एक तय फैसले के तौर पर बताया गया—पुष्टि के लिए नहीं, सिर्फ जानकारी के लिए.