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Wednesday, 14 January, 2026
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मोदी जी, क्या आप जानते हैं कि हिंदू राष्ट्र पर बाबा साहेब के क्या विचार थे?

प्रधानमंत्री को आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए. कांग्रेस की आलोचना बाबा साहेब ने जरूर की है, लेकिन हिंदू धर्म, हिंदू राष्ट्र और हिंदू महासभा पर उनके विचार ज्यादा तीखे हैं.

नरेंद्र मोदी को मुलायम की शुभकामनाओं का उत्तर प्रदेश में कोई असर क्यों नहीं होगा

भले ही मुलायम समाजवादी पार्टी कुनबे के प्रमुख हों, पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में वह 2017 से ही अप्रासंगिक हैं.

सवर्ण गरीब अपने लिए उम्र और अटैंप्ट में छूट क्यों नहीं मांग रहे हैं?

सरकारी नौकरियों के लिए उम्र और अटैंप्ट में छूट दरअसल एससी, एसटी, ओबीसी को नौकरशाही और शिक्षा क्षेत्र में शिखर पर पहुंचने से रोकने में काम आती है. इसलिए सवर्ण गरीबों को ऐसी छूट नहीं चाहिए.

धारा 377 हटने के बाद समलैंगिकों के लिए कैसा है वैलेंटाइन डे

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक संबंध को अपराध मानने से इंकार कर, फैसला समुदाय के पक्ष में सुना दिया हो, लेकिन इनके हालात देख कर लगता है- पिक्चर अभी बाकी है.

पीएम को ‘चोर’ कहना बुरा, पर एक बार ‘चोर’ के नारेबाजी से ही सांसदों की जान बची थी

विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र के प्रधानमंत्री को सीधे चोर बोल देना छोटी बात नहीं है. हालांकि इससे पहले भी देश के प्रधानमंत्रियों को चोर कहा जा चुका है.

ख़तीजा रहमान ने क्या खुद तय किया है कि वे नकाब पहनेंगी?

महिलाएं कैसे कपड़े पहनेंगी, ये बचपन की ट्रेनिंग और संस्कृति के दबाव में तय होता है. कहने को वे खुद तय करती हैं, कि वे क्या पहनेंगी, लेकिन ये फैसला अक्सर पितृसत्ता का होता है.

भयंकर हादसों से मुंह फेर कब तक सोते रहेंगे हम?

उपहार और अब करोल बाग के होटल अर्पित पैलेस जैसे हादसे तो होते रहेंगे. मंडी, डबवाली के बाद अब देश करोल बाग हादसे को भी भुला देगा.

ओपिनियन पोल करने वाले भले इसे पसंद न करें, पर वे 2004 वाली भूल ही दोहरा रहे हैं

2019 के चुनावी पूर्वानुमान भी 2004 की प्रतिकृति साबित हो सकती है याद कीजिए जब अटल बिहारी वाजपेयी अपनी लोकप्रियता के चरम पर होने के बावजूद हार गए थे.

रॉबर्ट वाड्रा की रंगीन सोशल मीडिया प्रोफाइल, हमें उनके बारे में क्या बताती है

रॉबर्ट वाड्रा बीते सालों में जिस तरह से अपनी छवि का कायाकल्प किया है उसे देखकर ऐसा लगता है उन्होंने सलमान खान से कुछ टिप्स जरूर ली है.

पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश तक ‘विरोधियों’ को ‘रोकने’ की कवायदें काश, लोकतंत्र की फिक्र भी करे कोई!

अब हमारे लोकतंत्र के ढेर सारे खुदाई खिदमतगारों में से ज़्यादातर उसे जीवन दर्शन की तरह नहीं, सत्ता की सुविधा की तरह बरतते हैं.

मत-विमत

जेन-Z आंदोलन के बाद फिर पुरानी राजनीति, नेपाल की पार्टियां ‘स्टार्टिंग पॉइंट’ पर लौटीं

एक स्थिर नेपाल के लिए आगे का रास्ता लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, समावेशी संवाद के जरिए राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने और कानून के शासन को बनाए रखने में है.

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राज ठाकरे के अदाणी पर हमला किए जाने से भाजपा को क्यों ठेस पहुंची: मनसे

मुंबई, 13 जनवरी (भाषा) महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने मंगलवार को सवाल उठाया कि नगर निकाय चुनावों के प्रचार के दौरान पार्टी अध्यक्ष राज...

लास्ट लाफ

सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.