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इलस्ट्रेशन-सोहम सेन/ दिप्रिंट
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किसी को वश में करने का सबसे कारगर उपाय क्या है— डर या प्यार? इस सवाल का बेहतर जवाब तो कोई मनोवैज्ञानिक ही दे सकता है. एक राजनीतिक स्तंभकार तो सिर्फ तथ्यों को जुटाकर उनमें से फंतासी और प्रोपगैंडा को अलग करके एक अहम बहस शुरू करने की कोशिश कर सकता है. हमारा मखौल अगर उड़ाया जाता है तो हम इसे सहजता से लेते हुए आगे बढ़ जाते हैं.

इस सप्ताह चीन ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अड़ंगा लगाकर भारत को जोरदार तमाचा लगा दिया. चीन ने इस प्रस्ताव पर न केवल चौथी बार अड़ंगा लगाया, बल्कि चीन की सरकारी या पार्टी-नियंत्रित मीडिया ने काफी जोशीली टिप्पणियों में भारत को कई नसीहतें भी दे डालीं.

सबसे अभद्र टिप्पणी कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में की गई. इसमें उग्र प्रदर्शन कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं की तस्वीर के साथ नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाया गया कि वे इस मामले का इस्तेमाल अपने चुनाव अभियान में फायदा उठाने के लिए कर रहे हैं. इस टिप्पणी का अपमानजनक समापन यह कहकर किया गया कि चीन भारत का मित्र तो है मगर उसके राष्ट्रवाद का बंधक नहीं है.


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इस तरह, चीन ने ‘वुहान भावना’ को पुनःपरिभाषित कर दिया है कि आपके यहां चुनाव की तैयारियों के बीच हमारी फौज अगर आपकी जमीन पर नहीं है, तो इसका मतलब यह है कि हमने सौदे की अपनी शर्तें अपने पास रखी हैं. बाकी के लिए पुराने नियम लागू मानिए.

चीन की इस दंभ आक्रामक अड़ंगेबाजी पर आईं दो प्रतिक्रियाएं अपने तेवर और आग्रह की वजह से काबिलेगौर लगती हैं. एक, भारत ने हास्यास्पद सावधानी से भरी हुई प्रतिक्रिया जाहिर की और चीन का नाम न लेते हुए ‘एक देश’ के प्रति सिर्फ ‘निराशा’ जाहिर की. दूसरी ओर, अमेरिका ने ऐसी कोई हिचक नहीं बरती और चीन का नाम लेते हुए भारत की कायरता के विपरीत ज्यादा सख्त बयान जारी किया.
मोदी सरकार की मर्दानगी गायब नहीं हुई है, वह बस चुनिंदा मामलों में उजागर होती है, जिसमें बुद्धि का प्रयोग शायद ही दिखता है.

चुनाव जब होने ही वाले हैं तब इस माहौल में भारत उग्र चीन के प्रति घबराहट भरा सम्मान प्रकट करता नजर आ रहा है, वहीं ट्रंप के दोस्ताना अमेरिका के खिलाफ स्वदेशी भावना से व्यापारिक जंग शुरू करता दिखता है. जो हमें नुकसान पहुंचाता है या अपमानित करता है उसको तो हम खुश करने में जुट जाते हैं क्योंकि हम उससे डर जाते हैं. लेकिन जो हमारे पक्ष में इसलिए बोलते हैं क्योंकि हम उन्हें प्यार करते हैं, उनसे हम लड़ाई करने लगते हैं.

जिसे हम ‘मोदी की विदेश नीति का सिद्धान्त’ कह सकते हैं, जिसने हमारी यह गत बना दी है उसकी पांच अज्ञानताओं को गिनाना यहां प्रासंगिक होगा—

1. रणनीतिक सहयोग हासिल करने के लिए बड़ा दिल चाहिए, यह समझ पाने की अक्षमता: एक परिचित अमेरिकावाद का सहारा लें तो कह सकते हैं कि रणनीतिक तौर पर अमेरिका हमारा प्रमुख सहयोगी रहा है. लेकिन, ट्रम्प से लेकर अमेरिकी प्रशासन के आला अधिकारियों में भारत को लेकर एक तरह की थकानभरी ऊब पैदा हो गई है. ट्रम्प को एक ढीठ बच्चा मान कर खारिज करना आसान लग सकता है, लेकिन क्या आप ऐसा करने का जोखिम उठा सकते हैं?

आप उनके ऊपर हंस सकते हैं कि वे हार्ले-डेविडसन मोटरबाइक पर भारतीय ड्यूटी के निर्धारण में उलझ जाते हैं, लेकिन वे व्यापार के प्रति आपके स्वदेशी अर्थशास्त्र वाले नजरिए को पागलपन और पाखंड कह सकते हैं. आयातित दवाओं और मेडिकल सामान पर शुल्कों में कटौती बेशक एक अच्छा नैतिक तथा राजनीतिक विचार है, लेकिन क्या आप अचानक कीमत नियंत्रण और आयात प्रतिबंध लागू कर सकते हैं?


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अमेरिका वाले यह देखकर हैरत में होंगे कि भारत ने उनकी एमेजन और वालमार्ट के खिलाफ जंग घोषित कर दी है, जबकि वह भारतीय ई-कॉमर्स और डिजिटल वित्तीय सेवाओं में चीनी निवेश का दिल खोलकर स्वागत कर रहा है.

पुलवामा के बाद अमेरिका ने जिस तरह भारत का समर्थन किया है वह प्रशंसनीय तो है मगर दोनों देशों के सम्बन्धों में और मोदी तथा ट्रम्प के निजी तालमेल में भी तनाव दिख रहा है. दोनों के बीच बातचीत नवंबर 2017 के बाद से नहीं हुई है, नवंबर 2018 में ब्यूनस एयर्स में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान बातचीत कराने की कोशिश नाकाम रही थी. ट्रम्प ऐसे शख्स हैं जिनकी निजी खीज को शांत नहीं किया गया तो वे फोटो खिंचवाने जैसी फालतू बातों में समय गंवाना पसंद नहीं करते. व्यापार के मोर्चे पर भारत ने अगर थोड़ी ‘छूट’ दे दी तो भी उसे खास नुकसान नहीं होगा.

ट्रम्प न तो भारत से अफगानिस्तान में सेना की मांग कर रहे हैं, न ही रूसी एस-400 मिसाइलें न खरीदने, या ईरान में चाबहार बन्दरगाह को बंद करने जैसी मुश्किल मांगें रख रहे हैं. वे केवल कुछ शुल्कों में रियायत की और बाकी मामले में सामान्य व्यापार की मांग कर रहे हैं.

स्मार्ट नेता खास तौर से अपने मित्रों से झगड़ने का फैसला सोच-समझकर करते हैं. मोदी ने ट्रम्प के साथ व्यापार के मामले में स्वदेशी वाला मोर्चा खोल कर गलती कर दी है. आखिर, ट्रम्प को भी अपनी घरेलू राजनीतिक मजबूरियों का ख्याल रखना होगा.

2. अक्खड़ बड़ी ताकतों का एकतरफा तुष्टीकरण करने की गलती : इसे इस तरह देखा जा सकता है— अमेरिका के साथ भारत का व्यापार जबकि 60 अरब डॉलर के मुनाफे का है फिर भी उसने उससे पंगा ले लिया है, मगर चीन के साथ उसका व्यापार ठीक उतने ही घाटे का है तो उसे भारत ने खुला रास्ता दे रखा है. चीनी माल के लिए भारतीय बाज़ारों को खोलने के पीछे मकसद यह रहा होगा कि आर्थिक मोर्चे पर उसे छूट दी गई तो चीन रणनीतिक मोर्चे पर हमारे प्रति नरम रुख अपनाएगा.
लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं है. दो साल पहले चीन डोकलाम में घुस आया. अब वह इस तरह का संदेश देता दिख रहा है कि आप जब चुनाव लड़ने जा रहे हैं तब हम अगर डोकलाम या चूमर में नहीं आ पहुंचे हैं तो आप हमें शुक्रिया कहिए, और वह भी चीनी फोन, नेटवर्क या ओपेरेटिंग सिस्टम पर. मोदी सरकार अमेरिका से तो सभी तरह की ‘रियायत’ मांग रही है जबकि चीन के लिए सभी ‘रियायतें’ देने को तैयार है.

3. व्यक्ति-केन्द्रित विदेश नीति चलाने की सनक : मोदी का कद भी है और करिश्मा भी, मगर यह उन तैयारियों और कार्यवाहियों की जगह नहीं ले सकता जो प्रोफेशनल कूटनीति के लिए जरूरी हैं, न ही इसके कारण आंतरिक विचार-विमर्श के जरिए नीतियों को दुरुस्त करने की जरूरत को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. अलग-अलग नेताओं की अलग-अलग व्यक्तिगत शैली और दृष्टिकोण हो सकते हैं.

सऊदी क्राउन प्रिंस को जोरदार झप्पी अच्छी लगती होगी और वे फटाफट फैसले करना पसंद करते होंगे, लेकिन शी जिनपिंग को इससे चिढ़ हो सकती है और वे इसे चापलूसी का रूप ले सकते हैं. इसके अलावा, वे देंग के बाद बेशक सबसे ताकतवर चीनी नेता हैं मगर बीजिंग में उनकी निजी ताकत वैसी नहीं है जैसी रियाद में मोहम्मद बिन सलमान की है या दिल्ली में मोदी की है. शी विभिन्न स्तरों वाली शक्तिशाली ‘सिस्टम’ के तहत काम करते हैं, जो मोदी के मंत्रिमंडल से कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करती है.


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अब यह साफ हो चुका है कि मोदी ने शी के साथ शुरू में जो लुभाऊ तौरतरीका अपनाया था, जिसे कि झियान, वुहान, और दूसरी जगहों पर भी दोहराया, उसका उलटा ही नतीजा निकला. ट्रम्प को गणतन्त्र दिवस पर आमंत्रित करने की गलती, नवाज़ शरीफ को गले लगाने की नाकाम कोशिश जैसे कदम पर्याप्त होमवर्क की कमी ही दर्शाते हैं.

4. आपकी अगली चाल की कीमत : राजनीति हो या कूटनीति, खेल और जुआ हो या युद्ध, आपकी अगली चाल का अंदाज़ा पहले लगाया तो यह आपके लिए महंगा पड़ता है. नरेंद्र मोदी इस मामले में चूक कर चुके हैं. विदेशी नेताओं को समझ में आ गया है कि उनकी निजी शैली क्या है; वे प्रचार, प्रशंसा और फोटो खिंचवाने आदि के कितने भूखे हैं. इन नेताओं को यह भी समझ में आ गया है कि यह सब उन्हें अपने घरेलू वोटरों को लुभाने के लिए जरूरी लगता है.

चीनियों को अब तक अच्छी तरह पता चल गया है कि चुनाव के पहले के महीनों में मोदी सीमा पर फिर कोई घुसपैठ पसंद नहीं करेंगे. चीनियों को यह भी समझ में आ गया होगा कि मोदी पाकिस्तान से तो छोटी-मोटी झड़प पसंद करेंगे जिसे वे अपनी जीत के दावों के साथ तुरंत निबटा सकें, लेकिन चीन के साथ वे ऐसी कोई चीज़ न तो शुरू कर सकते हैं और न खत्म कर सकते हैं. आपकी अगली चाल का अंदाज़ा पहले से लग जाए तो दूसरों को जवाब देने में आसानी हो जाती है. चीनियों ने इसमें पहल कर दी है.

पाकिस्तानियों ने भी कुछ चीज़ें तो समझ ही ली होंगी. उन्हें पता चल गया है कि किसी बड़े आतंकवादी हमले का तुरंत जवाब देना अब मोदी के लिए अपनी जनता के प्रति एक वादा बन गया है. सो, इसने उन्हें संकट खड़ा करके इस उपमहाद्वीप की ओर दुनिया का ध्यान खींचने का बहाना दे दिया है. उन्हें बस अपनी आइएसआइ को एक और वारदात करने का आदेश देने भर की जरूरत है. महान नेता वे होते हैं, जो खुद को ‘खेल’ का मोहरा नहीं बनने देते.

5. विदेश नीति और घरेलू नीति में घालमेल करने के खतरे: मोदी ने विदेश नीति संबंधी अपनी पहल और शिखर सम्मेलनों में अपनी भागीदारियों को अक्सर देश में अपनी छवि चमकाने का साधन बनाया है. उनकी इस प्रवृत्ति का सबसे पहले फायदा चीनियों ने उठाया. उन्हें पता था कि वे चुनावी मौसम में कोई घुसपैठ कतई नहीं चाहेंगे, सो उन्होंने वुहान में भारत को आश्वस्त तो किया मगर अपनी शर्तों पर.


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व्यापार में चीन का वर्चस्व बढ़ गया, अरुणाचल और पाकिस्तान के मसलों पर उसका नजरिया और सख्त हुआ, और मसूद अजहर के मामले में भारत चीन का नाम लिये बिना बस हल्का विरोध प्रकट करने को मजबूर दिखा. गौर कीजिए कि वुहान के बाद से भारत ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में सदस्यता का मसला चीन के सामने नहीं उठाया है. भारत अगर अजहर पर प्रतिबंध की मांग करता है तो यह दो काम कर बैठता है.

एक तो, इसने चीन के साथ द्विपक्षीय सम्बन्धों में भारत की हैसियत को घटा दिया है; दूसरे, इसने चीन को अपनी भारत नीति को अपनी पाकिस्तान नीति से जोड़ने में सक्षम बनाया है. यानी चीन ने भारत को वहां डाल दिया है जहां वह डालना चाहता था- पाकिस्तान-चीन-भारत के त्रिकोण के एक कोण पर.

अंत में, हमने यहां मोदी के पांच साल की विदेश नीति का कोई बैलेंसशीट प्रस्तुत करने की कोशिश नहीं की है. हमारी नज़र में उनकी जो अहम गलतियां रहीं और उनके जो नतीजे निकले, हमने बस उन्हें गिनाने की कोशिश की है.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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