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सोहम सेन का चित्रण | दिप्रिंट
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यह एक स्वयंसिद्ध मान्यता है कि पत्रकार लोग जब चुनाव नतीजे की भविष्यवाणी करते हैं तो वह प्रायः गलत ही हो जाती है. और जब सारे पत्रकार एक ही स्वर में बोलने लगते हैं तब तो इसे एकदम उलट नतीजे की गारंटी ही मान लीजिए. ओपीनियन पोल भी छलावा ही माने जाते हैं, लेकिन वे हम पत्रकारों से तो बेहतर ही हैं. लेकिन ये सब के सब एक ही तरह के नतीजे पर एकमत होते दिख रहे हों, तब क्या होगा?

इस हफ्ते कई ओपीनियन पोल के नतीजे सामने आए. वे सब एक बात पर पूरी तरह सहमत थे कि आज चुनाव हो जाए तो हमें त्रिशंकु लोकसभा मिलेगी, जिसमें भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होगी, कांग्रेस दूसरे नंबर पर होगी, लेकिन आकार में भाजपा की आधी. यानी एक बार फिर सच्ची खिचड़ी सरकार बनेगी.

वैसे, चुनाव में अभी तीन महीने बाकी हैं, और राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता. लेकिन हम कुछ महत्वपूर्ण संकेतों और रुझानों के आधार पर इन ओपीनियन पोल के नतीजों से मोटे तौर पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाल सकते हैं. अब इनमें कौन ठीक है, कौन गलत है, यह मैं आपकी राजनीतिक पसंद-नापसंद पर छोड़  रहा हूं.

सबसे मार्के का संकेत यह है कि भाजपा इस बार 2014 में मिले बहुमत से काफी पीछे रहेगी, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कुल मिलाकर जस की तस है. ‘इंडिया टुडे’ का ओपीनियन पोल कहता है कि भाजपा को 2014 में मिले 31 प्रतिशत वोटों के मुक़ाबले इस बार मात्र 1 प्रतिशत कम वोट मिलेंगे.

यह काबिले गौर संकेत है. मेरा मानना है कि उनके पुराने मतदाताओं में उल्लेखनीय मोहभंग की स्थिति है, लेकिन इसकी भरपाई करीब 13 करोड़ वे मतदाता कर देंगे, जो (आम तौर पर 1996 के बाद जन्मे हैं) लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट देंगे, और जो उनके अंधभक्त हैं.

बाकी मतदाताओं से वे इसलिए अलग हैं कि अभी वे रोजगार बाज़ार में नहीं उतरे हैं. राज्यों के चुनावों के दौरान अपनी यात्राओं में मैंने गौर किया कि वे अभी भी मोदी की ताकत और करिश्मे से सम्मोहित हैं, उनके कार्यक्रमों के प्रोपगेंडा पर यकीन करते हैं— चाहे वह ‘स्वच्छ भारत अभियान’ हो या ‘स्किल इंडिया’, भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध हो या दुनिया भर में भारत का चढ़ता ग्राफ. उनका अभी इनकी उलटी कहानी से या बेरोजगारी के कारण हताशा से सबका नहीं पड़ा है. ये मतदाता खाई के कगार पर पहुंचे मोदी/भाजपा के लिए सुरक्षा बाड़ बने हुए हैं.

मौजूदा वास्तविकता से ज्यादा फिसलन की जो गति है वह राजनीतिक माहौल का निर्माण कर रही है. जनवरी 2017 में नोटबंदी के ठीक बाद जब मोदी अपने चरम पर थे, जब ‘इंडिया टुडे’ के ओपीनियन पोल ने भाजपा को 305 और एनडीए को 360 सीटें दी थी, उसके बाद के हरेक ओपीनियन पोल के आंकड़ों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि गति पतन की ओर है. लुढ़काव बेशक तेज नहीं है लेकिन धीमा भी नहीं है. दो साल में एक तिहाई का ‘नुकसान’ दिख रहा है. अगर यही गति रही तो भाजपा को और 25 से लेकर 40 सीटों तक का घाटा हो सकता है. क्या मोदी इस गति पर विराम लगा सकते हैं, या इस उलट सकते हैं?

जरा कल्पना कीजिए कि भारतीय जनमत अपनी पूरी विविधता और जटिलता के साथ, एक महारथ के रूप में कैसा हो सकता है— विशालकाय, आदिमकालीन तकनीक से निर्मित, चर्रमर्र करता, जिसे लाखों लोग मिलकर ही चला सकते हैं, वह भी धीमी गति से. लेकिन एक बार जब इसे इसके कील-कांटे के बूते चला दिया जाता है तब इसकी दिशा को उलटना कठिन हो जाता है. यह फार्मूला तो याद ही होगा कि किसी वस्तु की गति उसके पिंड को उसके वेग के ‘स्क्वायर’ से गुणा करके हासिल की जाती है. मोदी जानते हैं कि इसकी दिशा को उलटना लगभग असंभव होता है.

इसलिए तमाम तरह के क्रांतिकारी, असंभव-से कार्यक्रमों की झड़ी लग गई है जिनमें ऊंची जातियों के लिए आरक्षण, निजी क्षेत्र में सबके लिए आरक्षण से लेकर ‘भ्रष्ट तथा ताकतवर’ लोगों के खिलाफ सीबीआइ छापे जैसे कदम तो हैं ही, अगले सप्ताहों में बजट से लेकर और भी घोषणाएं आने की उम्मीद है. मोदी और शाह को पता है कि उनका आंकड़ा 180 से नीचे गया तो उनके लिए दरवाजे बंद! अगर वे अगले 100 दिनों में इस महारथ की दिशा बदल सके तो यह सबसे बड़ी उपलब्धि होगी. इसलिए अगले कुछ दिनों में और भी हताशापूर्ण तथा उग्र घोषणाओं की पूरी उम्मीद रखिए.

यहां फिर से यह याद कर लीजिए कि उनके वोट वही 13 करोड़ मतदाता होंगे, जो पहली बार वोट देने जाएंगे और जिनके दिमाग एकदम साफ स्लेट की तरह हैं.

(3). अगर आप उत्तर प्रदेश और वहां बने सपा-बसपा गठबंधन को अलग निकाल दें तो यह सोच पाना मुश्किल है शेष भारत से भाजपा को पहले जितनी सीटें कैसे मिलेंगी. कई सर्वेक्षण बता रहे हैं कि यूपी में भाजपा को 45 से लेकर 55 सीटों का नुकसान हो सकता है. जाहिर है, 282 के इसके कुल आंकड़े में कटौती होने जा रही है. मध्य प्रदेश, राजस्थान, और गुजरात में विधानसभा के ताज़ा चुनावों में बेशक उसे झटके मिले, लेकिन ऐसा लगता है कि इन राज्यों में वह विपक्ष का सफाया भले न करे, अपना दबदबा बनाए रखेगी. उत्तर में कुछ नुकसान की भरपाई पूरब और उत्तर पूर्व से हो जाएगी. इसलिए यूपी ही उसे बहुमत से दूर रखने की वजह बन सकता है. क्या भाजपा के पास इसकी कोई तोड़ है? ऐसा कोई भावनात्मक मुद्दा, जो जातपांत से ऊपर उठाकर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कर दे?

(4). कांग्रेस में नई जान आ रही है. अपने मौजूदा आधार से उसे जो फायदा होता दिख रहा है वह भाजपा के नुकसान के मुकाबले काफी बड़ा है. वैसे, दोनों में फर्क यह है कि कांग्रेस का आधार काफी छोटा है. इसलिए उसे अगर 200 प्रतिशत की भी बढ़त मिले तो भी वह 140 से नीचे ही रहेगी. ताज़ा ऑपिनियन पोल उसे 100 से कुछ ज्यादा सीटें दे रहे हैं. अगर हम यह मान लें कि मोदी उलटी गति को उलट न पाए और यह मानते हुए पूरी उदारता से भी अनुमान लगाएं, तो भी कांग्रेस को कोई जोरदार फायदा होता नहीं नज़र आता.

इसके लिए सबसे बेहतर उम्मीद इसी बात से बंध सकती है कि उसने हाल में जिन तीन अहम राज्यों को जीता है उनमें मोदी को ज्यादा सीटें न जीतने दे. इसकी कुंजी 150 के आंकड़े में है. या तो यह अपने आंकड़े को यहां तक पहुंचाए या फिर मोदी को इस आंकड़े तक न पहुंचने दे. तीसरा उपाय यह हो सकता है कि वह यूपीए की छतरी को और बड़ा करे तथा क्षेत्रीय एवं जाति-आधारित दलों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में इसके नीचे लाए. तीनों उपाय फिलहाल तो पूरे होते नहीं दिखते. फिर भी, एक दूसरा ध्रुव तो भारतीय राजनीति में उभर ही आया है.

(5). पिछले हफ्ते इस स्तंभ में हमने तीसरे, और काल्पनिक चौथे तथा पांचवे मोर्चे की चर्चा की थी. अगर कुल 150 सीटें उन नेताओं के पाले में जाती हैं, जो न तो कांग्रेस से जुड़े हैं और न भाजपा से, तब ये नेता एक ‘महा समझौते’ के तहत प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद पाल सकते हैं. लेकिन यह एकदम असंभव है.

कांग्रेस या भाजपा को छोड़ कोई भी पार्टी 50 तो क्या, 40 के भी आंकड़े को छू नहीं सकती. ऐसे किसी ‘महा समझौते’ की कपोल कल्पना तभी सच हो सकती है जब कांग्रेस और भाजपा की कुल सीटों का आंकड़ा 272 से नीचे रह जाए. ऐसा न पहले कभी हुआ है और न इस मई में इसकी संभावना है. लेकिन 15 या उससे ज्यादा सीटें पाने वाला कोई भी नेता इतना ताकतवर बन सकता है कि वह बेल्लारी बंधुओं की तरह सीबीआइ और ईडी से सच्चरित्र होने का प्रमाणपत्र हासिल करने या अपने राज्य के लिए स्पेशल पैकेज लेने अथवा महत्वपूर्ण मंत्रालय की कमान थामने की सौदेबाजी कर सके.

गठबंधनों का अंतिम स्वरूप मुख्यतः इस बात से तय होगा कि आप किसे साथ नहीं ले पाते, न कि इससे कि आप किसे साथ ले पाते हैं. हमें मालूम है कि वाम पार्टियां और सपा एनडीए के साथ कभी नहीं जाएंगी, जैसे कि अकाली और शिवसेना यूपीए के साथ नहीं जाएंगी. अब जरा उन पर नज़र डालें, जो बीते दिनों में लचीला रुख अपना चुके हैं. ममता दोनों गठबंधनों के साथ रह चुकी हैं लेकिन आज बंगाल में उनका जो दबदबा है उसके कारण यह संभावना नगण्य है कि वे एनडीए की ओर लौटेंगी. 15 से ऊपर सीटें लाने वालों में ये सब अपने लिए विकल्प खुले रखेंगे— द्रमुक/अन्नाद्रमुक, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडु, तेलंगाना के केसीआर, जगन मोहन रेड्डी की वाइएसआरसीपी, और खुदा के लिए, सबसे तेज नीतीश कुमार. विचारधारमुक्त ये दल कुल 100 सीटों में भागीदारी कर सकते हैं और विजेता के साथ जा सकते हैं.

(6). इस मुकाम पर आकार हम मायावती की ओर लौटते हैं. अगर मोदी को दूसरे कार्यकाल से वंचित रहना पड़ता है तो यह भारतीय राजनीति में मायावती की अनूठी ताकत— वोट हस्तांतरित करने की उनकी विशेषता— के कारण ही होगा. अतीत में वे भाजपा के साथ खुशी-खुशी मेल कर चुकी हैं. वाम-दक्षिण संदर्भों में देखें तो वे पूरी तरह विचारधारमुक्त रही हैं. अगर मनुवाद विरोध ही उनकी एकमात्र विचारधारा है, तो एनडीए और यूपीए, दोनों ही उनके लिए जहर है, और यह जहर वे चाहें तो किसी भी प्याले से पी सकती हैं. मोदी और शाह को पता है कि उनकी दूसरी पाली की चाबी माया के फ़ैन्सी बटुए में पड़ी है. इसलिए ये दोनों साम-दाम-दंड-भेद, किसी भी उपाय से उन्हें चुनाव से पहले या उसके बाद अपने दुश्मनों से अलग करना चाहते हैं. इसकी उम्मीद नहीं है? आप इस संभावना को एकदम से खारिज भी नहीं कर सकते, भले ही इसका अर्थ यह हो कि कुल्हाड़ी को बाद में योगी आदित्यनाथ के पीठ पीछे ही दफन करना पड़े.

सार-संक्षेप यह कि मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और वोट बैंक कुल मिलाकर कायम है, लेकिन दिशा उलट रही है. यूपी का गठबंधन उनके दूसरे कार्यकाल पर वक्रदृष्टि डाल रहा है. कांग्रेस भी उभार पर है, बेशक बहुत ज्यादा नहीं; 15 या इससे ज्यादा सांसदों वाली पार्टी किंग भले न बने, किंगमेकर बन सकती है. 100 सीटें उन दलों के बीच बंटेंगी, जो विजेता के साथ जा सकते हैं. और, मायावती पर निगाह गड़ाए रहें.


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