यह समझने की जरूरत है कि आदिवासी इलाकों की राजनीति के मुद्दे देश के अन्य इलाकों से भिन्न होते हैं. आदिवासी राजनीतिक से ज्यादा, अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.
कांग्रेस के पास सवाल तो हैं, मगर सवालों के जवाब नहीं हैं, 'नेता' हैं मगर विजेता नहीं हैं. चुनाव के चंद सप्ताह पहले वह एक सदाचारी, व्यवस्था विरोधी एनजीओ की तरह पेश आ रही है, जो बस अपना फर्ज़ निभाने से मतलब रखता है.
सरकार रोजगार के 2014 के चुनावी वादे पर विफल हुई है. आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि बेरोजगारी बढ़ी है व पिछले 5 साल में ऑर्गनाइज्ड सेक्टर में रोजगार घटा है.
मंडल बांध परियोजना से 19 गांव के हजारों लोग विस्थापित होंगे. साढ़े तीन लाख पड़े कटेंगे. पर्यावरण को नुकसान होगा. ऐसी तमाम योजनाएं आदिवासियों के लिए विनाशकारी साबित हुई हैं.
औपनिवेशिक खुफिया तंत्र क्रांतिकारियों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि खतरे के रूप में दर्ज करता था. ऐसा करके उसने कई ज़िंदगियों को इतिहास से निष्कासित कर दिया.