भारत के बड़े शहर बदहाल हो रहे हैं, वे विशाल झोंपड़पट्टियों में तब्दील होते जा रहे हैं, और जब उन्हें सुधारने की कोशिश की जाती है तो ‘कोरल’ यानी मूँगे की चट्टानें आड़े आने लगती हैं जैसा कि मुंबई में हुआ.
अभिजात वर्ग अतिक्रमण करने वालों को संपत्ति अधिकार की व्यवस्था में अवरोधक मानता है, और अवैध बस्तियों को नियमित किए जाने का विरोध करता है. पर झुग्गियों में अंतर्निहित पूंजी को मुक्त करने के लिए नियमितीकरण ज़रूरी है.
बैंकिंग के क्षेत्र में जो तकनीकी बदलाव हो रहे हैं उनमें सरकारी बैंक पिछड़ गए हैं और बेहतर कामकाज वाले निजी बैंकों की तुलना में इनका ग्राहक पर ज़ोर कम रहता है.
शानदार काम करने वाले एक काल्पनिक पात्र, एक आईपीएस की जाति का जश्न जब बॉलीवुड मना सकता है तो एक वास्तविक किरदार की श्रेष्ठता पर उनकी जाति का जश्न बॉलीवुड क्यों नहीं मना पाया?
जो भी सच में सच्चाई जानना चाहता है, वह आसानी से उन कई घटनाओं को देख सकता है—कश्मीर से लेकर लखनऊ तक, जहां भारतीय मुसलमान आतंकवादी हमलों के खिलाफ सबसे आगे खड़े होकर आवाज़ उठाते रहे हैं.