Monday, 27 June, 2022
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अदालतों में न्यायाधीश और न्यायिक अधिकारी नहीं होना, न्यायालय और सरकार की चिंता का विषय

कई राज्यों में सरकार और उच्च न्यायालयों ने निचली अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर नियुक्ति की कवायद तेज कर दी है.

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लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र में नयी सरकार का गठन होने के साथ ही देश में अधीनस्थ न्यायपालिका के लिये अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की चर्चा फिर जोर पकड़ने लगी है. इस सेवा को भी अखिल भारतीय सेवा में शामिल करने के लिये 1976 में संविधान में किये गये 42वें संशोधन के बावजूद इस सेवा का सृजन आज भी मृग मरीचिका ही बना हुआ है. सरकार कहती है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन का एक उद्देश्य वकालत के क्षेत्र में मेधावी युवावर्ग को जिला स्तर पर न्यायाधीशों के पद पर नियुक्ति के लिये आकर्षित करना भी है, इसके बावजूद यह विषय चर्चा और योजना से आगे नहीं बढ़ सका.

अधीनस्थ अदालतों में तीन करोड़ से भी ज्यादा मुकदमे लंबित होना और इनके निबटारे के लिये पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश और न्यायिक अधिकारी नहीं होना लगातार उच्चतम न्यायालय और सरकार की चिंता का विषय बना हुआ है. शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप के बाद अधीनस्थ न्यायपालिका में रिक्त पदों पर नियुक्तियों के काम ने थोड़ी रफ्तार पकड़ी है.

इस बीच, संसद में हाल ही में पेश वर्ष 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी अदालतों में लंबित मुकदमों के तेजी से निबटारे के लिये निचली अदालत में 2,279 न्यायाधीशों के पदों के सृजन पर जोर दिया गया है. अधीनस्थ अदालतों में इस समय 22, 474 होने के बावजूद इसमें औसतन पांच हजार पद हमेशा ही रिक्त रहते हैं.


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निचले स्तर पर न्याय प्रदान करने की व्यवस्था में सुधार के लिये लंबे समय से देश में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की आवश्यकता महसूस की जा रही है. इस जरूरत को ध्यान में रखते हुये 1976 में संविधान में 42वां संशोधन करके इसे अनुच्छेद 312 में शामिल किया गया था और इसमें स्पष्ट किया गया था कि अनुच्छेद 236 में प्रदत्त जिला न्यायाधीश से नीचे के किसी भी न्यायिक पद को इसके दायरे में शामिल नहीं किया जायेगा, लेकिन इसके बावजूद इस दिशा में कोई विशेष प्रगति नहीं हो सकी है.

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केंद्र में नयी सरकार के गठन के बाद एक बार फिर अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के रिक्त पदों को भरने के लिये कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर विशेष जोर दे रहे हैं. उनका मानना है कि अब इस सेवा के सृजन का समय आ गया है.

रविशंकर प्रसाद का विचार है कि संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षा की तर्ज पर ही अधीनस्थ न्यायपालिका में रिक्त पदों के लिये परीक्षा का आयोजन किया जाये और न्याय प्रदान करने की व्यवस्था में पिछड़े और वंचित वर्ग के सदस्यों का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाये. सरकार इस सबंध में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और मुख्य मंत्रियों से परामर्श की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है.

अखिल भारतीय सेवाओं की तर्ज पर ही अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का विचार 1960 से चर्चा में है, लेकिन राज्य सरकारों और न्यायपालिका के भीतर से उठ रहे विरोध की वजह से यह परवान नहीं चढ पा रहा है.

न्याय प्रशासन में सुधार के बारे में विधि आयोग भी समय-समय पर अपनी रिपोर्ट में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन की सिफारिश करता रहा है.

उच्चतम न्यायालय भी अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन का पक्षधर है और उसने भी केन्द्र सरकार को इस संबंध में उचित कदम उठाने का निर्देश दिया था. परंतु राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय इससे सहमत नहीं हो रहे हैं.

मुख्य न्यायाधीशों के 1961, 1963 और 1965 में हुये सम्मेलनों में इस तरह की सेवा के सृजन के विचार का समर्थन किया गया. इसी सिलसिले में संविधान के अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन का प्रावधान भी किया गया था, लेकिन इसमें जिला न्यायाधीश से नीचे के न्यायिक पदों को इसके दायरे से बाहर रखा गया.

संसद की स्थाई समिति ने भी 13 साल पहले, मई 2006 में अपनी रिपोर्ट में जिले स्तर के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन की दिशा में तेजी से कदम उठाने की सिफारिश की.

केंद्र सरकार का प्रयास है कि करीब 60 साल से अधर में लटके अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के विचार को मूर्तरूप दिया जाये, लेकिन राज्यों का विरोध इसमें बाधक बन रहा है. इसकी वजह निचली अदालतों में स्थानीय भाषा में कामकाज की व्यवस्था है क्योंकि ऐसा महसूस किया जा रहा है कि अधीनस्थ न्यायपालिका के स्वरूप में बदलाव के साथ ही इसके कामकाज की भाषा में भी बदलाव होगा और यह आशंका ही इसमें बहुत बड़ी बाधा बन सकती है. ऐसी स्थिति में अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन कर देने के बाद भी अधीनस्थ न्यायपालिका में भाषाई समस्या से निपटना सरकार के लिये बहुत बडी चुनौती हो सकती है.

अनेक राज्यों ने दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता में प्रदत्त शक्ति का इस्तेमाल करते हुये अपने यहां निचली अदालतों में स्थानीय भाषा में ही कामकाज का प्रावधान कर रहा है, ताकि समाज के सभी वर्गों के लोग आवश्यकता पड़ने पर अदालती कार्यवाही को समझ सकें और उसके आदेशों तथा फैसलों को पढ़ सकें. मसलन, तमिलनाडु की अदालतों में तमिल, केरल में मलयाली, असम मे असमी भाषा और हिन्दी भाषी राज्यों की अदालतों में हिन्दी भाषा में कामकाज होता है.

ऐसी स्थिति एक सवाल यह भी है कि क्या इस सेवा के गठन के साथ ही निचली अदालतों में स्थानीय भाषाओं में मुकदमों की सुनवाई और इनके आदेश तथा फैसला लिखने और सुनाने की व्यवस्था का क्या होगा? क्या यह व्यवस्था समाप्त हो जायेगी? यदि ऐसा कोई भी प्रयास हुआ तो राज्यों में इसका पुरजोर विरोध होगा.


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एक सवाल यह भी है यदि प्रशासनिक और पुलिस सेवा की तर्ज पर जिले की न्यायपालिका की कमान अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के माध्यम से चयनित जिला न्यायाधीश के हाथ में होगी, तो फिर उच्च न्यायालय का अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण किस तरह का होगा?

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पिछले सरकार ने इस मामले में अटार्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की राय मांगी थी. लेकिन, इस मामले में बहुत अधिक प्रगति नहीं हुई. सरकार को लगता है कि संघ लोक सेवा आयोग की तर्ज पर भारतीय न्यायिक सेवा की प्रतियोगी परीक्षा आयोजित होने पर कानून के उन मेधावी छात्रों को इस ओर आकर्षित करने में मदद मिलेगी जो राज्य न्यायिक सेवा में आने के लिये बहुत अधिक उत्सुक नहीं रहते हैं. संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से इस सेवा में आने वाले अभ्यर्थियों के लिये अखिल भारतीय स्तर पर पदोन्नति के माध्यम से आगे बढने की संभावनायें अधिक रहेंगी और इससे न्यायपालिका में निचले स्तर से लेकर उपर तक न्याय प्रणाली में सुधार होगा.

दूसरी ओर, इसका विरोध करने वाले वर्ग का तर्क है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवा सृजन से अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण खत्म हो जायेगा और इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है, जो न्यायिक व्यवस्था के लिये अच्छा संकेत नहीं होगा. यही नहीं, इस तरह की सेवा के माध्यम से चयनित न्यायाधीशों मे स्थानीय भाषा के ज्ञान का अभाव न्यायिक व्यवस्था की क्षमता को प्रभावित कर सकता है.

सरकार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के माध्यम से प्रवीण और मेधावी न्यायाधीशों का पूल तैयार करना चाहती है, ताकि अधीनस्थ न्यायपालिका में लंबित मुकदमों की विशाल संख्या और इनके निबटारे में विलंब की चुनौतियों को प्रभावी तरीके हल किया जा सके.

सरकार का यह विचार अच्छा हो सकता है. लेकिन इससे पहले, अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर तत्परता से नियुक्ति करने और राज्यों की आबादी के अनुपात मे वहां न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों और सहायक कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि करनी होगी. इसके अलावा, अदालतों के नये कक्षों के निर्माण तथा दूसरी बुनियादी सुविधाओं में सुधार की भी जरूरत है.

इस समय देश में जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के लिये करीब 17,817 न्यायालय कक्ष और 13, 790 आवासीय इकाइयां उपलब्ध हैं. बताते हैं कि विभिन्न राज्यों में 3165 न्यायालय कक्ष और 1778 आवासीय इकाइयों का निर्माण कार्य प्रगति पर है.

अभी हो यह रहा है कि अधीनस्थ अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर नियुक्तियों के मामले में राज्य सरकारों के ढुलमुल रवैये की वजह से उच्चतम न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ रहा है. न्यायालय के इसी हस्तक्षेप की वजह से कई राज्यों में सरकार और उच्च न्यायालयों ने निचली अदालतों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर नियुक्ति की कवायद तेज की है.

पिछले 60 सालों के अनुभवों को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि इस बार अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन के लिये केन्द्र सरकार के प्रयास कितने सफल होंगे, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक कार्यों में स्थानीय भाषा के इस्तेमाल के तथ्य को ध्यान में रखते हुये केन्द्र सरकार इस सेवा के गठन के लिये अपना यह प्रयास जारी रखेगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं .जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं.यह आलेख उनके निजी विचार हैं)

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