भारत में कम्युनिस्ट पार्टी और आरएसएस दोनों की स्थापना 1925 में हुई. विचारधारा आधारित दोनों शक्तियों में से आरएसएस ने अपनी सौवीं वर्षगांठ से पहले ही स्थापना के समय का अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है.
किसी भी पूंजीवादी व्यवस्था या तंत्र को संकट मुक्त रखने के लिए लोक कल्याणकारी कार्यों की जरूरत होती है. मौजूदा बजट के संदर्भ में ये जानना दिलचस्प होगा कि क्या भारतीय पूंजीवाद अपने लिए कोई और रास्ता अख्तियार करेगा?
कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) दोनों ही पार्टियों के विधायकों के इस्तीफों और उन्हें लेकर अफवाहों आदि के रूप में जो कुछ घटित हो रहा है, वह न अप्रत्याशित है और न अभूतपूर्व.
यह महज संयोग नहीं है कि भाजपा के दोनों प्रधानमंत्री, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी असाधारण वाचक रहे हैं. भाजपा सार्वजनिक भाषण पर ज्यादा जोर देती है.
लोकसभा चुनाव में जहां गैर-आदिवासी सीटों पर भाजपा की जीत लाखों वोटों के अंतर से हुई, वहीं आदिवासियों के लिए आरक्षित पांचों सीटों पर जीत का अंतर बहुत छोटा रहा.
आज जो ‘नैतिक न्यूनतम जरूरतों’ की बात उठाई जा रही है, उसके साथ खतरा यह है कि यह हाशिए के समूहों के नेताओं पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व स्थापित करने का एक जरिया बन जायेगी.