Monday, 27 June, 2022
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‘मामला चाहें जो भी हो, कुल मिलाकर यह एक भूमि विवाद है’

उच्च न्यायालय 30 सितंबर, 2010 के बहुमत के अपने फैसले में इसे हिन्दू, मुस्लिम और राम लला की संयुक्त मालिकाना हक वाली भूमि घोषित कर चुका है.

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राजनीतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील 130 साल से अधिक पुराने अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को मध्यस्थता के माध्यम से सुलझाने के प्रयास एक बार फिर विफल हो जाने के बाद उच्चतम न्यायालय ने इस प्रकरण की छह अगस्त से बहस पूरी होने तक नियमित सुनवाई करने का फैसला किया है, लेकिन सवाल यह है कि क्या वर्तमान प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के कार्यकाल में इसका निबटारा हो सकेगा?

यह सवाल उठने की एक प्रमुख वजह प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के कार्यकाल की शेष अवधि है, उनका कार्यकाल 17 नवंबर को समाप्त हो रहा है. लेकिन न्यायमूर्ति गोगोई की कार्यशैली को देखते हुये यह भी सोचा जा सकता है कि अगर कोई अड़चन पैदा नहीं हुयी तो इस अवधि के भीतर ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ पिछले आठ साल से लंबित 14 अपीलों पर सुनवाई पूरी करके निर्णय आना मुमकिन भी है.

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ इन अपीलों पर अगर छह अगस्त से दैनिक आधार पर सुनवाई शुरू भी करे तो सामान्य प्रक्रिया के तहत नियमित सुनवाई के लिये उसके पास सिर्फ 35 दिन ही उपलब्ध हैं. आमतौर पर शीर्ष अदालत में सोमवार और शुक्रवार को नियमित सुनवाई की बजाये विभिन्न प्रकार के आवेदनों और याचिकाओं पर सुनवाई होती है. हां, अगर प्रधान न्यायाधीश चाहें तो सोमवार और शुक्रवार को भी इसकी सुनवाई कर सकते हैं और ऐसी स्थिति में संविधान पीठ के पास 58 दिन उपलब्ध होंगे.


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इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार, सुन्नी सेन्ट्ल वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय हिन्दू महासभा और भगवान श्रीराम लला विराजमान और मूल याचिकाकर्ताओं और अपीलकर्ताओं के कानूनी उत्तराधिकारियों सहित 14 पक्षकारों ने अपील दायर कर रखी हैं. इसके अलावा, इस मामले में हस्तक्षेप करने वाले भाजपा नेता डा सुब्रमणियन स्वामी ने संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत हिन्दुओं के धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का मुद्दा उठाने का प्रयास किया है.

सेन्ट्रल शिया वक्फ बोर्ड भी इस विवाद में कूदा

उत्तर प्रदेश सेन्ट्रल शिया वक्फ बोर्ड भी इस विवाद में कूद पड़ा है. शिया वक्फ बोर्ड ने पिछले साल शीर्ष अदालत में एक हलफनामे में बाबरी मस्जिद को शिया वक्फ की संपत्ति होने का दावा करके इस विवाद में एक नया आयाम जोड़ दिया था. बोर्ड ने हलफनामे में दावा किया था कि कथित रूप से कट्टरपंथी तत्वों के नेतृत्व वाले सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा कर रखा है.

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शिया वक्फ बोर्ड चाहता है कि इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाये और विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद निर्माण किया जा सकता है. हालांकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने शिया वक्फ बोर्ड के दावे का प्रतिवाद किया है.

इतने अधिक पक्षकारों को देखते हुये छह अगस्त को सुनवाई शुरू होने पर स्थिति की सहज ही कल्पना की जा सकती है . हालांकि, शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि इस विवाद में धर्म, आस्था और राजनीति पर आधारित दलीलें नहीं सुनी जायेंगी और किसी को भी ऐसा करने का मौका नहीं दिया जायेगा.

कुल मिलाकर यह है भूमि विवाद

न्यायमूर्ति गोगोई के पूर्ववर्ती प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने आठ फरवरी, 2018 को इस मामले की सुनवाई के दौरान कुछ बातें कहीं थीं जो काफी महत्वपूर्ण हैं. इस विशेष खण्डपीठ ने राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील इस प्रकरण में कानूनी पहलुओं पर बहस केन्द्रित करने पर जोर दिया था और दो टूक शब्दों में कहा था, ‘मामला चाहें जो भी हो, कुल मिलाकर यह एक भूमि विवाद है.’

यही नहीं, विशेष खंडपीठ ने इस प्रकरण को लेकर किसी भी प्रकार के भ्रम को दूर करते हुये साफ किया था कि इसका फैसला विवाद के लंबे इतिहास के आधार पर नहीं बल्कि साक्ष्यों के आधार पर ही किया जायेगा और दीवानी अपील के अलावा इसे कोई अन्य शक्ल देने की इजाजत नहीं दी जायेगी. शीर्ष अदालत ने कहा था कि यहां भी वही प्रक्रिया अपनाई जायेगी जो उच्च न्यायालय ने अपनाई थी.

शीर्ष अदालत की फरवरी 2018 में की गयी यह टिप्पणी उचित लग रही है क्योंकि यह विवाद मोटे तौर पर 2.77 एकड़ भूमि को लेकर ही है. उच्च न्यायालय 30 सितंबर, 2010 के बहुमत के अपने फैसले में इसे हिन्दू, मुस्लिम और राम लला की संयुक्त मालिकाना हक वाली भूमि घोषित कर चुका है. इसी के परिप्रेक्ष्य में उच्च न्यायालय ने भूमि को तीन बराबर हिस्सो में विभक्त करने और इसके एक एक हिस्से का इस्तेमाल पूजा के और इसके प्रबंधन के लिये करने का आदेश दिया था.


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उच्च न्यायालय ने इस भूमि के बंटवारे के संदर्भ में यह भी कहा था कि विवादित ढांचे में मध्य गुंबद के नीचे, जहां इस समय अस्थाई मंदिर में मूर्ति रखी है, हिन्दुओं को अंतिम डिक्री में आबंटित किया जायेगा जबकि निर्मोही अखाड़े को उस नक्शे में दिखाये गये राम चबूतरा और सीता रसोई वाले भाग सहित एक हिस्सा आबंटित किया जायेगा और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को मिलेगा.

शीर्ष अदालत ने इस फैसले के खिलाफ दायर अपील मई 2011 में विचारार्थ स्वीकार करते हुये उच्च न्यायालय की बहुमत की वयवस्था पर रोक लगा दी थी. हालांकि अपील विचारार्थ स्वीकार करने वाली न्यायमूर्ति आफताब आलम और न्यायमूर्ति आर एम लोढा, जो बाद में देश के प्रधान न्यायाधीश बने, की पीठ ने उच्च न्यायालय के निर्णय को बहुत ही विचित्र बताते हुये टिप्पणी की थी कि इसमें ऐसी राहत प्रदान की गयी है जिसका अनुरोध किसी भी पक्ष ने नहीं किया था.

न्यायालय ने उस दिन एक बार फिर सरकार द्वारा जनवरी, 1993 में अधिग्रहीत 67.703 एकड़ भूमि के बारे में संविधान पीठ के अक्तूबर 1994 और 2002 के आदेश के अनुरूप यथास्थिति बनाये रखने का भी निर्देश दिया था.

इस फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार, सुन्नी सेन्ट्ल वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाडा, अखिल भारतीय हिन्दू महासभा और भगवान श्रीराम लला विराजमान और मूल याचिकाकर्ताओं और अपीलकर्ताओं के कानूनी उत्तराधिकारियों सहित 14 पक्षकारों ने अपील दायर की हैं. इस मामले में हस्तक्षेप करने वाले भाजपा नेता डा सुब्रमणियन स्वामी ने संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत हिन्दुओं के धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का मुद्दा उठाने का प्रयास किया है.

राम मंदिर और बाबरी मस्ज़िद विवाद का रिकार्ड

अयोध्या विवाद का रिकार्ड बहुत ही भारी भरकम है. इस रिकार्ड के 38,147 पन्ने हैं जिनमें से 12,814 पन्ने हिन्दी में और 18,607 पन्ने अंग्रेजी में हैं. इसके अलावा उर्दू में 501 , गुरूमुखी में 97, संस्कृत में 21 और 86 पन्ने दूसरी भाषाओं की लिपियों में हैं. यही नहीं, 1,729 पेज एक से अधिक भाषाई लिपियों में हैं जबकि 14 पन्नों में चित्र और नक्शे आदि शामिल हैं.

इस मामले में नियमित सुनवाई अभी शुरू होनी है लेकिन इसके दस्तावेजों के अनुवाद की प्रमाणिकता को लेकर पहले ही कुछ पक्षकरों ने सवाल उठाये दिये हैं. इन पक्षकारों का यह कहना है कि कई दस्तावेजों में प्रयुक्त भाषा का अनुवाद सही नहीं हुआ है. निश्चित ही बहस शुरू होने पर यह एक बड़ा मुद्दा बन सका है जिसका समाधान खोजना भी न्यायालय के लिये चुनौती भरा होगा.

वैसे भी इस प्रकरण में एक मुस्लिम पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने इस विवाद के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से बहस के लिये 20 दिन की जरूरत बताई है, यदि इसे मान लिया जाये तो सवाल उठता है कि अगर एक पक्षकार इतने दिन चाहेगा तो क्या बाकी पक्षकार भी तरह तरह के तर्क और दलीलें देने के लिये अधिक से अधिक समय का अनुरोध नहीं करेंगे.


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हालांकि, प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने बेहद सख्त लहजे मे राजीव धवन से यह कहने में संकोच नहीं किया कि हमें नहीं बतायें कि कैसे क्या करना है. हम जानते हैं कि यह सब कैसे करना है.

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं.

उम्मीद की जानी चाहिए कि संविधान पीठ राजनीतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील इस मामले की सुनवाई अपनी कार्ययोजना के अनुरूप पूरा करने में कामयाब होगी लेकिन इस विवाद के विभिन्न पक्षकारों के रूख को देखते हुये फिलहाल कुछ भी अनुमान लगाना मुश्किल है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं .जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं.यह आलेख उनके निजी विचार हैं)

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1 टिप्पणी

  1. चूंकि मामला सम्माननीय सुप्रीम कोर्ट में निर्णय हेतु विचाराधीन है, अतः कुछ ना कहना ही उपयुक्त है। फिर भी अपने अभिब्यक्ति को जाहिर किए जाने के मद्देनजर प्रदत्त संविधानिक अधिकारौ का उपयोग करते हुए कहा जा सकता है कि ऐसे संवेदनशील मामलौ में आजादी के पूर्व की यथास्थिति बनाए रखने और आजादी पश्चात जमींदारी उन्मूलन कानून के मद्देनजर, लोकतांत्रिक स्थिति के अनुकूल,सकल सम्पत्तियौ को सार्वजनिक सम्पत्ति मानते हुए, इनसे की गई छेड़छाड़, रुपांतरण, उपयोगिता के जोर जबरदस्ती द्वारा बदले गए उपभोग के स्वरुप को अस्वीकार एवं गैर संवैधानिक घोषित कर,सम्बंधितौ के विरूद्ध पुरातात्विक संपत्तियों से की गई गंभीर छेड़छाड़ के आरोप स्थापित किए जाने चाहिए जो कि दंडकारी साबित हौ। तत्पश्चात भविष्य में की जाने वाली ऐसी ही कार्यवाहियों को अक्षम्य एवं आजीवन से लेकर काला पानी तक के प्रावधान तय करते हुए, सम्बंधित पक्षौ में से उन्ही के वर्ग के वोटरों के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन के अधिकारियों के देख-रेख में, एक नवगठित समिति बनाकर, उक्त की सुरक्षा, सार्वजनिक उपयोग की उसकी सुनिश्चितता एवं आने वाली आय व अभी तक संग्रहित धनादि का उपयोग विवादित स्थल के विकास में कुछ इस तरह ब्यय किया जाना तय किया जाए कि जिसका प्रत्यक्ष लाभ सभी वर्गों सहित समस्त नागरिकों तक पहुंचे,वित्त की फिजूल खर्ची न होने पाए, अनावश्यक, अलोकतांत्रिक नवनिर्माण पर पाबंदी लगा दी जाए, सेवा कार्य में नियुक्तियां अवैतनिक एवं अलाभप्रद घोषित कर दी जाए,सभी पूर्व वर्चस्वौ को स्थाई तौर पर निरस्त तथा राजनीतिक दलों अथवा बड़े बड़े विशाल धार्मिक आयोजनौ पर पाबंदी लगा दी जाए ऐसे ही ऐतिहासिक निर्णय के पश्चात उक्त तिथि पर लगने वाले बृहद मेले की अनुमति दी जाए,किसी वर्ग, धर्म,जाति, लिंग के नागरिकों को प्रवेश की पाबंदी लक्षित न हो,यह भी लोकतंत्र के हित में आवश्यक है।
    शुभकामनाएं आपका जीवन परोपकारौ से परिपूर्ण एवं सद्भावनाऔ से भरपूर हो।

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