सावरकर के हिंदुत्व की जड़ें उस वर्चस्ववाद में हैं, जो द्विज हिंदू सामाजिक दर्शन के आधार मनुस्मृति में दर्ज़ है, या फिर नीत्शे के सामाजिक डार्विनवाद में, जो योग्य लोगों को सुपरमैन बनाना चाहता है.
गांधी के कर्म और चिन्तन को अगर आगे के वक्तों के लिए जिन्दा रहना है तो फिर ये काम उनके पदचिन्हों से अपने कदम मिलाकर चलने वाले अनुयायियों से नहीं बल्कि गांधी को अपने युग की मांग के हिसाब से बरतने वाले ‘कुजात’ गांधीवादियों से ही हो सकता है.
गांधी को भरोसा था कि एक दिन आएगा, जब सेना, पुलिस पर देश की ऊर्जा और धन न खर्च होकर मानवता की भलाई में इसका इस्तेमाल होगा. लेकिन पटेल की पास इतना आदर्शवादी होने का अवसर नहीं था.
जब एक संवाददाता ने गांधी से उस ‘शुभ दिन’ पर संदेश देने का आग्रह किया तो उन्होंने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि ‘मैं ऐसे अवसरों पर संदेश देने का आदी नहीं हूं.’
सामाजिक न्याय और बहुजन राजनीति ने सामाजिक चेतना विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया. इसलिए जब बीजेपी-आरएसएस ने मुस्लिम विरोध की लहर तेज की, तो दलित-पिछड़े भी उसमें बह गए.
गांधी के तमाम विचारों में से भाजपा-आरएसएस ने सिर्फ स्वच्छता को चुना है और गांधी को लगभग सफाई कर्मचारी बना दिया है. आरएसएस को गांधी में इसके अलावा काम का कुछ नहीं मिला.
औपनिवेशिक खुफिया तंत्र क्रांतिकारियों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि खतरे के रूप में दर्ज करता था. ऐसा करके उसने कई ज़िंदगियों को इतिहास से निष्कासित कर दिया.