आखिर हमारे वित्त मंत्रियों को करीब 6 प्रतिशत को 3.5 प्रतिशत बताने की बाजीगरी क्यों करनी पड़ती है? खुले और पूर्ण एकाउंटिंग को बढ़ावा क्यों न दिया जाए ताकि देश को वित्तीय घाटे की वास्तविक तस्वीर मिले?
समान तेवर और विचारधारा वाली दो पार्टियां एक साथ फल-फूल नहीं सकती. जब से बीजेपी ने उग्र हिंदुत्व को अपना लिया है तब से शिव सेना की जमीन लगातार सिंकुड़ती जा रही है. अब उसके सामने अस्तित्व का संकट है.
आर्थिक संकट केवल सही और साहसी सुधारों से ही दूर हो सकता है, और यह मोदी सरकार अगर यह नहीं कर पाती तो इससे यह आशंका ही सही साबित होगी कि वह अपना जादू गंवा चुकी है.
भारत में निम्न वर्गों के राजनीतिक उभार को साइलेंट रिवोल्यूशन या मूक क्रांति कहा गया है. इस क्रांति की अग्रणी ताकत बसपा थी, जिसने कभी बहुजनों को शासक बनने का सपना दिखाया था.
विपक्षी दल साझा रैली-प्रदर्शन करने के बजाय अलग-अलग शक्ति प्रदर्शन में लगे हुए हैं ताकि जब सीटों के तालमेल की बातचीत हो तो अधिक से अधिक सीटों पर अपनी दावेदारी पेश कर सकें.
केजरीवाल ने मोदी से जंग से फिलहाल पूरी तरह किनारा कर लिया है. वे किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर चुनाव नहीं लड़ना चाहते. वे नहीं चाहते कि दिल्ली के मतदाता फरवरी में जब वोट डालने जाएं तब उनके मन में यह दुविधा हो कि मोदी के पक्ष में वोट दें या उनके पक्ष में.
सरकार जब महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे कांग्रेसी नेताओं का राजनीतिक इस्तेमाल कर सकती है तो मंदी से निपटने के लिए मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री के अनुभव का लाभ उठाने में क्या बुराई है?
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के लोगों का दावा कि भारतीय मुसलमानों से लेकर रानी मुखर्जी और अमेरिकी सीनेटर तक तमाम लोगों पर कैसे छा गए उनके वजीरे आज़म इमरान खान.
एकीकरण में कश्मीरी कहां हैं? क्या आज वे भारत के साथ पहले से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं, या उनमें अलगाव की भावना पहले से ज्यादा व्यापक और प्रबल हो गई है?
औपनिवेशिक खुफिया तंत्र क्रांतिकारियों को व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि खतरे के रूप में दर्ज करता था. ऐसा करके उसने कई ज़िंदगियों को इतिहास से निष्कासित कर दिया.