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Wednesday, 4 March, 2026
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पोल वॉल्ट चैंपियन सर्गेई बुबका को प्रेरणास्रोत मानने वाली भाजपा राज्यों में छलांग नहीं लगा पा रही है

भाजपा को इस बात का अहसास है कि वो अतीत का कांग्रेस बन चुकी है, पर वह अपने विरोधियों को और अधिक आत्मविश्वास नहीं पाने देना चाहती है.

अनुच्छेद 370 से सीएए तक: 2019 के घरेलू घटनाक्रमों का असर 2020 में मोदी सरकार की विदेश नीति पर पड़ेगा

सीएए पर विरोध प्रदर्शनों को, जो नितांत घरेलू मामला है, दुनिया में भारत की छवि धूमिल करने और 2019 में हासिल उपलब्धियों को गंवाने की वजह नहीं बनने दिया जाना चाहिए.

निर्मला सीतारमण को 2020 के बजट में हकीकतों से तालमेल बिठाना जरूरी है

वित्त मंत्री को अपने बजट भाषण में बताना चाहिए कि सुस्त होती अर्थव्यवस्था की 7 प्रतिशत वाली गति हासिल करने के लिए वे वाकई क्या करने जा रही हैं.

इंदिरा गांधी के सामने जो चुनौती 1974 में थी वही मोदी के समक्ष भी है पर आज देश बदल चुका है

इतिहास अपने को दोहरा रहा है और 1974 वाले दौर में जो महसूस हुआ था वही आज भी महसूस होने लगा है लेकिन आज का भारत एकदम अलग हालात में जी रहा है, जिसके चलते मोदी के लिए इंदिरा गांधी के नक्शेकदम पर चलना मुश्किल है.

‘मेक चाय, नॉट वॉर’- अपने इस संदेश के कारण इमरान ख़ान को 2019 का नोबेल शांति पुरस्कार मिलते-मिलते रह गया

विंग कमांडर अभिनंदन आज भी पाकिस्तान की स्मृतियों में युद्ध संग्रहालय के एक पुतले के रूप में या फिर चाय की एक दुकान के विज्ञापन के रूप में कायम हैं.

पीएम मोदी को यूपी के लोगों को सीएए विरोधी हिंसा पर सलाह देने के बजाय खुद से पूछना चाहिए

उम्मीद की जानी चाहिए कि आत्मावलोकन से परहेज खत्म होते ही प्रधानमंत्री को यकीन हो जायेगा कि उनका खुद अलोकतांत्रिक बने रहकर जनता से लोकतंत्र की मांग करने का कोई अर्थ नहीं है.

चीन और पाकिस्तान की फौजों की तरह भारतीय सेना का राजनीतिकरण तो नहीं हुआ है मगर उसके बीज डाल दिए गए हैं

जरूरत इस बात की है कि मोदी सरकार और भारतीय सेना आत्मनिरीक्षण करें और इस चलन को रोकें ताकि फिर कोई संकट न पैदा हो

गुजरात के दलित और आदिवासी उस जमीन को वापस ले रहे हैं जो कि अभी तक सिर्फ कागजों पर ही उनकी थी

जाति प्रथा के विनाश की बीआर आंबेडकर की परिकल्पना को दलितों और आदिवासियों को उनका हक दिला कर ही हकीकत में बदला जा सकता है.

झारखंड और महाराष्ट्र चुनावों के बाद महाबली नहीं रही मोदी सरकार

भारतीय लोकतंत्र का मिजाज अधिनायकवादी सरकारों के अनुकूल नहीं है. भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में ऐसी सरकारें हमेशा बेहतर हैं, जो अधिकतम लोगों, समूहों और विचारों को साथ लेकर चलने की कोशिश करें.

भारत की न्यायपालिका के लिए 2019 क्यों एक भुला देने वाला साल है

अगर भारतीय न्यायपालिका को जनता की नजरों में खराब हुई अपनी छवि में सुधार की कोई उम्मीद थी, तो स्पष्टत: 2019 में ऐसा नहीं हुआ.

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सुले और जयंत पाटिल ने उद्धव से मुलाकात की, राज्यसभा सीट पर नहीं हुआ फैसला

मुंबई, तीन मार्च (भाषा) राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और पार्टी के वरिष्ठ नेता जयंत पाटिल ने मंगलवार को...

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सुप्रीम कोर्ट का सही फैसला और बिलकिस बानो की जीत

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सर्वश्रेष्ठ कार्टून.