हाल के दिल्ली दंगों ने 200 साल पुरानी इस बहस को फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या ब्रितानी राज से पहले हिंदू और मुसलमान शांतिपूर्वक रहते थे या सांप्रदायिक हिंसा हमेशा से होती रही है?
हिमंत बिस्वा सरमा बिल्कुल अमित शाह की तरह ही हैं- राजनीति में जोड़-तोड़ करने वाले, कठोर, चतुर, मेहनती और सत्ता पाने के लिए ललक वाले. सरमा कुछ मोदी की तरह भी हैं- जो अपने क्षेत्र में लोकप्रियता को भी पसंद करते हैं.
अयोध्या मामले में भी इन न्यायाधीशों ने अपनी राय में कहा था कि समान्यतया, हिन्दुत्व को जीवन शैली या सोचने के तरीके के रूप में लिया जाता है और इसे धार्मिक हिन्दू कट्टरवाद के समकक्ष नहीं रखा जायेगा और न ही समझा जायेगा.
अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में विराट कोहली ने जो कद हासिल किया था उसके बाद उनके बारे में कोई आलोचनात्मक नहीं होता था. लेकिन अब विराट कोहली की फॉर्म पर बात करनी होगी.
गुजरात की 2002 की हिंसा हो, हाशिमपुरा नरसंहार हो या फिर दिल्ली के दंगे, घटनास्थल पर मौजूद पत्रकारों को समयाभाव, अफवाहों और पुलिस का सामना करना पड़ता है.
दिल्ली का दंगा भारत के लिए अंधेरे दौर की शुरुआत कर सकता है. इसीलिए इसके मूल कारणों पर विचार करने का वक़्त यही है. दुर्भाग्य की बात यह है कि यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा बोए एक विष बेल का फल है.
भुवनेश्वर, दो मार्च (भाषा) ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में राज्यसभा चुनाव से पहले सोमवार को राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं, जहां सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी...