इस बार के चुनावों में मोदी-शाह जोड़ी के प्रचार अभियान में पाकिस्तानियों, बांग्लादेशियों, आतंकवादियों पर हमले नहीं हो रहे हैं तो ऐसा लगता है कि उन्हें घरेलू राजनीति और राष्ट्रीय रणनीतिक हितों के द्वेषपूर्ण घालमेल के खतरों का एहसास हो गया है.
पाकिस्तान ने ऑस्कर पुरस्कारों के लिए जो फिल्म ‘ज़िंदगी तमाशा’ भेजी थी उसे पाकिस्तान के लोग ही नहीं देख पाएंगे, हालांकि इस पर दो साल से झगड़े-मुकदमे और विरोध जारी हैं .
जहां तक प्रतापभानु मेहता के इस्तीफे का सवाल है, हमने एक कमजोर को अपना निशाना बनाना के लिए चुन लिया है लेकिन कोई भी कमरे में आ बैठे हाथी पर अंगुली नहीं उठा रहा.
मुंबई पुलिस एक अच्छी फोर्स रही है. सही नेतृत्व मिलने पर यह कभी अपने प्रदर्शन में नाकाम साबित नहीं हुई. बहुत कुछ नेतृत्व करने वाले पर निर्भर करता है, एक गलत विकल्प चुनना पतन की ओर धकेल देता है.
इस चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ खेमे का लस्तपस्त हाल देखकर तो यही लगता है कि उसके नेताओं ने अपनी चुनावी रणनीति बनाने का काम जमात-ए-इस्लामी और आरएसएस के नेतृत्व वाले संघ परिवार को सौंप दिया है.
सरकार बनाने के लिए ज़रूरी संख्या बल जुटाने से भी अधिक आनंददायक होता है पूर्व मेंसहयोगी रहे अपनेप्रतिद्वंद्वीको लगातार शर्मिंदगी झेलते और सत्ता केनाकाबिल नज़र आते देखना.
लाउडस्पीकर से अज़ान कभी-न-कभी तो बंद करना पड़ेगा. उम्मीद यही की जानी चाहिए कि इसे मौजूदा क़ानूनों को लागू करने की प्रक्रिया के तहत करने की जरूरत न पड़े बल्कि मुस्लिम समुदाय की ओर से अच्छे पड़ोसी के रूप में उनके सामूहिक विवेक और जमीर के प्रदर्शन के तौर पर हो.
महाराष्ट्र की मौजूदा सरकार का तख्ता पलट कर बदला लेने को बेताब भाजपा अब अंबानी-सचिन वाज़े कांड, राज्य में कोविड के बढ़ते मामलों और भ्रष्टाचार के आरोपों का सहारा लेती दिख रही है