फोटोः रमनदीप कौर : दिप्रिंट
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पिछले साल इन दिनों में स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता यह हिसाब लगा रहे थे कि कोरोना के रोजाना के मामले कितने दिनों में दोगुने हो रहे हैं. दोगुना होने की दर से अंदाजा मिलता है कि नये मामलों के बढ़ने की कड़ी टूट रही है या नहीं. सितंबर में नये मामले एक लाख के ’पीक’ (शिखर) पर पहुंचे थे और घटकर 10 हज़ार से नीचे चले गए थे. दूसरे देशों में संक्रमण की दूसरी, तीसरी लहर आई, लेकिन भारत तो विजेता वाले जोश में आ गया. आज देखिए कि मामलों के दोगुना होने की दर क्या है— आठ दिन में मामले 20,000 से 40,000 पर पहुंचे, 14 दिन में 80,000 हो गए और इसे दोगुना यानी 1,60,000 होने में 10 दिन ही लगे, और अब चौथी बार मामले दोगुने होने वाले हैं. अस्पतालों में बिस्तरों, वेंटिलेटरों, ऑक्सीजन की कमी पड़ रही है. मई के मध्य तक रोजाना 6 लाख मामले सामने आ सकते हैं. यह बदतर किस्म का विश्व रेकॉर्ड तो होगा ही, पूरी व्यवस्था पर बेहिसाब बोझ की गारंटी तय है.

तब जो हालात बनेंगे वैसे इस देश ने इस भयानक महामारी में अब तक नहीं देखे होंगे. तब व्यापक लॉकडाउन बार-बार लग सकता है. पिछले साल बिना नोटिस के लगाए गए लॉकडाउन (जो पूरे देश में लगा दिया गया था जबकि कोविड के मामले कुछ ही जिलों में हुए थे) से हासिल अनुभव इस बार कोविड के भयावह असर से बचने में मददगार हो सकता है, बशर्ते सरकारें और नियोक्ता कामगारों को अपने कार्यस्थल या निवास पर मदद पहुंचाने का भरोसा दे सकें. सभी नियोक्ता ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं हो सकते हैं, तो अपने गांव-घर लौटने को इच्छुक कामगारों के लिए परिवहन जरूर उपलब्ध कराया जा सकता है. सामाजिक संगठनों, कार्यकर्ताओं को मदद के लिए आगे आने को प्रोत्साहित किया जा सकता है,   बेहतर तो यह होगा कि लॉकडाउन का विस्तार करने से पहले ही यह किया जाए. समय बहुत कम है.

बढ़ती आलोचनाओं से बचने के लिए सरकार ने वैक्सीन की सप्लाई बढ़ाने का फैसला देर से किया है. लेकिन वैक्सीन के एक मैनुफैक्चरर ने इसकी सप्लाई बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता की जो मांग की है उस पर कोई सार्वजनिक जवाब नहीं सामने आया है (दूसरे देशों में सरकार ने ऐसी सहायता दी है). वैक्सीनों पर कीमत नियंत्रण या तो हटाया जाना चाहिए या उस पर फिर से बात की जाए. कीमत इतनी हो कि वैक्सीन मैनुफैक्चरर के लिए उसका उत्पादन बढ़ाना संभव हो, अलाभकारी कीमत के उलटे नतीजे हो सकते हैं. फिलहाल जो कुछ किया जा रहा है उसके कारण टीकाकरण इतनी तेजी से नहीं चलाया जा सकता कि महामारी की दूसरी लहर को बीच में हो रोका जा सके. इसलिए, स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता को बेहद तेजी से बढ़ाने की जरूरत है. यहां और दूसरे देशों में ऐसा पहले भी किया जा चुका है और इसे फिर से बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है.

उत्पादन की कड़ी जिस तरह फिर लड़खड़ा रही है, उसके कारण आर्थिक ‘रिकवरी’ की संभावना पर सवाल खड़ा हो रहा है. कई कंपनियां और बिजनेस सेक्टर पहले से ही बीमार हैं, नया झटका उन्हें गर्त में धकेल सकता है. नुकसान स्थायी न हो जाए और आर्थिक ‘रिकवरी’ कुप्रभावित न हो इसके लिए पिछले साल की तरह वित्तीय सहायता, उधार, और दूसरे उपाय दोहराने पड़ेंगे. उपभोक्ता समर्थन अब तक कमजोर रहा है, सहायता की जरूरत केवल कंपनियों को नहीं बल्कि लोगों को भी है. इस साल वित्तीय घाटे और सार्वजनिक उधार में वृद्धि से बचना मुश्किल है. इस संकट से निबटने के लिए ये कीमतें चुकानी पड़ेंगी.

स्कूली शिक्षा, साक्षारता और स्कूलों में भर्ती में कमी से भी बचना नामुमकिन है. लेकिन छात्रों का एक साल बचाने की हर कोशिश की जानी चाहिए. महामारी के घटने से पहले बोर्ड की परीक्षाएं नहीं ली जा सकतीं. इसके आगे के शिक्षा सत्रों को छोटा करना पड़ेगा, छुट्टियों में कटौती करनी पड़ेगी.

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इन सभी मोर्चों पर सरकार को टीकाकरण की दर में कमी लाने वाले ‘वैक्सीन उत्सव’ जैसे आयोजन करके संकट का मखौल बनाने की जगह असली समाधान करना पड़ेगा. राज्य सरकारों को मौत के आंकड़ों से छेड़छाड़ बंद करना होगा, संकट से सही तरीके से निबटना है तो उसके पैमाने को समझना होगा. ‘इस तरह की ‘इवेंट मैनेजमेंट’ वाली मानसिकता के बहुत उदाहरण हम देख चुके हैं— थाली बजाने से लेकर बत्ती बुझाने, 9 बजे रात को 9 मोमबत्तियां जलाने, हेलिकॉप्टर से अस्पतालों पर फूल बरसाने, वगैरह वगैरह तक. इस बीच, कुंभ मेले, और चुनावी रैलियों जैसे भीड़भाड़ वाले आयोजनों में संक्रमण को काबू में करने का जिम्मा भगवान को सौंप दिया गया. वक़्त गुजर चुका है, अब गंभीर हो जाने की जरूरत है.


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