मेजर जनरल वासु वर्धन के तबादले पर, रक्षा मंत्रालय और सेना की प्रतिक्रिया, सभी के लिए एक संकेत है कि अगर वो नहीं झुकते, तो उन्हें क्या क़ीमत चुकानी पड़ सकती है, भले ही उनका रुख़ वर्दी के सबसे ऊंचे और क़ीमती मूल्य- नैतिक ईमानदारी की मर्यादा को बनाए रखता हो.
यह कहना है कि महामारी एक ‘अनदेखे दुश्मन’ का काम है, जिसके खिलाफ सरकार दुर्भाग्यवश ज्यादा कुछ नहीं कर पा रही है, कुछ और नहीं ये स्वीकारना ही है कि सरकार विफल रही है.
हालात की सकारात्मक तस्वीर पेश करने वाली अपनी ही कहानी पर यकीन कर रहे भाजपा नेताओं के विपरीत, अपने कई कार्यकर्ताओं को कोविड महामारी में गंवा चुका आरएसएस जो जमीनी हकीकत सामने ला रहा है वह कहीं ज्यादा सकते में डालने वाली है .
न्यायपालिका का चाबुक चले बगैर कार्यपालिका और नौकरशाही गंभीर समस्याओं के मामले में भी सक्रिय नहीं होती है और इस वजह से निरीह जनता को तमाम परेशानियों से रूबरू होना पड़ता है.
सवाल यह है कि इतनी महत्वपूर्ण, विशाल पैमाने वाली परियोजना को, जो गोपनीयता के पर्दे में छिपी है और जिसे जनता की नज़रों से दूर रखा गया है उसे क्या महामारी के बीच लागू किया जाना चाहिए जबकि एक-एक रुपया देश की मेडिकल सुविधाओं को बेहतर बनाने पर खर्च किया जाना चाहिए?
उत्तर प्रदेश और बिहार में कोविड त्रासदी की मूल वजह राजनीति व अर्थनीति में छिपी है. राजनीतिक सत्ता, और आर्थिक व सामाजिक संकेतकों के मामलों में जो क्षेत्रीय असंतुलन है वह गंभीर संकट का कारण है.
रंगमंच सजा हुआ है, किनारे पर कुछ विदुषक भी खड़े हैं, आईटी सेल ने उन्हे स्क्रिप्ट थमा दी है जिस पर लिखा है- सरकार को कोसने से क्या होगा जब समाज ही भ्रष्ट है, जो अपने सगे को गंगा में फेंक रहा है.
उत्तराखंड में गंगा किनारे आकार ले रहे ऑल वेदर रोड पर कई जगह सेल्फी प्वाइंट बनाए गए हैं. ताकि गंगा पर पर्यटन बढ़ाया जा सके. तीर्थाटन से पर्यटन की ओर जाती नीतियां गंगा के हर प्रमुख स्थल पर नजर आती है.
आलाकमान वाली संस्कृति और शीर्ष नेतृत्व के पूर्वाग्रहों ने हिमंता बिस्वा सरमा को 2015 में कांग्रेस से अलग होने पर मजबूर किया था. विडंबना यह है कि अब भाजपा में इसी संस्कृति ने उन्हें असम की ऊंची गद्दी पर बैठा दिया है.
पंच का अपने प्लश टॉय से लगाव उसके देश से नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले आराम से है. इसी तरह, ग्राहक जियोपॉलिटिकल लेबल से ज्यादा भरोसे और डिजाइन को प्राथमिकता देते हैं.