अगर 137 साल पुरानी पार्टी अब भी अपने बुनियादी विचारों और मूल विचारधारा पर बहस में फंसी है और हर कोई एकमत नहीं हो सकता तो आगे की राह लगती है मुश्किल भरी.
गांधी परिवार जो कुछ टुकड़ों-टुकड़ों में करता रहा वह अब निरंतर किया जाएगा, प्रशांत किशोर पार्टियों को चुनाव जिताते होंगे लेकिन कांग्रेस ने अपने बूते जीतने का फैसला किया .
अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला 1764 में बक्सर की ऐतिहासिक लड़ाई में अंग्रेजों से बुरी तरह हार गये और फर्रुखाबाद के अपने शुभचिन्तक नवाब अहमद खां बंगश के सुझाव पर उन्होंने फैजाबाद को अपने सूबे की राजधानी बनाया तो सरयू तट पर विशाल ‘कलकत्ता किला’ बनवाया था.
पुरानी एंबेसडर कार की तरह कांग्रेस ने भी खुद को नये अवतार में ढालने की कई नाकाम कोशिशें की लेकिन उसे अपने शानदार अतीत से आगे बढ़कर कुछ ऐसा करना पड़ेगा जो भविष्य के लिए उम्मीदें जगाता हो.
श्रीलंका के मौजूदा संकट से तो यही साफ होता है कि लंबे समय तक चले भाषायी विवाद से जो देश में स्थिति उत्पन्न हुई उससे बाद के सालों में कोई सबक नहीं लिया गया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचकों की चिंताएं जायज हैं लेकिन खौफज़दा होने की जरूरत नहीं है. मोदी के नाम पर ध्रुवीकरण की जो वजहें टीवी चैनलों और अखबारों में बताई जाती हैं वे गलत हैं.