Friday, 27 May, 2022
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जनगणना से कौन डरता है और क्या है इसे लेकर मोदी सरकार की नीति

नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020 में ही ये घोषणा कर दी थी कि कोविड के प्रकोप के कारण इस बार की जनगणना समय पर नहीं होगी.

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2021 की जनगणना अब लंबे समय तक के लिए टल चुकी है. अगर सब कुछ सामान्य तरीके से हुआ होता तो 2021 के फरवरी महीने में सरकारी शिक्षक घर-घर जाकर देश में रहने वाले हर आदमी का आंकड़ा जुटा चुके होते. लेकिन अब जो स्थितियां बन रही हैं, उसमें ये कहना भी मुश्किल है कि जनगणना-2021 कभी होगी या नहीं. अगर इस बार जनगणना नहीं हुई तो 2030 में भी सरकार और सरकारी तथा निजी संस्थाएं 2011 यानी पिछली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर नीतियां बना रही होंगी.

नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020 में ही ये घोषणा कर दी थी कि कोविड के प्रकोप के कारण इस बार की जनगणना समय पर नहीं होगी. ये जनगणना कब शुरू होगी, इस बारे में कोई घोषणा नहीं हुई है. इस बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बेशक ये कहा है कि इस बार की जनगणना इलेक्ट्रॉनिक सर्वे के जरिए होगी और ये काम 2024 तक कर लिया जाएगा. जाहिर है अगर आंकड़े 2024 तक जुटाए जाएंगे तो सभी आंकड़े रिलीज होने में दो से तीन साल का और समय बीत जाएगा.

इसलिए 2021-2031 को अगर बिना आंकड़ों का दशक कहा जाए तो ये एक हद तक सच ही होगा.

भारत में जनगणना का इतिहास पुराना है. पहली जनगणना ब्रिटिश शासन में 1872 में शुरू हुई थी. 1881 के बाद से बिना किसी व्यवधान के अब तक हर दस साल पर जनगणना होती रही है. एकमात्र अपवाद 1941 है, जब दूसरे विश्व युद्ध की छाया भारत पर भी पड़ी थी और जनता से आंकड़े जुटाए जाने के बावजूद उन्हें व्यवस्थित और प्रकाशित नहीं किया गया.

इस एक अपवाद को छोड़ दें तो चाहे चीन के साथ युद्ध के माहौल में 1961 का साल हो या बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान के साथ तनाव का साल 1971 हो, भारत में जनगणना का काम कभी नहीं रुका.

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फिर 2021 में ऐसा क्या हुआ कि भारत में जनगणना नहीं हुई. सरकार का कहना है कि कोविड संक्रमण फैलने के कारण ये फैसला किया गया. राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जानकारी दी कि – जनगणना 2021 के लिए 28 मार्च 2019 को ही गजट अधिसूचना जारी कर दी गई थी. लेकिन कोविड-19 महामारी को देखते हुए आंकड़ा जुटाने का काम रोक दिया गया. इसी सवाल के जवाब में उन्होंने ये जानकारी भी दी कि जनगणना के लिए केंद्र सरकार ने 8,754 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया है.

ये सच है कि कोविड के कारण देश और दुनिया में कई तरह के उथल-पुथल हुए और कई काम टल गए. लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि कोविड के दौरान ही भारत के कई राज्यों जैसे बिहार, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव हुए. इस दौरान तमाम उपचुनाव और देश भर में नगर निकाय चुनाव भी हुए. इन चुनावों के लिए रोड शो भी हुए और रैलियां भी निकाली गईं. इन रैलियों में से कई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी संबोधित किया. यानी सरकार ने ये चुना कि जिस समय जनगणना नहीं करानी है, उसी समय चुनाव कराए जा सकते हैं.

कोविड संक्रमण घटने के बाद देश भर में बाजार, मॉल, सिनेमाघर, स्टेडियम, धार्मिक स्थल आदि खुल चुके हैं और वहां पहले जैसी भीड़ आने लगी है. जनगणना शायद ऐसी अकेली चीज है, जिसे कोविड ने रोक रखा है, या फिर जिसे कोविड के नाम पर रोका गया है.

ये भी गौर करने की बात है कि चुनाव रैलियों से लेकर हाट-बाजार और सिनेमाघरों में भारी भीड़ हो रही है, जबकि जनगणना में तो एक सरकारी शिक्षक, जो पूरी तरह वैक्सीनेटेड हो सकता है और जो मास्क लगा सकता है, को घर-घर जाकर कुछ सवाल पूछने होते हैं. रैलियों में न फैलने वाला कोविड एक व्यक्ति के घरों में जानें से कैसे फैल जाएगा, इसे सामान्य तर्कों से नहीं समझा जा सकता.

दिलचस्प बात ये है कि दुनिया के कई देशों में सरकारों ने भारत सरकार से अलग नजरिया अपनाया. उन्होंने माना कि आंकड़े जुटाना जरूरी काम है और कोविड की वजह से उसे रोका नहीं जाना चाहिए. बल्कि उन्होंने ये माना कि कोविड का असर लोक जीवन पर जिस तरह पड़ा है, उसकी जानकारी भी जनगणना में जुटाई जा सकती है.


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क्यों चाहिए जनगणना?

अमेरिका ने हर दस साल पर होने वाली जनगणना इस बार उस दौर में कराई, जब वहां कोविड का भयंकर प्रकोप था. अमेरिका की ये पहली डिजिटल जनगणना थी. अब तो अमेरिका की जनगणना, 2020 के आंकड़े भी जारी होने लगे हैं. उसी तरह ब्रिटेन में इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड और आयरलैंड की सांख्यिकी संस्थाओं ने कोविड के दौरान जनगणना का काम संपन्न किया और अब वहां आंकड़ों के विश्लेषण और उन्हें जारी करने का काम चल रहा है. यहां तक कि चीन ने भी 2020 में कोविड के दौरान ही हर दस साल पर होने वाली अपनी जनगणना का काम पूरा किया. इसके ज्यादातर नतीजे जारी किए जा चुके हैं.

लेकिन भारत ने अपने लिए एक अलग रास्ता चुना है. वह रास्ता जनगणना न कराने का है. यहां दो महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं. एक, जनगणना की आखिर जरूरत ही क्या है और दो, भारत ने जनगणना-2021 को स्थगित या रद्द करने का फैसला क्यों किया?

नियमित अंतराल के अंतर पर नियमित जनगणना कराने का मान्य सिद्धांत अनावश्यक नहीं है. इस तरह से ये पता चलता है कि किसी खास समूह या किसी भौगोलिक इकाई में रह रहे लोगों की स्थिति या उनकी आबादी की संरचना में किस तरह के बदलाव आए हैं. नीतियां बनाने के लिए ऐसे आंकड़ों का महत्व निर्विवाद है. अपने एक पेपर में ए. डब्ल्यू. महात्मे बताते हैं कि ‘जनगणना नियमित अंतराल में होनी चाहिए ताकि क्रमबद्ध तरीके से सारी जानकारियां हासिल हो सकें. नियमित कराई गई जनगणनाओं से न सिर्फ अतीत और वर्तमान का पता चलता है, बल्कि भविष्य के बारे में आकलन करने में भी आसानी होती है.’

जनगणना के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि इसे संविधान में भी जगह दी गई है. केंद्र और राज्य के कार्य विभाजन में अनुसूची-7 में जनगणना को केंद्र सरकार के कार्यक्षेत्र में शामिल किया गया है. यही नहीं, जनगणना का कार्य सुचारू रूप से हो, इसके लिए आजादी के फौरन बाद, जनगणना कानून, 1948 लाया गया. साथ ही रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया/जनगणना आयुक्त के नए पद का भी सृजन हुआ. जनगणना के लिए सरकार अलग से धन का प्रबंध करती है.

और ये सिर्फ भारत की बात नहीं है. दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों में जनगणना को एक गंभीर काम माना जाता है. संयुक्त राष्ट्र ने बाकायदा एक हैंड बुक जारी करके बताया है कि जनगणना कितनी महत्वपूर्ण है और इसे किस तरह कराया जाना चाहिए. जनगणना के महत्व पर जोर देते हुए इस दस्तावेज में कहा गया है कि – वर्तमान समाजों में आर्थिक और सामाजिक मसलों को सही तरीके से चलाने के लिए फैसलों को प्रमाणों यानी सबूतों पर आधारित होना चाहिए. जरूरी, सटीक और समय पर जुटाए गए आंकड़े इसके लिए आवश्यक हैं. जनगणना का उद्देश्य आबादी, उसकी संरचना और उसकी विशेषताओं से संबंधित बारीक से बारीक जानकारी जुटाना होता है.’

2021 की जनगणना टलने से सरकार और सरकारी एजेंसियों के पास आवश्यक आंकड़े नहीं होंगे और उन्हें 2011 की जनगणना के पुराने आंकड़ों, छोटे स्तर पर कराए गए सर्वेक्षणों और अंदाज के आधार पर नीतियां बनानी पड़ेंगी. सर्वेक्षण का दायरा छोटा होने के कारण, वे जनगणना की तरह सटीक नहीं होते. जनगणना के आंकड़े सरकार के अलावा निजी संस्थाओं और शिक्षा जगत जैसे समाजशास्त्रियों, राजनीति विज्ञानियों, स्वास्थ्य नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों आदि के भी काम आते हैं. आंकड़ों के बिना इनका काम किसी अंधेरी सुरंग में यात्रा करने की तरह होगा.

जनगणना को लेकर मोदी सरकार की नीति

मोदी सरकार के मंत्रियों के वे बयान तर्कों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते कि जनगणना न कराए जाने की वजह कोविड संक्रमण है. हमें ये नहीं मालूम की सरकार जनगणना को क्यों टाल रही है. एक संभावना ये है कि देश के कई सामाजिक और राजनीतिक संगठन ये मांग कर रहे हैं कि जनगणना, 2021 में जाति का कॉलम शामिल किया जाए. महाराष्ट्र में कुछ संगठनों ने ये भी कहा है कि अगर जाति का कॉलम न जोड़ा गया तो वे जनगणना का बहिष्कार करेंगे. सरकार ने जनगणना कर्मियों के लिए जारी निर्देश में इस आशंका का जिक्र किया है और ये भी कहा है कि एनआरसी की वजह से भी जनगणना को लेकर कुछ लोगों में आशंकाएं हैं. सरकार को अंदेशा है कि जनगणना के दौरान विवाद हो सकता है.

दरअसल बीजेपी जाति जनगणना को लेकर कभी भी सहज नहीं रही है. 2001 की जनगणना में जाति का कॉलम शामिल न करने का फैसला अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने किया था. जबकि 1998 में प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की सरकार ने ये फैसला किया था कि 2001 की जनगणना में जाति का कॉलम जोड़ा जाएगा. वाजपेयी सरकार ने ये तर्क दिया था कि जाति का कॉलम जोड़ने से जातियां मजबूत होंगी. मुमकिन है कि सरकार अब भी ऐसा ही सोच रही हो.

2019 में नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ये घोषणा की थी कि 2021 में ओबीसी की भी गिनती की जाएगी. सरकार अब वहां से पीछे हट चुकी है. महाराष्ट्र में ओबीसी आरक्षण का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र सरकार से कहा कि वो 2021 में जाति जनगणना करके जरूरी आंकड़े जुटाए. इस पर केंद्र सरकार ने हलफनामा देकर कहा कि ‘1951 में ये नीतिगत निर्णय लिया गया था कि एससी-एसटी के अलावा किसी तरह की जाति जनगणना नहीं कराई जाएगी. इसलिए तब से अब तक कभी भी एससी-एसटी के अलावा किसी जाति को नहीं गिना गया.’

केंद्र सरकार ने संसद में भी अपना यही पक्ष दोहराया है और स्पष्ट कर दिया है कि जाति जनगणना कराने का सरकार का कोई इरादा नहीं है.

ये फैसला ऐसा समय में लिया गया है जब तमिलनाडु, बिहार, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में सरकार और विधानसभाओं ने जाति जनगणना कराने का प्रस्ताव पारित करके केंद्र सरकार को भेजा है. बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव इस मसले पर दिल्ली तक की पदयात्रा करने की घोषणा कर चुके हैं.

सरकार के दिमाग में क्या चल रहा है ये समझ पाना तो मुश्किल है, लेकिन ये तो साफ दिख रहा है कि सरकार जनगणना को लेकर बिल्कुल ही उत्साहित नहीं है.

(लेखक पहले इंडिया टुडे हिंदी पत्रिका में मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और इन्होंने मीडिया और सोशियोलॉजी पर किताबें भी लिखी हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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