सत्ता से बेदखल होने के कारण कांग्रेस नेताओं की खीज समझ में आती है लेकिन जिस तरह से वह मोदी विरोध के मुद्दे हर बार पहला मुद्दा बना देती है उससे सत्ताधारी दल की कमजोरियों को उजागर करने वाले बाकी अहम मुद्दे गौण हो जाते हैं.
अब बड़े बिलबोर्डस् लगे दिखाई नहीं देते. ना ही दीवारों पर चुनावी इश्तहार लिखे हैं. इधर-उधर चंद फ्लेक्स लगे जरूर नजर आ जायेंगे लेकिन चुनाव-प्रचार करती हुई कोई गाड़ी शायद ही देखने को मिले. कर्नाटक चुनाव मानो एकदम से भूमिगत हो चला है.
दोनों की आलोचना के लिए मसाला तो है लेकिन माल-असबाब का निर्यात अब भारत की व्यापार में वृद्धि करने वाला ड्राइवर नहीं रह गया है, और पीएलआइ के मद में पांच साल में जीडीपी के 1 फीसदी के 10वें हिस्से के बराबर ही जाएगा.
नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में 2018 में ये फैसला हुआ कि 2021 की जनगणना में ओबीसी की गिनती की जाएगी. राजनाथ सिंह ने इसकी घोषणा भी कर दी थी. लेकिन 2019 का चुनाव निपटने के बाद सरकार ने अपना रुख बदल लिया.
गुटनिरपेक्षता वाले दौर को आज शिद्दत से याद किया जा रहा है. बहुपक्षवाद फैशन में है. और हम सहारा उन संगठनों में तलाश रहे हैं जिन्हें चीन ने बनाया या जिन पर उसका वर्चस्व है
एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में, एक प्रगतिशील संविधान के साथ, हमें धार्मिक नेताओं से डरना नहीं चाहिए. लेकिन वे अभी भी भारतीय मुसलमानों के एक महत्वपूर्ण वर्ग के दिमाग पर हावी हैं.
गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने हाल ही में दावा किया कि गोवा में होने वाले 90 प्रतिशत अपराधों के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश से आने वाले प्रवासी मज़दूर ज़िम्मेदार हैं.
अगर बीजेपी को लगेगा कि पहलवानों का विरोध प्रदर्शन कर्नाटक चुनाव को प्रभावित करेगा (जो अब तक नहीं किया है) या प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाएगा, तभी वह कार्रवाई करेगी.
जो भी सच में सच्चाई जानना चाहता है, वह आसानी से उन कई घटनाओं को देख सकता है—कश्मीर से लेकर लखनऊ तक, जहां भारतीय मुसलमान आतंकवादी हमलों के खिलाफ सबसे आगे खड़े होकर आवाज़ उठाते रहे हैं.