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Thursday, 13 June, 2024
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केरल युगल की दोबारा शादी मुस्लिम कानूनों में असमानता को दिखाता है, धर्मगुरुओं को प्रगतिशील होने की जरूरत

एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में, एक प्रगतिशील संविधान के साथ, हमें धार्मिक नेताओं से डरना नहीं चाहिए. लेकिन वे अभी भी भारतीय मुसलमानों के एक महत्वपूर्ण वर्ग के दिमाग पर हावी हैं.

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8 मार्च 2023 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन केरल में एक मुस्लिम जोड़े ने ‘विशेष विवाह अधिनियम 1954’ के तहत दोबार विवाह किया. अधिवक्ता और अभिनेता सी शुक्कुर और उनकी पत्नी शीना यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनकी तीन बेटियां अपने पिता की संपत्ति की एकमात्र उत्तराधिकारी हों. जो कि मुस्लिम कानूनों के मुताबिक अन्यथा उसके अपने भाई के पास चला जाएगा. हालांकि इसे मेनस्ट्रीम मीडिया और प्राइम टाइम में कवरेज नहीं मिला, लेकिन इस घटना ने सोशल मीडिया पर एक तीखी बहस छेड़ दी. और यह काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में कानूनी सुधारों की आवश्यकता पर जोर डालता है जिसका उद्देश्य कानूनों में लैंगिक समानता हासिल करना है.

केरल के इस कपल के पुनर्विवाह से पता चलता है कि कैसे कुछ मुसलमान शरिया कानून की सीमाओं और भेदभावपूर्ण प्रकृति को दरकिनार करने के तरीकों की तलाश कर रहे हैं, जो समाज में धार्मिक नेताओं और रूढ़िवादियों की नाराजगी के डर से बहुत से लोग बाहर निकलने में असमर्थ हैं.

भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक किसी पारंपरिक विवाह में पिता की संपत्ति का केवल दो-तिहाई हिस्सा बेटियों को विरासत में देने की अनुमति है. बाकी संपत्ति उसके पुरुष उत्तराधिकारी, जैसे बेटे, या फिर अगर कोई बेटा नहीं है तो उसके भाई के पास जाएगा. ‘विशेष विवाह अधिनियम’ के तहत धर्मनिरपेक्ष विवाह के माध्यम से अब दंपति यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनकी बेटियों को उनकी पूरी संपत्ति जाएगी और उनके साथ उचित व्यवहार किया जाएगा.

इस पूरे प्रकरण का परिणाम वास्तव में काफी पेचीदा है. शुक्कुर को केरल में मुस्लिम धर्मगुरुओं के विरोध का सामना करना पड़ा. दारुल हुदा इस्लामिक विश्वविद्यालय के अनुसंधान परिषद ने उनके खिलाफ एक फतवा जारी किया, जिसमें लिखा था: ‘सच्चे विश्वासी मुसलमान इस तरह के नाटक का शिकार नहीं होंगे जो व्यक्तिगत लाभ के लिए धर्म का उपयोग करते हैं. वे ऐसे जघन्य अपराध का पुरजोर विरोध करेंगे जो धार्मिक कानूनों का अपमान करने और विश्वासियों के मनोबल को गिराने के लिए हैं.’ फतवा अनिवार्य रूप से एक विद्वान की शरीयत की व्याख्या पर आधारित है, लेकिन इस विशेष मामले में प्रयुक्त भाषा का अर्थ है कि यह ईश्वर का प्रत्यक्ष शब्द है. फतवे में यह भी कहा गया है कि ‘इस तरह के विचार इस्लामी सिद्धांतों को समझने में विफलता के दुखद परिणाम हैं. अल्लाह सभी धन और संपत्ति का असली मालिक हैं’.

एक तथाकथित लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में भी, मुस्लिम महिलाएं भेदभाव का शिकार हैं. उनके पास समान विरासत का अधिकार, संसाधनों तक पहुंच और कानून के समक्ष समानता नहीं है. शुक्कुर के खिलाफ बोले और किए जा रहे कामों से यही साबित होता है.

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शरिया में भी बदलाव की जरूरत

भारत के मौलवी फतवों में निरंकुश भाषा का इस्तेमाल कर जनता को काबू में रखते हैं. कुछ मुसलमान फतवों को आवश्यक इस्लामी सिद्धांतों के रूप में देखते हैं. यदि एक सामान्य मुसलमान कोई ऐसा विचार व्यक्त करता है जो उनकी व्याख्या या मत के विरुद्ध जाता है, तो मौलवी केवल यह दावा करते हैं कि वे अल्लाह की इच्छा के विरुद्ध काम कर रहे हैं. यह आम मुसलमानों को मौलवियों के रहमोकरम पर रखता है.

शरिया विभिन्न स्रोतों पर आधारित एक मानव निर्मित कानून है. इसीलिए अलग-अलग इस्लामिक देशों में यह अलग-अलग कानून हैं. साथ ही समय के साथ-साथ इसके नियम भी बदलते रहे हैं. तथ्य यह है कि सऊदी अरब ने 2018 में महिलाओं को ‘शरिया को ध्यान में रखते हुए’ ड्राइव करने की अनुमति दी. यह दर्शाता है कि इन नियमों को बदला जा सकता है. यह अंततः एक देश में विद्वानों और धर्म गुरुओं की राय पर निर्भर है.

यह सवाल करना महत्वपूर्ण है कि भारतीय मुस्लिम धर्मगुरु लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए केवल वैकल्पिक तरीकों का सुझाव देने के बजाय शरीयत में बदलाव क्यों नहीं करते हैं. जब भी कभी महिलाओं को समानता देने की बात की जाती है तो उसका विरोध किया जाता है और उनके खिलाफ फतवा जारी किया जाता है.

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है. 20वीं सदी की शुरुआत में, अपने पति को छोड़ने की आजादी मुस्लिम महिलाओं को नहीं थीं. यह भारतीय मुसलमानों के बीच प्रचलित विश्वास का कारण था, जिनमें से अधिकांश सुन्नी न्यायशास्त्र के हनफी स्कूल का पालन करते हैं, जिसमें यह अनिवार्य है कि एक महिला तलाक की पहल नहीं कर सकती, सिवाय उन मामलों में जहां उसका पति नपुंसक था. नतीजतन, कई महिलाओं के लिए एकमात्र विकल्प इस्लाम को त्यागना बच गया था. इसके जवाब में, कुछ इस्लामिक विद्वानों ने एक फतवा तैयार किया, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को ‘खुला’ के माध्यम से तलाक लेने की अनुमति दी गई.

महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करने के तरीकों के बावजूद, कुछ इस्लामी विद्वानों ने गलत धारणाओं के साथ अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है. एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में, एक प्रगतिशील और मजबूत संविधान के साथ, हमें धर्म गुरुओं से डरना नहीं चाहिए. लेकिन दुख की बात है कि वे अभी भी भारतीय मुसलमानों के एक महत्वपूर्ण वर्ग के दिमाग पर हावी हैं.

जाकिर नाइक से वहीदुद्दीन तक

इस्लाम एक अखंड आस्था नहीं है. इसके विभिन्न संस्करण हैं. यह केवल अल्लाह है जो तय करता है कि हम अच्छे मुसलमान हैं या बुरे. एक प्रगतिशील संयुक्त अरब अमीरात, एक सुधारवादी सऊदी अरब, एक धर्मनिरपेक्ष तुर्की, एक उदारवादी ट्यूनीशिया और एक बहुलतावादी इंडोनेशिया का इस्लामी कानूनों पर उनकी व्याख्याओं के अनुसार उतना ही दावा है. ठीक वैसे ही जैसे अफगानिस्तान में तालिबान जैसा कट्टर आतंकी समूह है या पाकिस्तान में एक विफल सरकार है, जिसने हमारे प्यारे विश्वास को हाईजैक कर लिया है और इसे अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए एक राजनीतिक हथियार बना लिया है. हमारे पास जाकिर नाइक भी हैं, तो पद्म विभूषण मौलाना वहीद्दुद्दीन खान और पाकिस्तान में जन्मे जावेद अहमद घामिदी भी हैं, जो आधुनिक समय की मांगों के अनुसार इस्लाम को समसामयिक बनाने में हमारी मदद करते हैं.

तो आइए हम भारतीय संविधान का अध्ययन करें और समानता के वास्तविक संदेश के अनुसार अपने विश्वास की व्याख्या करें और उसी लोकतंत्र से लाभ उठाएं. यह सब उसी मुल्क में हो सकता है जहां हमारे कट्टरपंथी धार्मिक धर्म गुरु रहते हैं.

लिंग या धार्मिक चिंताओं की परवाह किए बिना, सभी नागरिकों के समान और उचित व्यवहार सुनिश्चित करने में राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका है. भारतीय मुस्लिम महिलाएं, अन्य सभी नागरिकों की तरह, समान अधिकारों और अवसरों की हकदार हैं. धर्म गुरुओं को बदलते समय को स्वीकार करने और लैंगिक समानता की दिशा में काम करने का सही समय है. समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन इसे सुनिश्चित कर सकता है.

(आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नामक एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका ट्विटर हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(संपादन: ऋषभ राज)

(इस लेख़ को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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