Monday, 17 January, 2022
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मोदी भारत के सुधारवादी प्रधानमंत्रियों की लिस्ट में क्यों नहीं हैं

बड़े-बड़े इरादे रखने के बावजूद आर्थिक सुधारों के मोर्चे पर मोदी इसलिए पिछड़ते दिख रहे हैं क्योंकि उनके नौकरशाहों में सुधारों को आगे बढ़ाने का जज्बा नहीं है बल्कि वे तो इस लॉकडाउन के बहाने निरंकुश सत्ता का मज़ा लेने में मगन हैं.

मोदी-शाह को 5 अगस्त 2019 को ही अनुमान लगा लेना चाहिए था कि चीन लद्दाख में कुछ करेगा, इसमें कोई रहस्य नहीं था

चीन लद्दाख में जो कुछ कर रहा है उससे भारत को हैरान होने की जरूरत नहीं थी, बल्कि उससे इसी की उम्मीद करनी चाहिए थी, खासकर तब जबकि भारत ने जम्मू-कश्मीर का दर्जा बदल दिया है.

योगेंद्र यादव ने साम्यवाद के प्रति मेरी कुढ़न को सही पकड़ा है लेकिन देश का इलाज सांप के तेल से नहीं हो सकता: शेखर...

मेरे तर्क साम्यवाद अथवा वामपंथ के विरुद्ध नहीं है. बल्कि वे उस राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विरुद्ध हैं जिसमें मिशन जय हिंद के ये प्रख्यात प्रस्तावक विश्वास करते हैं.

भारत में आई एक ही आपदा ने PM, CM, DM जैसे तीन बड़े शक्तिशाली लोगों की पोल खोल दी है

पीएम, सीएम, डीएम—भारतीय शासन रूपी रेल के तीन इंजन हैं, और कोरोनावायरस की महामारी से निपटने में ये तीनों केवल गफलत करते नज़र आ रहे हैं.

ना ब्ल्यू कॉलर ना व्हाइट, इन बनियान पहने मजदूरों की अहमियत भूल गया था मोदी का भारत

अपने घरों की तरफ लौट रहे लाखों गरीब आकांक्षी भारतीय श्रमिक वर्ग की नई पीढ़ी है. मोदी और उनकी सरकार ने उनके भाग्य के बारे में सोचा ही नहीं.

वंदे भारत बनाम भारत के बंदे: क्या नरेंद्र मोदी जनता में अपनी सियासी पैठ इतनी जल्दी गंवा रहे हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महामारी के दौर में राष्ट्र के नाम जो संदेश दिए हैं वे मुख्यतः मध्य वर्ग या इलीट तबके को संबोधित रहे हैं, उनमें करोड़ों गरीबों के प्रति हमदर्दी ना के बराबर दिखती है, तो क्या मोदी अपना राजनीतिक अंदाज भूल रहे हैं?

हालात सामान्य हैं पर सबको लॉकडाउन करके रखा है, मोदी सरकार ने कैसे देश को अक्षम बनाने का जोखिम उठाया है

भारत को धीरे-धीरे अपने कामकाज पर लौटाने की जरूरत थी, बजाय कि देश को लॉकडाउन की मूर्छा से बाहर न निकालकर रेड, ग्रीन, ऑरेंज जोन में सेलेक्टिव तौर पर खोलने की.

कोरोनावायरस ने सर्वशक्तिमान केंद्र की वापसी की है और मोदी कमान को हाथ से छोड़ना नहीं चाहेंगे

भारत आज अगर आंतरिक तथा बाह्य रूप से ज्यादा सुरक्षित है तो इसमें दशकों तक संघीय व्यवस्था में रहने का भी कुछ योगदान तो है ही.

कोविड भारत में अभी वायरल नहीं हुआ पर देश और दुनिया में कुछ लोग सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पा रहे

भारत कोई पिकनिक नहीं मना रहा है मगर ऐसा भी नहीं है कि यहां लाशों के ढेर लग रहे हैं, अस्पतालों में मरीजों को बिस्तर की कमी पड़ रही है, श्मशानों में लकड़ी की या कब्रिस्तानों में जगह की कमी पड़ रही है.

मोदी के लॉकडाउन ने काम तो किया लेकिन अब भारत को हनुमान के पहाड़ की नहीं बल्कि संजीवनी बूटी की जरूरत है

लॉकडाउन कारगर रहा है मगर इसे ज्यादा खींचने के कई दूसरे दीर्घकालिक नतीजे हो सकते हैं जो इससे हुए फ़ायदों को खत्म कर दे सकते हैं. इसलिए बेहतर यही होगा कि इसे धीरे-धीरे, व्यवस्थित तरीके से वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाए.

मत-विमत

‘हेट स्पीच’ को अलग अपराध की कटेगरी में रखने के लिए क्या कानून में संशोधन का वक्त आ गया है

ऐसी स्थिति में जरूरी है कि हेट स्पीच के मर्ज पर काबू पाने के लिए अलग से इसे अपराध घोषित किया जाए और इसके लिए यथाशीघ्र भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों में संशोधन किया जाए.

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राजनीति

देश

EGI ने कश्मीर प्रेस क्लब पर ‘जबरन नियंत्रण’ की निंदा की, बताया प्रेस की आजादी का गला घोंटने की कोशिश

गिल्ड ने कहा कि सशस्त्र पुलिसकर्मियों की मदद से पत्रकारों के एक समूह ने जिस प्रकार घाटी के सबसे बड़े पत्रकार संघ केपीसी के कार्यालय एवं प्रबंधन पर ‘जबरन कब्जा’ किया, वह उसे देखकर स्तब्ध है.

लास्ट लाफ

कर्नाटक कांग्रेस की ‘पदयात्रा’ जारी रखने की असली वजह और भारतीय मीडिया से खुश हुआ पाकिस्तान

दिप्रिंट के संपादकों द्वारा चुने गए दिन के सबसे अच्छे कार्टून्स.