मुंबई, 23 अप्रैल (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने 2006 के मालेगांव विस्फोट मामले में चार आरोपियों को बरी करते हुए और पिछली जांच एजेंसी द्वारा जुटाए गए सबूतों को ‘‘पूरी तरह से नजरअंदाज’’ करने के लिए राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से नाराजगी जताते हुए कहा कि मामले की जांच ऐसी स्थिति में पहुंच गयी है जहां अब सच्चाई तक पहुंचना मुश्किल लग रहा है।
बुधवार को आए उच्च न्यायालय के आदेश के बाद यह सवाल अनुत्तरित रह गया कि 31 लोगों की जान लेने वाले विस्फोटों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था।
उच्च न्यायालय ने राजेंद्र चौधरी, धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवरिया और लोकेश शर्मा को आरोपमुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने लायक पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
इन पर हत्या, आपराधिक साजिश और गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए थे।
उच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में विशेष अदालत द्वारा आरोप तय करने के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उस समय न्यायाधीश ने ‘‘अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया।’’
आठ सितंबर 2006 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव कस्बे में चार बम विस्फोट हुए थे। इनमें तीन धमाके जुमे की नमाज के बाद हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान परिसर में तथा चौथा मुशावरत चौक में हुआ था। इस घटना में 31 लोगों की मौत और 312 लोग घायल हुए थे।
मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति श्याम चांडक की पीठ ने कहा कि एनआईए ने आतंकवाद रोधी दस्ते (एटीएस) की जांच और आरोपपत्र को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जिसमें पहले गिरफ्तार किए गए नौ मुस्लिम आरोपियों द्वारा पूरी साजिश का विस्तृत विवरण था।
अदालत ने कहा कि इस मामले में कई मोड़ आए। शुरुआती जांच एजेंसियों ने मुस्लिम आरोपियों को साजिशकर्ता बताया, जबकि बाद में जांच संभालने वाली एनआईए ने दक्षिणपंथी चरमपंथियों को जिम्मेदार ठहराया।
इस मामले में बृहस्पतिवार को उपलब्ध हुए आदेश में अदालत ने कहा, ‘‘एटीएस और एनआईए के आरोपपत्र में बिल्कुल विपरीत कहानियां हैं, जिनसे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि एटीएस को घटनास्थल से आपत्तिजनक सबूत मिले थे और फॉरेंसिक जांच में मिट्टी के नमूनों तथा एक आरोपी के गोदाम से आरडीएक्स के एक जैसे निशान मिले थे।
अदालत ने कहा कि चारों आरोपियों के खिलाफ अभियोजन पक्ष का मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है।
अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति आगे आकर यह गवाही नहीं दे सका कि उसने आरोपियों को बम विस्फोट में शामिल होते देखा था। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि एनआईए ने केवल आरोपियों के उन कबूलनामों पर भरोसा किया, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया तथा एक अन्य मामले में उनके कथित बयानों पर निर्भर रही।
अदालत ने कहा, ‘‘यह रहस्य है कि एनआईए ने नए साक्ष्य क्यों एकत्र नहीं किए।’’
अदालत ने यह भी कहा कि एनआईए ने अपनी जांच के बाद स्वामी असीमानंद के बयान के आधार पर पूरी तरह नयी कहानी पेश की, जिसे बाद में उन्होंने वापस ले लिया था।
उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘एनआईए ने बिल्कुल अलग कहानी पेश की और कहा कि मामले की जांच अब भी जारी है तथा आरोपियों के खिलाफ और साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। उसने विशेष अदालत से आगे की जांच जारी रखने की अनुमति भी मांगी थी।’’
एनआईए ने अपने आरोपपत्र में चार लोगों को वांछित आरोपी भी बताया था, जिनमें से दो को बाद में सितंबर 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में भी वांछित आरोपी दिखाया गया।
पूर्व भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और पांच अन्य लोगों को विस्फोट में कथित भूमिका के आरोप में गिरफ्तार किया गया था और उन पर मुकदमा चला। पिछले वर्ष जुलाई में एक विशेष अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया था।
2006 के मामले में एनआईए ने अपने आरोपपत्र में स्वामी असीमानंद के बयान पर भरोसा किया था, जिसमें कहा गया था कि मालेगांव विस्फोट दिवंगत दक्षिणपंथी कार्यकर्ता सुनील जोशी के सहयोगियों ने किए थे।
हालांकि बाद में असीमानंद ने यह बयान वापस ले लिया, फिर भी एनआईए ने नौ मुस्लिम आरोपियों को क्लीन चिट देते हुए इन चार लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया।
एक विशेष अदालत ने 2016 में नौ मुस्लिम पुरुषों को बरी कर दिया था, जिसे एटीएस ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उसकी अपील लंबित है और 2019 से इस पर सुनवाई नहीं हुई है।
उच्च न्यायालय ने 2019 में यह देखते हुए वर्तमान चार अपीलकर्ताओं को जमानत दे दी कि उन्हें बिना मुकदमे के छह साल से अधिक समय तक जेल में रहे थे।
भाषा
गोला मनीषा वैभव
वैभव
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