नई दिल्ली: विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने सोमवार को कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई आधिकारिक ट्रैक-2 वार्ता नहीं चल रही है. उन्होंने कहा कि दुनिया भर में इस तरह के कई कार्यक्रम होते हैं, लेकिन उनमें शामिल होने वाले लोग अपनी निजी क्षमता में हिस्सा लेते हैं.
सेशेल्स में एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए मिस्री ने कहा, “मैं इतना कहना चाहूंगा कि सबसे पहले, दुनिया के कई हिस्सों में और कई विषयों पर इस तरह के दर्जनों कार्यक्रम होते रहते हैं. इसलिए इनमें कुछ नया या खास नहीं है. दूसरी बात, जहां तक हमारा सवाल है, ये निजी संस्थाओं द्वारा आयोजित निजी कार्यक्रम हैं. हमारी नज़र में इनमें कुछ भी आधिकारिक नहीं है.”
उन्होंने आगे कहा, “मैं पाकिस्तान सरकार की ओर से तो नहीं बोल सकता, लेकिन भारत सरकार की ओर से इन कार्यक्रमों में कोई आधिकारिक भागीदारी, समर्थन या शामिल होना नहीं है.”
मिस्री की यह टिप्पणी उन खबरों के बीच आई है, जिनमें कहा गया था कि पिछले सप्ताह दो ट्रैक-2 संवाद आयोजित किए गए थे—एक बैंकॉक में कनाडा स्थित एक संगठन द्वारा और दूसरा कोलंबो में लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) द्वारा. कोलंबो इवेंट में कई सीनियर रिटायर्ड अधिकारियों ने हिस्सा लिया, जिनमें जनरल एम.एम. नरवणे (रिटायर्ड), पूर्व चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (COAS) भी शामिल थे.
भारतीय जनता पार्टी के सीनियर नेता और इंडिया फाउंडेशन के प्रेसिडेंट राम माधव भी मौजूद थे. हालांकि, उन्होंने इस बात को खारिज कर दिया कि यह इवेंट ट्रैक II डायलॉग था और कहा कि यह IISS का “सालाना साउथ एशिया डायलॉग” था, जिसमें भारत, श्रीलंका, यूएस, यूके, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के स्कॉलर्स शामिल हुए थे.
माधव ने शनिवार को एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, “अतीत में इस वार्षिक संवाद में अधिकारी भी शामिल होते रहे हैं. इतने सारे देशों के साथ कोई ट्रैक-2 वार्ता नहीं होती. मैं दो दिन के पूरे कार्यक्रम में शामिल नहीं हुआ. मुझे केवल एक सत्र में बोलने के लिए बुलाया गया था, जहां मैंने अपनी बात रखी और लौट आया. एक गैर-मुद्दे को बेवजह मुद्दा बनाया जा रहा है.”
पाकिस्तान की तरफ से, रिपोर्ट्स बताती हैं कि विदेश मंत्रालय में SAARC और साउथ एशिया के डायरेक्टर जनरल सज्जाद हैदर खान ने बातचीत में हिस्सा लिया. बातचीत में शामिल दूसरे पाकिस्तानियों में सीनेटर शेरी रहमान और मेजर जनरल इस्फंदियार अली खान पटौदी (रिटायर्ड) शामिल हैं, जिन्होंने इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) में काम किया है.
मिस्री ने सोमवार को कहा, “यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारत से जो भी लोग इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं—चाहे वे सेवानिवृत्त राजनयिक हों, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हों या नागरिक समाज के सदस्य वे सभी सम्मानित व्यक्ति हैं, लेकिन जब वे ऐसे कार्यक्रमों में भाग लेते हैं तो वे अपनी व्यक्तिगत राय रखते हैं. वे किसी भी तरह से भारत सरकार के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते और न ही कर सकते हैं.”
विदेश सचिव ने आगे कहा, “एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ऐसे कार्यक्रमों को ज्यादा महत्व नहीं देते. हमारी नज़र में इनकी कोई विशेष अहमियत नहीं है.”
भारत और पाकिस्तान के बीच इस तरह के संवाद पहली बार नहीं हुए हैं. दिप्रिंट की पहले की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद कम से कम तीन ऐसे संवाद हुए थे, जबकि हाल में हुए ये दोनों कार्यक्रम काफी समय पहले से तय थे.
ट्रैक-2 कूटनीति क्या है?
ट्रैक-2 कूटनीति एक अनौपचारिक संवाद प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षाविद, धार्मिक नेता, सेवानिवृत्त नौकरशाह और अधिकारी, नागरिक समाज संगठन तथा कभी-कभी मीडिया से जुड़े लोग भी शामिल होते हैं.
ऐसे संवादों का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच समझ बढ़ाना होता है, बिना किसी औपचारिक सरकार-से-सरकार बातचीत के. औपचारिक सरकारी बातचीत को ट्रैक-1 कूटनीति कहा जाता है.
‘ट्रैक-2 कूटनीति’ शब्द 1980 के दशक में अमेरिका के पूर्व विदेश सेवा अधिकारी जोसेफ मोंटविल ने दिया था. उन्होंने यह अवधारणा दो देशों के बीच औपचारिक कूटनीति की सीमाओं को देखते हुए विकसित की थी, खासकर उन देशों के लिए जिनके बीच कई तरह की समस्याएं और मतभेद हों.
भारत और पाकिस्तान के बीच पिछले कई दशकों में इस तरह के कई संवाद आयोजित होते रहे हैं.
सरकार-से-सरकार बातचीत के अभाव में ट्रैक-2 संवाद भारत और पाकिस्तान के लिए एक-दूसरे की सोच और रुख को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है.
भारत का लगातार यह रुख रहा है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवादी संगठनों को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच कोई आधिकारिक बातचीत नहीं हो सकती.
पिछले साल मई में भारत और पाकिस्तान के बीच 87 घंटे तक सशस्त्र संघर्ष हुआ था. यह संघर्ष भारत द्वारा पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर शुरू करने के बाद हुआ था.
इस संघर्ष के लगभग तुरंत बाद ट्रैक-2 संवाद शुरू हो गए थे और पहली संगठित बैठक जुलाई 2025 में हुई थी.
इस साल भी आगे चलकर ऐसे और संवाद आयोजित होने की संभावना है.
इस तरह के संवादों की एक खास अहमियत यह भी है कि इनके जरिए पाकिस्तान की सोच और नज़रिये की जानकारी सरकारी अधिकारियों तक पहुंच सकती है, भले ही इन बैठकों को सरकार की आधिकारिक मंजूरी न मिली हो.
अतीत में कुछ ट्रैक-2 संवादों के निष्कर्ष भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारियों के साथ भी साझा किए गए थे.
हाल के वर्षों में इस्लामाबाद के नजरिए से इन चर्चाओं का स्वरूप अधिक सैन्य-केंद्रित हो गया है. इसकी वजह पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं से जुड़े प्रतिनिधियों की बढ़ती भागीदारी मानी जाती है.
खासकर आसिम मुनीर के पाकिस्तानी सेना की कमान संभालने के बाद इन संवादों का फोकस विवादों के समाधान से ज्यादा संघर्ष प्रबंधन (कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट) पर केंद्रित हो गया है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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