नई दिल्ली: न्यूजीलैंड और कनाडा में भारतीयों द्वारा दायर किए जा रहे शरण (असाइलम) के आवेदन अब बड़ी संख्या में खारिज किए जा रहे हैं. दोनों देशों की एजेंसियां कई मामलों में यह पाकर आवेदन ठुकरा रही हैं कि वे “झूठे, गढ़े हुए, किसी मकसद से प्रेरित या उत्पीड़न के भरोसेमंद सबूतों से रहित” हैं.
खारिज होने वाले आवेदनों की संख्या ऐसे समय बढ़ी है, जब इमिग्रेशन अधिकारियों ने भारत से आने वाले असाइलम आवेदनों, खासकर धार्मिक उत्पीड़न का दावा करने वाले मामलों की जांच और कड़ी कर दी है.
सख्त जांच से उन एजेंटों और सलाहकारों के मजबूत नेटवर्क को बड़ा झटका लगा है, जो आवेदकों से भारी रकम लेकर उत्पीड़न की कहानी तैयार करते थे और उन्हें विदेश भेजने में मदद करते थे.
कथित तौर पर ऐसे चरमपंथी नेटवर्क, जो खासकर पंजाब के युवाओं को शरण और बाद में नागरिकता दिलाने के नाम पर इन देशों में भेजते थे ताकि अपने एजेंडे को आगे बढ़ा सकें, उन्हें भी झटका लगा है. अब अधिकारी ऐसे आवेदनों को लगातार खारिज कर रहे हैं. यह रुझान दिप्रिंट द्वारा देखे गए आधिकारिक इमिग्रेशन आंकड़ों में भी दिखाई देता है.
न्यूजीलैंड में 2023-2024 (1 जुलाई से 30 जून) के दौरान भारतीय नागरिकों ने शरणार्थी या संरक्षित व्यक्ति का दर्जा पाने के लिए 1,169 आवेदन किए.
इसी अवधि में 199 मामलों पर फैसला हुआ, जिनमें सिर्फ 3 मंजूर किए गए, 116 (58 प्रतिशत) खारिज हुए और 80 वापस ले लिए गए.
इसी तरह 2024-2025 की अवधि में भारतीय नागरिकों ने 887 आवेदन किए, जिनमें से 378 पर फैसला हुआ. इनमें केवल 3 मंजूर हुए, 246 (65 प्रतिशत) खारिज किए गए और 129 वापस ले लिए गए.
2025-2026 (1 जुलाई से 30 अप्रैल) के दौरान 550 आवेदन दायर किए गए.
इसी अवधि में 555 मामलों पर फैसला हुआ, जिनमें सिर्फ 8 मंजूर हुए, 348 (63 प्रतिशत) खारिज किए गए और 199 वापस ले लिए गए.

कनाडा में भी भारतीयों के कई असाइलम आवेदन खारिज किए जा रहे हैं, क्योंकि अधिकारियों को लगा कि आवेदक अपने दावे को साबित नहीं कर पाए.
2023 में जिन 5,024 असाइलम मामलों पर फैसला हुआ, उनमें 2,500 स्वीकार किए गए, जबकि 2,051 (41 प्रतिशत) खारिज हुए. 220 मामलों को छोड़ दिया गया और 253 वापस ले लिए गए.
2024 में अधिकारियों ने 5,994 मामलों पर फैसला किया. इनमें 2,175 स्वीकार किए गए, 1,688 (28 प्रतिशत) खारिज किए गए, 1,377 मामलों को छोड़ दिया गया और 754 वापस ले लिए गए.
2025 में 9,252 मामलों पर फैसला हुआ. इनमें 2,040 स्वीकार किए गए, 2,309 (25 प्रतिशत) खारिज किए गए, 3,914 मामलों को छोड़ दिया गया और 989 वापस ले लिए गए.
2026 में 31 मार्च तक 2,866 मामलों पर फैसला हुआ. इनमें 443 स्वीकार किए गए, 688 (24 प्रतिशत) खारिज किए गए, 1,406 मामलों को छोड़ दिया गया और 329 वापस ले लिए गए.

निर्वासन (डिपोर्टेशन) के आंकड़े बताते हैं कि कनाडा से निकाले गए लोगों में भारतीय नागरिक लगातार शीर्ष देशों में शामिल रहे हैं.
2023 में 1,132 भारतीयों को कनाडा से निकाला गया था. यह संख्या 2024 में बढ़कर 2,004 और 2025 में 3,779 हो गई.
मार्च 2026 तक 1,712 भारतीय नागरिकों को कनाडा से निकाला जा चुका था.
आंकड़ों के अनुसार, कनाडा में लंबित निर्वासन मामलों की सूची में भी भारत सबसे ऊपर है. भारतीय नागरिकों के 6,980 निर्वासन मामले लंबित हैं. इसके बाद मेक्सिको का स्थान है, जहां 5,311 मामले लंबित हैं.
‘एक्सट्रीमिस्ट ग्रुप्स द्वारा मोटिवेटेड, गलत इस्तेमाल किया गया’
दिप्रिंट के सवालों का जवाब देते हुए, न्यूज़ीलैंड की रिफ्यूजी स्टेटस यूनिट के हेड ऑफ ऑपरेशंस, ग्रेग यंग ने कहा कि “भारतीय नागरिकों के क्लेम की सक्सेस रेट पहली बार में और अपील पर भी बहुत कम है”.
यंग ने कहा, “बड़ी संख्या में क्लेम बेबुनियाद पाए जा रहे हैं और हो सकता है कि वे इंटरनेशनल प्रोटेक्शन पाने की असली ज़रूरत के बजाय इमिग्रेशन के मकसद से मोटिवेटेड हों.”
यंग ने समझाया कि रिफ्यूजी और प्रोटेक्शन क्लेम प्रोटेक्शन पाने के मकसद से होते हैं और इन्हें न्यूज़ीलैंड में रहने की अवधि बढ़ाने या अधिकारों और सर्विसेज़ तक पहुंचने के तरीके के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. यंग ने कहा, “रिजेक्टेड क्लेम न सिर्फ न्यूज़ीलैंड में बल्कि पार्टनर देशों में भी किसी व्यक्ति के भविष्य के इमिग्रेशन की संभावनाओं को काफी नुकसान पहुंचा सकता है.”
दिप्रिंट से बात करते हुए, एक रेगुलेटेड कैनेडियन इमिग्रेशन कंसल्टेंट, कंवर सिएरा ने कहा कि असाइलम एप्लीकेशन के रिजेक्ट होने के मामले बढ़ रहे हैं क्योंकि सरकार को एहसास हो गया है कि उनमें से कई गलत इरादे से किए जाते हैं और असाइलम सिस्टम का फायदा कुछ खास लोग, अलग राय रखने वाले, कट्टरपंथी ग्रुप और इमिग्रेशन कंसल्टेंट उठा रहे हैं.
सिएरा ने कहा, “कैनेडियन अधिकारियों ने पाया कि भारत से आने वाले असाइलम के बहुत सारे दावे ऑर्गनाइज़्ड इमिग्रेशन फ्रॉड से जुड़े थे, खासकर पंजाब और हरियाणा के एप्लिकेंट से जुड़े थे. कुछ इमिग्रेशन कंसल्टेंट ने लोगों को विज़िटर वीज़ा के लिए अप्लाई करने के लिए उकसाया, जिसका मकसद सिर्फ बाद में असाइलम का दावा करना था, इसे ज़ुल्म से सुरक्षा के बजाय परमानेंट रेजिडेंसी का आसान रास्ता बताया.”
सिएरा ने आगे कहा कि इस मुद्दे को कनाडा के इमिग्रेशन मिनिस्टर ने एक पार्लियामेंट्री कमिटी की मीटिंग के दौरान माना था, जहां असाइलम सिस्टम का इस्तेमाल “परमानेंट रेजिडेंसी के रास्ते” के तौर पर किया जा रहा था, जबकि इसका मकसद असली ज़ुल्म का सामना कर रहे लोगों की सुरक्षा करना है.”
सिएरा ने कहा कि अधिकारियों ने यह भी पाया कि कुछ इंटरनेशनल स्टूडेंट्स और टेम्पररी विदेशी वर्कर्स जिनके परमिट एक्सपायर होने वाले थे, उन्हें सलाह दी जा रही थी कि वे अपनी पढ़ाई जारी न रखें या लीगल इमिग्रेशन ऑप्शन न ढूंढें, बल्कि इसके बजाय असाइलम क्लेम फाइल करें. बाद में जांच से पता चला कि ये “कंसल्टेंट्स द्वारा तैयार किए गए पैकेज्ड डील्स” थे, जिससे इस बढ़ते “रिफ्यूजी स्कैम इंडस्ट्री” का पर्दाफाश हुआ.
सिएरा के अनुसार, कुछ फ्रिंज और एक्सट्रीमिस्ट ग्रुप्स ने भी एप्लीकेंट्स को पॉलिटिकल उत्पीड़न के दावों को मजबूत करने के लिए भारत विरोधी प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए उकसाकर असाइलम सिस्टम का फायदा उठाया.
सिएरा ने दिप्रिंट को बताया, “एप्लीकेंट्स को प्रदर्शनों में सबसे आगे रहने, भारत विरोधी नारे लगाने और सबूत बनाने की सलाह दी गई थी, जिनका इस्तेमाल बाद में असाइलम प्रोसीडिंग्स में किया जा सके.”
उन्होंने आगे कहा, “इस मुद्दे के बड़े सोशल नतीजे हुए. 2024 में, कनाडा में खालिस्तान समर्थक ग्रुप्स के बीच कई टकराव हुए, जिसमें मंदिरों और गुरुद्वारों के बाहर की घटनाएं भी शामिल थीं, जिन्हें सोशल मीडिया पर खूब शेयर किया गया. पॉलिटिकल लीडर्स ने चिंता जताई कि विदेशों में पॉलिटिकल तनाव कनाडा की सड़कों पर फैल रहा है.”
सिएरा ने यह भी कहा कि कैनेडियन अधिकारियों ने ऐसे मामले भी सामने लाए हैं जहाँ सैकड़ों असाइलम एप्लीकेशन में एक जैसी या लगभग एक जैसी बातें इस्तेमाल की गई थीं. उन्होंने कहा, “एक मामले में, 250 से ज़्यादा रिफ्यूजी क्लेम में एक ही कहानी सामने आई, इस मामले की कनाडा के फेडरल कोर्ट ने जांच की थी. जैसे-जैसे जांच बढ़ी, कई असाइलम क्लेम रिजेक्ट कर दिए गए या उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया, जबकि कुछ वापस ले लिए गए या छोड़ दिए गए.”
सिएरा के मुताबिक, इस कार्रवाई के कारण कनाडा से भारतीय नागरिकों को निकालने और डिपोर्ट करने में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है.
‘डिमांड और सप्लाई का खेल’
चाहे न्यूजीलैंड हो या कनाडा, शरण (असाइलम) के लिए आने वाले आवेदनों में भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है. इनमें से कई आवेदन धार्मिक या राजनीतिक उत्पीड़न का हवाला देते हैं.
हालांकि, आवेदकों के किस राज्य से होने का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन सुरक्षा अधिकारियों का अनुमान है कि इन दावों का एक बड़ा हिस्सा पंजाब से आता है.
दिप्रिंट को मिले आंकड़ों से पता चलता है कि न्यूजीलैंड में भारतीय नागरिकों द्वारा किए गए शरण संबंधी दावों में तेज़ बढ़ोतरी हुई है. 2020-21 में यह संख्या 89 थी, जो 2021-22 में 104 और 2022-23 में 172 हो गई. इसके बाद 2023-24 में यह बढ़कर 1,169 तक पहुंच गई.
कनाडा में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिला है. वहां प्रोसेसिंग के लिए भेजे गए असाइलम आवेदनों में भारतीय नागरिक लगातार सबसे बड़ी संख्या में रहे हैं.
आवेदनों की संख्या 2023 में 9,060 से बढ़कर 2024 में 32,563 हो गई. 2025 में 17,835 आवेदन प्रोसेसिंग के लिए भेजे गए, जबकि 31 मार्च 2026 तक 3,299 आवेदन भेजे जा चुके थे.
भारतीय सुरक्षा तंत्र से जुड़े एक सूत्र ने दिप्रिंट को बताया कि कनाडा का वीज़ा दिलाने का वादा कथित तौर पर सिख चरमपंथी नेटवर्कों द्वारा पंजाब के युवा सिखों की भर्ती करने और कनाडा पहुंचने के बाद उन्हें अपनी गतिविधियों से जोड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता था.
सूत्र ने कहा, “यह डिमांड और सप्लाई का खेल बन गया था.”
सूत्र के अनुसार, सिख चरमपंथी समूह कथित तौर पर पंजाब के युवाओं के लिए वीज़ा स्पॉन्सर्ड करते थे और उन्हें ट्रक ड्राइवर, प्लंबर या धार्मिक पदों जैसी मध्यम कौशल वाली नौकरियों के अवसर देने का वादा करते थे.
सूत्र ने आरोप लगाया, “वे उनके वीज़ा और कनाडा की यात्रा का खर्च उठाते थे. बदले में उनसे खालिस्तान समर्थक गतिविधियों, भारत-विरोधी प्रदर्शनों, कार्यक्रमों और कट्टर धार्मिक सभाओं में भाग लेने की अपेक्षा की जाती थी.”
सूत्र ने आगे दावा किया कि सिख चरमपंथी समूहों के सदस्य भारत में धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे पार्टी कार्यकर्ता के रूप में पहचान पत्र जारी करने के लिए 1 लाख से 2 लाख रुपये तक वसूलते थे.
सूत्र के मुताबिक, इन पत्रों का इस्तेमाल बाद में कनाडा में असाइलम आवेदन को मजबूत करने के लिए किया जाता था.
सूत्र ने कहा, “इनमें से कई युवा कनाडा पहुंचने के बाद वहां के खालिस्तान समर्थक समूहों से जुड़ जाते थे. अब इस पूरे तरीके का खुलासा हो चुका है और इन देशों के अधिकारी ऐसे असाइलम आवेदनों को लगातार खारिज कर रहे हैं.”
साल 2023 में पूर्व सांसद सिमरनजीत सिंह मान भी ऐसे ही असाइलम पत्र जारी करने को लेकर विवादों में आए थे. आरोप था कि इन पत्रों का इस्तेमाल अलगाववादी तत्वों द्वारा किया जा रहा था.
उस समय दिप्रिंट से बातचीत में मान ने स्वीकार किया था कि जो लोग उनके पास आते थे, उन्हें वे ऐसे पत्र देते थे.
उनका कार्यालय असाइलम मांगने वालों को ऐसे पत्र जारी करता था, जिनमें सिखों पर कथित यातना, हत्याओं, न्यायिक प्रक्रिया के बाहर हुई हत्याओं तथा 1947 और 1984 के बाद की घटनाओं का उल्लेख होता था.
मान ने दिप्रिंट से कहा था, “मैं उन सभी देशों का बहुत आभारी हूं जो इस पत्र का सम्मान करते हैं. भारत में हमारी (सिखों की) सुरक्षा खतरे में है और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हम वैध रूप से शरण मांग सकते हैं, जो लोग कर भी रहे हैं. यदि राज्य डर के आधार पर शासन करता है और कुछ लोगों को स्वीकार नहीं करता, तो लोग वहां से भागेंगे.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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