(थॉमस जेफ्रीज, वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी)
सिडनी, सात अक्टूबर (द कन्वरसेशन) रूस के एक प्लेग अनुसंधान संस्थान में काम करने वाली एक प्रयोगशाला कर्मचारी की मौत को लेकर सामने आई विरोधाभासी जानकारियों ने ‘न्यूमोनिक’ प्लेग यानी फेफड़ों को प्रभावित करने वाले प्लेग के फैलने की आशंका पैदा कर दी है।
साइबेरिया में करीब 200 लोगों को पृथक वास में रखा गया है। 28 वर्षीय दर्या शिपिलोवा की तबीयत काम के दौरान बिगड़ी थी और दो अक्टूबर को उनकी मौत हो गई। हालांकि, उनकी मौत की सटीक परिस्थितियां अभी स्पष्ट नहीं हैं।
रूस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पिछले सप्ताह सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था कि शिपिलोवा की “प्लेग से मौत हुई है।” बाद में उन्होंने पोस्ट में संशोधन करते हुए “संभवतः” शब्द जोड़ दिया। इसके बाद रूस की स्वास्थ्य निगरानी संस्था ने कहा कि उनकी मौत “अज्ञात कारण से हुए निमोनिया” के कारण हुई।
स्थानीय मीडिया की खबरों में दावा किया गया कि जिस प्रयोगशाला में शिपिलोवा काम करती थीं, वहां हुई एक दुर्घटना के बाद वह संक्रमित हुई थीं। यह प्रयोगशाला साइबेरिया और सुदूर पूर्व का ‘इरकुत्स्क एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट’ है। हालांकि, इन खबरों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।
तो आखिर प्लेग क्या है और यह कैसे फैलता है? क्या इस मामले को लेकर चिंता करने की जरूरत है?
प्लेग ‘यर्सिनिया पेस्टिस’ नामक बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। यह बैक्टीरिया आम तौर पर जमीन पर रहने वाले चूहों और प्रेयरी डॉग जैसे कृंतकों (ऐसे स्तनधारी जीव जिनके आगे के दांत लगातार बढ़ते रहते हैं और वे चीजों को कुतरते हैं) में पाया जाता है, लेकिन यह इंसानों को भी संक्रमित कर सकता है।
यही वाई. पेस्टिस बैक्टीरिया प्लेग के तीन अलग-अलग रूप पैदा कर सकता है।
‘ब्यूबोनिक प्लेग’ जानवरों से इंसानों में पिस्सुओं के जरिए फैलता है। इसमें गर्दन की लसीका ग्रंथियों में सूजन आ जाती है, जिसे ब्यूबो कहा जाता है। इसके अलावा बुखार, सिरदर्द, ठंड लगना और कमजोरी जैसे लक्षण भी हो सकते हैं।
अगर एंटीबायोटिक से इलाज न किया जाए तो ब्यूबोनिक प्लेग कुछ ही दिनों में जानलेवा हो सकता है। इस रूप से संक्रमित होने वाले करीब 30 से 60 प्रतिशत लोगों की मौत हो सकती है।
‘सेप्टीसीमिक प्लेग’ तब हो सकता है जब ब्यूबोनिक प्लेग का इलाज न किया जाए। यह तब भी हो सकता है जब संक्रमण सीधे रक्तप्रवाह में पहुंच जाए। इसमें शरीर के अंगों में रक्तस्राव हो सकता है। इसका नाम गंभीर रक्त संक्रमण सेप्टीसीमिया से जुड़ा है, जो इस बीमारी में हो सकता है।
‘न्यूमोनिक प्लेग’ जिसे साइबेरिया में शिपिलोवा की मौत का संभावित, लेकिन अभी तक अपुष्ट कारण बताया गया है, यह तब हो सकता है जब ब्यूबोनिक प्लेग फेफड़ों तक फैल जाए। लेकिन न्यूमोनिक प्लेग एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में सांस के साथ निकलने वाली बेहद छोटी बूंदों के जरिए भी फैल सकता है।
‘न्यूमोनिक प्लेग’, प्लेग का सबसे दुर्लभ, लेकिन सबसे गंभीर रूप है। अगर इसका इलाज न किया जाए तो इससे मृत्यु की दर 100 प्रतिशत तक हो सकती है।
अन्य लक्षणों के अलावा न्यूमोनिक प्लेग में गंभीर निमोनिया भी होता है। इस मामले में निमोनिया बैक्टीरिया के कारण फेफड़ों में होने वाला संक्रमण है।
क्या प्लेग सिर्फ मध्यकाल की बीमारी है?
प्लेग को अक्सर मध्यकाल से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह सिर्फ इतिहास की किताबों तक सीमित बीमारी नहीं है।
ब्यूबोनिक प्लेग ने 541 से 750 ईस्वी के बीच पश्चिमी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में करोड़ों लोगों की जान ली थी। इसे जस्टिनियन प्लेग कहा जाता है। बाद में मध्यकाल में फैली ‘ब्लैक डेथ’ महामारी ने यूरोप की करीब आधी आबादी को मौत के घाट उतार दिया था।
लेकिन मध्यकाल के बाद भी प्लेग के प्रकोप होते रहे। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत के बीच फैली तीसरी महामारी में करीब 1.2 करोड़ लोगों की मौत हुई थी।
आज भी मध्य एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और साइबेरिया के कुछ हिस्सों में प्लेग स्थानिक बीमारी है। यानी इन क्षेत्रों में यह बीमारी लगातार एक निश्चित स्तर पर मौजूद रहती है। पिछले सप्ताह रूसी प्रयोगशाला कर्मचारी की मौत भी साइबेरिया में हुई।
प्लेग के मामले आम तौर पर ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में सामने आते हैं। यही वजह है कि किसी शहरी क्षेत्र में स्थित प्रयोगशाला से इसके संभावित रिसाव की आशंका असामान्य मानी जाएगी।
क्या प्लेग का इलाज संभव है?
हां। प्लेग का इलाज संभव है। संक्रमण के तुरंत बाद इलाज शुरू कर दिया जाए तो आम तौर पर 10 से 14 दिन तक एंटीबायोटिक लेने से बीमारी का उपचार किया जा सकता है। एंटीबायोटिक मुंह के जरिए या नस के माध्यम से दी जा सकती हैं।
हालांकि, 1995 के बाद से जंगल में रहने वाले कुछ प्लेग बैक्टीरिया में एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोध देखा गया है।
सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने 1980 के दशक में भी एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी प्लेग बैक्टीरिया तैयार किए थे।
हालांकि, ऐसा कोई सबूत नहीं है कि शिपिलोवा की मौत के लिए कथित तौर पर जिम्मेदार बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक का असर नहीं होता। न ही ऐसा कोई प्रमाण है कि जिस प्रयोगशाला में वह काम करती थीं, वहां जैविक हथियारों पर शोध हो रहा था।
हमें कितनी चिंता करनी चाहिए?
न्यूमोनिक प्लेग के बड़े प्रकोप का अब तक सिर्फ एक मामला दर्ज हुआ है। यह 1910 के दशक में चीन में हुआ था।
साइबेरिया में सामने आए मौजूदा मामले के बारे में अभी बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है। लेकिन फिलहाल ऐसे बहुत कम सबूत हैं, जिनसे महामारी की आशंका पैदा हो। यहां महामारी से आशय किसी खास क्षेत्र में बीमारी के बड़े पैमाने पर फैलने से है, जबकि वैश्विक महामारी वह स्थिति है, जिसमें बीमारी कई देशों में फैल जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सोमवार को जारी एक बयान में कहा कि उसे इरकुत्स्क में एक प्रयोगशाला कर्मचारी की “गंभीर निमोनिया से मौत” की खबरों की जानकारी है, लेकिन मौत के कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा कि उपलब्ध अनौपचारिक जानकारी के आधार पर आम आबादी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य का जोखिम फिलहाल कम दिखाई देता है। संगठन ने कहा कि और जानकारी मिलने के बाद जोखिम का आकलन किया जाएगा।
इस जोखिम का सही आकलन करने के लिए यह स्पष्ट और पारदर्शी जानकारी मिलना बेहद जरूरी होगा कि शिपिलोवा आखिर किस तरह बीमार पड़ीं और उनकी मौत किन परिस्थितियों में हुई।
द कन्वरसेशन गोला मनीषा
मनीषा
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